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गीता में पढ़ा था, शरीर मर जाता है परन्तु आत्मा जीवित रहती है लेकिन आज के समय को देख रहा हूँ, किन्तु शरीर तो जीवित है लेकिन आत्माएँ मर चुकी हैं।
#योगेश-
आप जो देख रहे हैं वह भौतिक दृष्टि से देख रहे हैं इसलिए आपको ऐसा दिखता है। आत्मा आज भी जीवित है, कल भी रहेगी। आत्मा का विश्वास नष्ट किया गया है। भौतिकता को विश्वास प्रदान किया गया है। बस इतनी सी बात है।
अतः कृपया गीता को छुठलाने की अनुकंपा रहने ही दें। हो सके तो आत्मा पर विश्वास करें।
#अनुज-
भैया जी.. भाव को समझिये.. शाब्दिक अर्थ पर मत जाइये। आत्मा मर गयी" का मुहावरेदार प्रयोग किया गया है।
#योगेश-
नीरज जी इन्हीं भावों और मुहावरों ने तो शाश्वत मूल्यों का हनन किया है। ऐसा न समझें कि इस विचार ने जो समझाना चाहा है वह मैं नही समझा, किन्तु यह तय है कि मुहावरों के मोह में आपने वह नहीं समझा जो समझना चाहिये। मैं फिर याद दिला दूँ- आत्म दर्शन की दृष्टियों को मारा गया है ताकि आर्य पुनर्जागृत न हो सकें। भौतिक दृष्टि का सत्य आत्मा से नही जुड़ सकता। कभी नहीं। फिर भी आपको चारो ओर मृत आत्मा ही नज़र आती हैं तो किसी वैदिक मनोचिकित्सक से फौरन भेट करें।
#अनुज-
उपरोक्त चित्र से किस शाश्वत मूल्य का हनन हो गया मित्र? एक बेहद सामान्य वाक्य को आप बेवजह गीता विरोधी बताने पर तुले है। आम बोलचाल की भाषा और आध्यात्मिक शब्दावली में अंतर होता है। वैसे ये वैदिक मनोचिकित्सक क्या होता है?
#योगेश-
कुछ बाते शाश्वत सत्य होती है जो समय के साथ नही बदलती। जो गीता ज्ञानी है, उसी को मै वैदिक मनोचिकित्सक कहता हूँ। यह किसी संप्रदाय विशेष का ग्रंथ नही मानव मात्र का ग्रंथ है जो मनोदशा और उनके विकरों को कैसे नियंत्रित करें इस पर जोर देता है।
#अनुज-
पृथ्वी तो चलायमान है।यह शाश्वत सत्य है। फिर भी इसे अचला कहा गया है। फिर अचला शब्द तो सत्य विरोधी हुआ न।
#योगेश-
पृथ्वी तभी तक अचला है जब तक तुम पृथ्वी पर हो, देह के लिए वह अचला है, और आत्मा के लिए चलायमान।
अनुज-
क्या आत्मा पृथ्वी की गति महसूस करती है।
योगेश-
गति तो पृथ्वी का गुण है ही नही यह मात्र आभाष है। प्रकृति की समस्त शक्तियों का जो प्राण है वही सबकी गति का कारण है। परमात्मा ही सबकी गति का कारण है। वही प्रेरणा है। उसकी प्रेरणा समाप्त तो पृथ्वी अचला। गति रूक जाये। काल समाप्त, धर्म निःअर्थक । सबके अस्तित्व मे उसकी प्रेरणा है।
बृजेश-
आत्मा तो कोटि कोटि ब्रह्माण्डों की गति का अनुभव करती है फिर पृथ्वी की क्या बात....लेकिन इसका अनुभव व्यक्ति विशेष को तभी हो सकता है जब वह आत्मा की शाश्वत शक्ति से तो ओत प्रोत हो किन्तु पृथ्वी की आपेक्षितता से स्वयं को मुक्त कर ले....जैसे पृथ्वी की गोलाई का अनुमान या तो आप विज्ञानं की पुस्तकों में पा सकते हैं या अंतरिक्ष में प्रवेश कर ।पृथ्वी के पर्यावरण में तो यह लंबी और चौड़ी ही प्रतीत होगी।सादर
उतकर्ष सत्य-
त्रिपाठी बेहतर व्याख्या दी है आपने :)
अनुज-
पृथ्वी की गति आभास मात्र है?? आज newton, गैलीलियो, कॉपर निकस और आर्यभट्ट की आत्मा को बहुत कष्ट हो रहा होगा। धन्य है आप वैदिक मनोचिकित्सक महोदय। उत्कर्ष सत्यम
योगेश-
आपने जितनो के आत्मा में कष्ट का बीज बोया है, वहाँ शायद आपने ध्यान से देखा नहीं सदियों पहले मैंने आनंद का वृक्ष रोपा था। यह उनकी ही भौतिक शिक्षा का असर है कि मानव मात्र शनैः शनैः मेरे धर्म के निकट होता जा रहा है।
उतकर्ष सत्य-
आत्मा के मरने का अर्थ सात्विक चैतन्यता के विलोपन से निर्जीव हुई संरचना मात्र है वैसे शाब्दिक अर्थ में ये अजर अविनाशी परमात्मा का ही एक अंश होने की वजह से उसके सभी मूलधर्मो एवम् गुणों से युक्त है । सम्भवतः अभिधा और लक्षणा की रहस्यमय परिकल्पना के अत्यधिक अनुचित प्रकारांतर उपयोग मात्र से ही आत्मा की अतुलित और परमात्मा तुल्य शक्तियो का उचित आंकलन न हो पा रहा किन्तु वैदिक ज्ञान की सदाशयता के अभाव में सूर्य आदि नक्षत्र और कालपुरुष के पृथ्वी के ग्रहीय घूर्णन के बीच गुह्यता को अज्ञानतावश नकारना उचित नही । आभाषी संसार की स्थूलता कुछ नियमो से बंधी है जिनका विशद वर्णन अथर्ववेद के तृतीय मंडल में है कृपया दार्शनिकता और वो भी द्वैतवाद को वेदों के दर्शन से जोड़कर ही सत्य को सम्मुख रखिये अन्यथा आक्रमण तो इसीलिए विदेशी मिशनरिया कर ही पा रही है क्योंकि बचाव में हम वैदिक सत्य की वैज्ञानिकता को सामने नही रख रहे :)
अनुज-
आपने जितनो के आत्मा में कष्ट का बीज बोया है, वहाँ शायद आपने ध्यान से देखा नहीं सदियों पहले मैंने आनंद का वृक्ष रोपा था। यह उनकी ही भौतिक शिक्षा का असर है कि मानव मात्र शनैः शनैः मेरे धर्म के निकट होता जा रहा है। अब ई का है योगेश जी। बात तो पृथ्वी की गति की हो रही थी। अगर समय नही कट रहा हो तो टीवी देखिये। फेसबुक पे प्रलाप न करें। ;)
बृजेश-
नीरज जी, यह आभास शब्द अच्छा है....मैं समझता हूँ आभास का अर्थ प्रतीति है अर्थात प्रति+इति यानि केवल अनुमान या सत्य की छाया। नीरज जी उगते सूर्य की किरणे जब पानी पर पड़ती हैं तो जो दीखता है वह सुनहरा पानी क्या सत्य है नहीं पानी तो रंगहीन है वहां तो मात्र प्रतीति है।नयूटन आर्यभट्ट आदि वैज्ञानिकों ने पहले परिकल्पना की फिर उसमे गहराई तक घुस कर अनुमान की सत्यता की खोज की।जबतक सत्य का स्वयं अनुभव नहीं किया जाता वह वह शास्त्र रहता हैअर्थात् सुना और दूसरों द्वारा परीक्षित ।चूंकि वैज्ञानिकों का अनुभव उनके द्वारा परीक्षित अतः यदि हम उसे नहीं भी मानते हैं तो वे हमें अज्ञानी वैसे ही आनंदित होंगे जैसे एक बालक को तोतला बोलते देख माता पिता प्रमुदित होते है....उनकी आत्मा ज़रा भी कष्ट न पायेगी।सादर।
नीरज-
सीधे प्रश्नो का उत्तर सीधे ढंग से नही दे सकते तो अपनी उँगलियों और दिमाग को कष्ट न दें। सवाल अब भी वही है, क्या पृथ्वी की गति आभास मात्र है?
अरे हाँ, मेरा कमेंट भी सादर ही था।
बृजेश-
नहीं यह वैज्ञानिक सत्याहै
अनुज-
अभी तो योगेश जी आभास बता रहे थे।
बृजेश-
रिलेटिविटी का प्रश्न है... पृथ्वी से पृथ्वी को देखोगे तो यह अचला ही है सूर्य के सापेक्ष गतिमान है सूर्य भी आकाश गंगा के सापेक्ष गतिमान है
अनुज-
निरपेक्ष और शाश्वत सत्य सिर्फ ईश्वर ही है। बाक़ी सब मिथ्या ही है। अगर हम चलती ट्रेन में बैठे हो तो हमारे सापेक्ष ट्रेन स्थिर है परन्तु हम यही कहते है कि ट्रेन चल रही है। दैनिक जीवन की समान्य बातचीत में इसी तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। हर जगह दार्शनिकता, अध्यात्म और रहस्यवाद नही घुसेडा जाता, जैसा कि पोस्ट कर्ता ने अपने पोस्ट में किया। सादर
योगेश-
प्रश्न महत्वपूर्ण नही रहा । उन भौतिक विदो की पीड़ा को देखने वाली दृष्टि को बदलना आवश्यक था। जहाँ तक आप गति की बात करते है तो मैं बता दूँ, हाँ, संसार की समस्त घटना प्रतीतियाँ ही है। पृथ्वी की गति भी। आप जो देखते हो प्रतीति है। जो चखते हो प्रतीति है। सब मेरी ही प्रतीतियाँ हैं । किन्तु मैं कभी प्रतीत या आभाषित भी नहीं होता। कोई अपना ही क्या आभाष करे। प्रकाश स्वयं को प्रकाशित नही करता उसी प्रकार मैं स्वयं के लिए प्रतीति भी नही हूँ, आनुभवगम्य नही हूँ।
बृजेश-
धन्यवाद नीरज जी ,उत्कर्ष जी और योगेश जी चर्चा तो ज्ञान के लिए बहुत आवश्यक होती है मन नहीं खराब होना चाहिए आप लोगों के बीच बैठ कर थोड़ा मेरा भी ज्ञान बढ़ा इसके लिए धन्यवाद
योगेश-
माने जब गड्ढा आये तो आँख बंद करके कूदा जाता है और जब कलकत्ते का रसगुल्ला सामने हो तो आँख खोलकर खाया जाता है।
नीरज-
मैं क्या कहता हूँ उसका ज़िम्मेदार मैं हूँ, आप उसका क्या माने निकालते है उसका ज़िम्मेदार मै नही आप है
योगेश-
जी बिल्कुल सही, प्रभु आपको पहचानने में भूल के लिए क्षमा दान माँगता हूँ।
अनुज-
ओके ओके ठीक है। ( जम्हाई लेते हुए)
अनुज-
आप गीता ज्ञानी को वैदिक मनोचिकित्सक कहिये या होम्योपैथिक चिकित्सक, ये आपकी इच्छा है। परन्तु सामान्य बातचीत में अपनी व्यक्तिगत शब्दकोश का प्रयोग न करे। उन्ही शब्दों का प्रयोग करे जो सामान्य जन समझ सके।
योगेश-
सुझाव के लिए धन्यवाद वैसे यह मेरा व्यक्तिगत् मत नहीं है मुझसे पूर्व भी कई लोगो ने गीता मे उस गुण को देखा भी कहा भी।
अनुज-
कोई सन्दर्भ बताइये
योगेश-
आपने रजनीश ओशो के विचार पढ़े हैं वे सारे संदर्भ आपको दे देंगे। कृपया अवश्य जाँच लें।
अनुज-
उन्होंने किस किताब में वैदिक मनोचिकित्सक शब्द का प्रयोग किया है।
योगेश-
दादा मैं झूठा हूँ। आप सच्चे है। नमस्कार।
अनुज-
हा हा हा।
यह किसी संप्रदाय विशेष का ग्रंथ नही मानव मात्र का ग्रंथ है । इसपे मैनें कब सन्देह किया?
बृजेश- नीरज जी, यह आभास शब्द अच्छा है....मैं समझता हूँ आभास का अर्थ प्रतीति है अर्थात प्रति+इति यानि केवल अनुमान या सत्य की छाया। नीरज जी उगते सूर्य की किरणे जब पानी पर पड़ती हैं तो जो दीखता है वह सुनहरा पानी क्या सत्य है नहीं पानी तो रंगहीन है वहां तो मात्र प्रतीति है।नयूटन आर्यभट्ट आदि वैज्ञानिकों ने पहले परिकल्पना की फिर उसमे गहराई तक घुस कर अनुमान की सत्यता की खोज की।जबतक सत्य का स्वयं अनुभव नहीं किया जाता वह वह शास्त्र रहता हैअर्थात् सुना और दूसरों द्वारा परीक्षित ।चूंकि वैज्ञानिकों का अनुभव उनके द्वारा परीक्षित अतः यदि हम उसे नहीं भी मानते हैं तो वे हमें अज्ञानी वैसे ही आनंदित होंगे जैसे एक बालक को तोतला बोलते देख माता पिता प्रमुदित होते है....उनकी आत्मा ज़रा भी कष्ट न पायेगी।सादर।
बृजेश-
मरता तो वह है जिसका कोई भौतिक अस्तित्व होता है,चेतना आत्मा और विचारधारा इनका चूंकि कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है अतएव इनके मरने का प्रश्न ही कहाँ उठता है? वास्तव में व्यक्ति तीन स्तर पर जीवित होता है प्रथम तो शरीर के स्तर पर दूसरे चेतना के स्तर पर और तीसरे विचारधारा के स्तर पर । शरीर के स्तर पर तो सभी मनुष्य पशु पक्षी वृक्ष आदि जीवित रहते हैं लेकिन चेतना का निम्न स्तर ही रहता है इसे शिक्षा साधना और ध्यान आदि के द्वारा क्रमशः विचारधारा और आत्मा के स्तर तक उन्नत किया जा सकता है। उन्नत विचारधारा का व्यक्ति देश समाज और अपने काल का भला कर पाता है,किन्तु जब व्यक्ति का ऊँचाई आत्मा के स्तर पर आ जाती है...तब वह आत्मैव सर्व भूतनाम् का चिंतन करने लगता है। व्यक्ति की चेतना सबसे पहले मरती है.... मृत चेतना का व्यक्ति निर्दय और स्वार्थी होता है।सामान्य भाषा में इनकी आत्मा मर गयी है ऐसा कहा जाता है।विचारधारा युगों तक जीवित रहती है और आत्मा सदा अमर। मैंने तो ऐसा ही समझा है अपने बुज़ुर्गों की संगति में बैठ कर...और मुझे यही सच लगता है ।गीता का आशय भी यही लगता है।बाँकी विद्वानोँ की कहाँ कमी है?कुछ गलत कह गया हूँ तो मेरा ज्ञान बढ़ा दें।सादर
अनुज-
आपने तो इस पोस्ट की आत्मा को तृप्त कर दिया। साधुवाद
योगेश-
एक अजूबा ऐसा देखा मुर्दा खाये रोटी। #कबीर_दास क्या अर्थ है आत्मा मृत है और शरीर जीवित? आत्मा का जीवन मृत्यु से कुछ लेना देना नहीं है। वह एक तटस्थ तत्व है । काॅन्सटेंट एलिमेंट । सर्वत्र व्यापक शरीर मे भी, और उसके बाहर भी। उसे न देखने की दृष्टि समाप्त हो जाये तो दृष्टि नष्ट हुई न कि आत्मा। चेतना को मैं आत्मा की दृष्टि समझता हूँ। विचार को आत्मा का प्रकाश । जब चेतना और आत्मा के बीच जब कोई स्थूल तत्व विघ्न की तरह आता है तो हमे उसी प्रकाश के विरुद्ध एक सत्याभाषित छाया दिखती है। उक्त कथन ठीक वही सत्याभाषित कथन मात्र है। सत्य नही है।
अनुज-
सत्य तो सिर्फ ईश्वर है। बाकि समस्त जगत मिथ्या है। इस तरह देखा जाय तो सूर्य पूर्व में उदित होता है यह भी चक्षु भ्रम एवम् सत्याभाषित कथन मात्र है, सत्य नही।
योगेश-
सही कह रहे हो, पर कटाक्ष की तरह सही कह रहे हो। यह आपका उद्वेग ही सही किन्तु सत्य है। सूर्य न तो उदित होता है, न अस्त होता है। वह सिर्फ़ होता है। एक निश्चित समय पर एक निश्चित दिशा से आप उसका प्रकाश देख पाते है और फिर नही देख पाते। काल और स्थान का निश्चय आपकी भौतिक आवश्यक्ताओं की उपज है। यह आपका दैहिक सत्याभाष ही है चिरंतन सत्य नहीं।
अनुज-
सूर्य सत्य है या नही?
मुकुन्द हम्बर्डे-
यह विश्व तथ्य है । सत्य क्या है, नही पता !
अनुज-
जब पता ही नही फिर बहस समाप्त। जय राम जी की।
योगेश-
सवाल ही गलत किया है। फिर तो आपको सूर्य तक जाने कि क्या जरूरत है? आप पूछे पृथ्वी सत्य है या नहीं? और सबका निचोड़ मात्र इतना है कि पृथक पृथक गुणों को धारण किये हुए एक मैं ही हूँ जो सत्य है। तुम सूर्य से उत्पन्न प्रकाश को सत्य मानो या गहों से उत्पन्न अँधेरे को। वह सारा सत्य मैं हूँ सिर्फ मैं। अभिव्यक्ति मेरा अहंकार है। वही सूर्य की तरह चमकता है, काल की तरह नियमन करता है। ब्रह्मांण में स्थित असंख्य आकाश गंगा को तृणवत् तूफान में बहाती काॅस्मिक ऊर्जा का सत्य सिर्फ मैं हूँ। आप अपने चारों ओर जो भी देखेंगे वह मेरा ही अहंकार व्यक्त हुआ है। इस लिए आप किसी भौतिक ज्ञान का अहंकार न करना क्योंकि आपका कुल अहंकार मेरे अहंकार का अंदाजा भी नही लगा सकता।आप मेरे अहंकार का मात्र 0.02% भाग ही देख पाते हैं। आप विराट दर्शन के चक्कर में मुझ सूक्ष्म सत्य की अवहेलना किये बैठे है। संप्रति , आपका भला हो। मैं बहस नही कर रहा था, किन्तु आपने इसे बहस कह दिया , मन मेरा आहत हुआ। आपसे मेरी कोई स्पर्धा नहीं है । आप जीतोगे तो मैं जीतूँगा। मैं किसी सूरत में पराजित नहीं होता। सामान्य सखावत् चर्चा को आपने वाद प्रतिवाद क्यों समझ लिया?
अनुज-
प्रश्न तो अनुत्तरित ही रह गया... सूर्य सत्य है या नही?
योगेश-
वाह! कह तो दिया सत्याभाष है। मैं सत्य हूँ, सूर्य मेरा अहंकार है।और क्या उत्तर चाहिए?
अनुज-
हाँ या ना?
पृथ्वी की गति भी आभास है, और सूर्य भी आभास है। फिर वह चित्र भी आभास ही होगा। फिर आभासी चित्र पे चर्चा किस बात की?
योगेश-
किन्तु मैं तो आभाष नहीं हूँ, मेरा धर्म तो आभाष नहीं है, जब जब कोई मेरे धर्म के बीच कोई भ्रांति उत्पन्न करेगा मैं चर्चा करूँगा। या जो आवश्यक होगा वह सब। तुम्हारा सरोकार नहीं है तुम भले चले जाओ। चर्चा भी मत करो। और आत्मा मर गया है यह आम मुगलियां संस्कृति का अभ्यास सहज हो तो स्वीकार भी कर लो। मानना बड़ा आसान होता है जानना दुरूह।
पंकज-
विशेष अर्थ में लिखा है ।सही है
गीता में पढ़ा था, शरीर मर जाता है परन्तु आत्मा जीवित रहती है लेकिन आज के समय को देख रहा हूँ, किन्तु शरीर तो जीवित है लेकिन आत्माएँ मर चुकी हैं।
#योगेश-
आप जो देख रहे हैं वह भौतिक दृष्टि से देख रहे हैं इसलिए आपको ऐसा दिखता है। आत्मा आज भी जीवित है, कल भी रहेगी। आत्मा का विश्वास नष्ट किया गया है। भौतिकता को विश्वास प्रदान किया गया है। बस इतनी सी बात है।
अतः कृपया गीता को छुठलाने की अनुकंपा रहने ही दें। हो सके तो आत्मा पर विश्वास करें।
#अनुज-
भैया जी.. भाव को समझिये.. शाब्दिक अर्थ पर मत जाइये। आत्मा मर गयी" का मुहावरेदार प्रयोग किया गया है।
#योगेश-
नीरज जी इन्हीं भावों और मुहावरों ने तो शाश्वत मूल्यों का हनन किया है। ऐसा न समझें कि इस विचार ने जो समझाना चाहा है वह मैं नही समझा, किन्तु यह तय है कि मुहावरों के मोह में आपने वह नहीं समझा जो समझना चाहिये। मैं फिर याद दिला दूँ- आत्म दर्शन की दृष्टियों को मारा गया है ताकि आर्य पुनर्जागृत न हो सकें। भौतिक दृष्टि का सत्य आत्मा से नही जुड़ सकता। कभी नहीं। फिर भी आपको चारो ओर मृत आत्मा ही नज़र आती हैं तो किसी वैदिक मनोचिकित्सक से फौरन भेट करें।
#अनुज-
उपरोक्त चित्र से किस शाश्वत मूल्य का हनन हो गया मित्र? एक बेहद सामान्य वाक्य को आप बेवजह गीता विरोधी बताने पर तुले है। आम बोलचाल की भाषा और आध्यात्मिक शब्दावली में अंतर होता है। वैसे ये वैदिक मनोचिकित्सक क्या होता है?
#योगेश-
कुछ बाते शाश्वत सत्य होती है जो समय के साथ नही बदलती। जो गीता ज्ञानी है, उसी को मै वैदिक मनोचिकित्सक कहता हूँ। यह किसी संप्रदाय विशेष का ग्रंथ नही मानव मात्र का ग्रंथ है जो मनोदशा और उनके विकरों को कैसे नियंत्रित करें इस पर जोर देता है।
#अनुज-
पृथ्वी तो चलायमान है।यह शाश्वत सत्य है। फिर भी इसे अचला कहा गया है। फिर अचला शब्द तो सत्य विरोधी हुआ न।
#योगेश-
पृथ्वी तभी तक अचला है जब तक तुम पृथ्वी पर हो, देह के लिए वह अचला है, और आत्मा के लिए चलायमान।
अनुज-
क्या आत्मा पृथ्वी की गति महसूस करती है।
योगेश-
गति तो पृथ्वी का गुण है ही नही यह मात्र आभाष है। प्रकृति की समस्त शक्तियों का जो प्राण है वही सबकी गति का कारण है। परमात्मा ही सबकी गति का कारण है। वही प्रेरणा है। उसकी प्रेरणा समाप्त तो पृथ्वी अचला। गति रूक जाये। काल समाप्त, धर्म निःअर्थक । सबके अस्तित्व मे उसकी प्रेरणा है।
बृजेश-
आत्मा तो कोटि कोटि ब्रह्माण्डों की गति का अनुभव करती है फिर पृथ्वी की क्या बात....लेकिन इसका अनुभव व्यक्ति विशेष को तभी हो सकता है जब वह आत्मा की शाश्वत शक्ति से तो ओत प्रोत हो किन्तु पृथ्वी की आपेक्षितता से स्वयं को मुक्त कर ले....जैसे पृथ्वी की गोलाई का अनुमान या तो आप विज्ञानं की पुस्तकों में पा सकते हैं या अंतरिक्ष में प्रवेश कर ।पृथ्वी के पर्यावरण में तो यह लंबी और चौड़ी ही प्रतीत होगी।सादर
उतकर्ष सत्य-
त्रिपाठी बेहतर व्याख्या दी है आपने :)
अनुज-
पृथ्वी की गति आभास मात्र है?? आज newton, गैलीलियो, कॉपर निकस और आर्यभट्ट की आत्मा को बहुत कष्ट हो रहा होगा। धन्य है आप वैदिक मनोचिकित्सक महोदय। उत्कर्ष सत्यम
योगेश-
आपने जितनो के आत्मा में कष्ट का बीज बोया है, वहाँ शायद आपने ध्यान से देखा नहीं सदियों पहले मैंने आनंद का वृक्ष रोपा था। यह उनकी ही भौतिक शिक्षा का असर है कि मानव मात्र शनैः शनैः मेरे धर्म के निकट होता जा रहा है।
उतकर्ष सत्य-
आत्मा के मरने का अर्थ सात्विक चैतन्यता के विलोपन से निर्जीव हुई संरचना मात्र है वैसे शाब्दिक अर्थ में ये अजर अविनाशी परमात्मा का ही एक अंश होने की वजह से उसके सभी मूलधर्मो एवम् गुणों से युक्त है । सम्भवतः अभिधा और लक्षणा की रहस्यमय परिकल्पना के अत्यधिक अनुचित प्रकारांतर उपयोग मात्र से ही आत्मा की अतुलित और परमात्मा तुल्य शक्तियो का उचित आंकलन न हो पा रहा किन्तु वैदिक ज्ञान की सदाशयता के अभाव में सूर्य आदि नक्षत्र और कालपुरुष के पृथ्वी के ग्रहीय घूर्णन के बीच गुह्यता को अज्ञानतावश नकारना उचित नही । आभाषी संसार की स्थूलता कुछ नियमो से बंधी है जिनका विशद वर्णन अथर्ववेद के तृतीय मंडल में है कृपया दार्शनिकता और वो भी द्वैतवाद को वेदों के दर्शन से जोड़कर ही सत्य को सम्मुख रखिये अन्यथा आक्रमण तो इसीलिए विदेशी मिशनरिया कर ही पा रही है क्योंकि बचाव में हम वैदिक सत्य की वैज्ञानिकता को सामने नही रख रहे :)
अनुज-
आपने जितनो के आत्मा में कष्ट का बीज बोया है, वहाँ शायद आपने ध्यान से देखा नहीं सदियों पहले मैंने आनंद का वृक्ष रोपा था। यह उनकी ही भौतिक शिक्षा का असर है कि मानव मात्र शनैः शनैः मेरे धर्म के निकट होता जा रहा है। अब ई का है योगेश जी। बात तो पृथ्वी की गति की हो रही थी। अगर समय नही कट रहा हो तो टीवी देखिये। फेसबुक पे प्रलाप न करें। ;)
बृजेश-
नीरज जी, यह आभास शब्द अच्छा है....मैं समझता हूँ आभास का अर्थ प्रतीति है अर्थात प्रति+इति यानि केवल अनुमान या सत्य की छाया। नीरज जी उगते सूर्य की किरणे जब पानी पर पड़ती हैं तो जो दीखता है वह सुनहरा पानी क्या सत्य है नहीं पानी तो रंगहीन है वहां तो मात्र प्रतीति है।नयूटन आर्यभट्ट आदि वैज्ञानिकों ने पहले परिकल्पना की फिर उसमे गहराई तक घुस कर अनुमान की सत्यता की खोज की।जबतक सत्य का स्वयं अनुभव नहीं किया जाता वह वह शास्त्र रहता हैअर्थात् सुना और दूसरों द्वारा परीक्षित ।चूंकि वैज्ञानिकों का अनुभव उनके द्वारा परीक्षित अतः यदि हम उसे नहीं भी मानते हैं तो वे हमें अज्ञानी वैसे ही आनंदित होंगे जैसे एक बालक को तोतला बोलते देख माता पिता प्रमुदित होते है....उनकी आत्मा ज़रा भी कष्ट न पायेगी।सादर।
नीरज-
सीधे प्रश्नो का उत्तर सीधे ढंग से नही दे सकते तो अपनी उँगलियों और दिमाग को कष्ट न दें। सवाल अब भी वही है, क्या पृथ्वी की गति आभास मात्र है?
अरे हाँ, मेरा कमेंट भी सादर ही था।
बृजेश-
नहीं यह वैज्ञानिक सत्याहै
अनुज-
अभी तो योगेश जी आभास बता रहे थे।
बृजेश-
रिलेटिविटी का प्रश्न है... पृथ्वी से पृथ्वी को देखोगे तो यह अचला ही है सूर्य के सापेक्ष गतिमान है सूर्य भी आकाश गंगा के सापेक्ष गतिमान है
अनुज-
निरपेक्ष और शाश्वत सत्य सिर्फ ईश्वर ही है। बाक़ी सब मिथ्या ही है। अगर हम चलती ट्रेन में बैठे हो तो हमारे सापेक्ष ट्रेन स्थिर है परन्तु हम यही कहते है कि ट्रेन चल रही है। दैनिक जीवन की समान्य बातचीत में इसी तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। हर जगह दार्शनिकता, अध्यात्म और रहस्यवाद नही घुसेडा जाता, जैसा कि पोस्ट कर्ता ने अपने पोस्ट में किया। सादर
योगेश-
प्रश्न महत्वपूर्ण नही रहा । उन भौतिक विदो की पीड़ा को देखने वाली दृष्टि को बदलना आवश्यक था। जहाँ तक आप गति की बात करते है तो मैं बता दूँ, हाँ, संसार की समस्त घटना प्रतीतियाँ ही है। पृथ्वी की गति भी। आप जो देखते हो प्रतीति है। जो चखते हो प्रतीति है। सब मेरी ही प्रतीतियाँ हैं । किन्तु मैं कभी प्रतीत या आभाषित भी नहीं होता। कोई अपना ही क्या आभाष करे। प्रकाश स्वयं को प्रकाशित नही करता उसी प्रकार मैं स्वयं के लिए प्रतीति भी नही हूँ, आनुभवगम्य नही हूँ।
बृजेश-
धन्यवाद नीरज जी ,उत्कर्ष जी और योगेश जी चर्चा तो ज्ञान के लिए बहुत आवश्यक होती है मन नहीं खराब होना चाहिए आप लोगों के बीच बैठ कर थोड़ा मेरा भी ज्ञान बढ़ा इसके लिए धन्यवाद
योगेश-
माने जब गड्ढा आये तो आँख बंद करके कूदा जाता है और जब कलकत्ते का रसगुल्ला सामने हो तो आँख खोलकर खाया जाता है।
नीरज-
मैं क्या कहता हूँ उसका ज़िम्मेदार मैं हूँ, आप उसका क्या माने निकालते है उसका ज़िम्मेदार मै नही आप है
योगेश-
जी बिल्कुल सही, प्रभु आपको पहचानने में भूल के लिए क्षमा दान माँगता हूँ।
अनुज-
ओके ओके ठीक है। ( जम्हाई लेते हुए)
अनुज-
आप गीता ज्ञानी को वैदिक मनोचिकित्सक कहिये या होम्योपैथिक चिकित्सक, ये आपकी इच्छा है। परन्तु सामान्य बातचीत में अपनी व्यक्तिगत शब्दकोश का प्रयोग न करे। उन्ही शब्दों का प्रयोग करे जो सामान्य जन समझ सके।
योगेश-
सुझाव के लिए धन्यवाद वैसे यह मेरा व्यक्तिगत् मत नहीं है मुझसे पूर्व भी कई लोगो ने गीता मे उस गुण को देखा भी कहा भी।
अनुज-
कोई सन्दर्भ बताइये
योगेश-
आपने रजनीश ओशो के विचार पढ़े हैं वे सारे संदर्भ आपको दे देंगे। कृपया अवश्य जाँच लें।
अनुज-
उन्होंने किस किताब में वैदिक मनोचिकित्सक शब्द का प्रयोग किया है।
योगेश-
दादा मैं झूठा हूँ। आप सच्चे है। नमस्कार।
अनुज-
हा हा हा।
यह किसी संप्रदाय विशेष का ग्रंथ नही मानव मात्र का ग्रंथ है । इसपे मैनें कब सन्देह किया?
बृजेश- नीरज जी, यह आभास शब्द अच्छा है....मैं समझता हूँ आभास का अर्थ प्रतीति है अर्थात प्रति+इति यानि केवल अनुमान या सत्य की छाया। नीरज जी उगते सूर्य की किरणे जब पानी पर पड़ती हैं तो जो दीखता है वह सुनहरा पानी क्या सत्य है नहीं पानी तो रंगहीन है वहां तो मात्र प्रतीति है।नयूटन आर्यभट्ट आदि वैज्ञानिकों ने पहले परिकल्पना की फिर उसमे गहराई तक घुस कर अनुमान की सत्यता की खोज की।जबतक सत्य का स्वयं अनुभव नहीं किया जाता वह वह शास्त्र रहता हैअर्थात् सुना और दूसरों द्वारा परीक्षित ।चूंकि वैज्ञानिकों का अनुभव उनके द्वारा परीक्षित अतः यदि हम उसे नहीं भी मानते हैं तो वे हमें अज्ञानी वैसे ही आनंदित होंगे जैसे एक बालक को तोतला बोलते देख माता पिता प्रमुदित होते है....उनकी आत्मा ज़रा भी कष्ट न पायेगी।सादर।
बृजेश-
मरता तो वह है जिसका कोई भौतिक अस्तित्व होता है,चेतना आत्मा और विचारधारा इनका चूंकि कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है अतएव इनके मरने का प्रश्न ही कहाँ उठता है? वास्तव में व्यक्ति तीन स्तर पर जीवित होता है प्रथम तो शरीर के स्तर पर दूसरे चेतना के स्तर पर और तीसरे विचारधारा के स्तर पर । शरीर के स्तर पर तो सभी मनुष्य पशु पक्षी वृक्ष आदि जीवित रहते हैं लेकिन चेतना का निम्न स्तर ही रहता है इसे शिक्षा साधना और ध्यान आदि के द्वारा क्रमशः विचारधारा और आत्मा के स्तर तक उन्नत किया जा सकता है। उन्नत विचारधारा का व्यक्ति देश समाज और अपने काल का भला कर पाता है,किन्तु जब व्यक्ति का ऊँचाई आत्मा के स्तर पर आ जाती है...तब वह आत्मैव सर्व भूतनाम् का चिंतन करने लगता है। व्यक्ति की चेतना सबसे पहले मरती है.... मृत चेतना का व्यक्ति निर्दय और स्वार्थी होता है।सामान्य भाषा में इनकी आत्मा मर गयी है ऐसा कहा जाता है।विचारधारा युगों तक जीवित रहती है और आत्मा सदा अमर। मैंने तो ऐसा ही समझा है अपने बुज़ुर्गों की संगति में बैठ कर...और मुझे यही सच लगता है ।गीता का आशय भी यही लगता है।बाँकी विद्वानोँ की कहाँ कमी है?कुछ गलत कह गया हूँ तो मेरा ज्ञान बढ़ा दें।सादर
अनुज-
आपने तो इस पोस्ट की आत्मा को तृप्त कर दिया। साधुवाद
योगेश-
एक अजूबा ऐसा देखा मुर्दा खाये रोटी। #कबीर_दास क्या अर्थ है आत्मा मृत है और शरीर जीवित? आत्मा का जीवन मृत्यु से कुछ लेना देना नहीं है। वह एक तटस्थ तत्व है । काॅन्सटेंट एलिमेंट । सर्वत्र व्यापक शरीर मे भी, और उसके बाहर भी। उसे न देखने की दृष्टि समाप्त हो जाये तो दृष्टि नष्ट हुई न कि आत्मा। चेतना को मैं आत्मा की दृष्टि समझता हूँ। विचार को आत्मा का प्रकाश । जब चेतना और आत्मा के बीच जब कोई स्थूल तत्व विघ्न की तरह आता है तो हमे उसी प्रकाश के विरुद्ध एक सत्याभाषित छाया दिखती है। उक्त कथन ठीक वही सत्याभाषित कथन मात्र है। सत्य नही है।
अनुज-
सत्य तो सिर्फ ईश्वर है। बाकि समस्त जगत मिथ्या है। इस तरह देखा जाय तो सूर्य पूर्व में उदित होता है यह भी चक्षु भ्रम एवम् सत्याभाषित कथन मात्र है, सत्य नही।
योगेश-
सही कह रहे हो, पर कटाक्ष की तरह सही कह रहे हो। यह आपका उद्वेग ही सही किन्तु सत्य है। सूर्य न तो उदित होता है, न अस्त होता है। वह सिर्फ़ होता है। एक निश्चित समय पर एक निश्चित दिशा से आप उसका प्रकाश देख पाते है और फिर नही देख पाते। काल और स्थान का निश्चय आपकी भौतिक आवश्यक्ताओं की उपज है। यह आपका दैहिक सत्याभाष ही है चिरंतन सत्य नहीं।
अनुज-
सूर्य सत्य है या नही?
मुकुन्द हम्बर्डे-
यह विश्व तथ्य है । सत्य क्या है, नही पता !
अनुज-
जब पता ही नही फिर बहस समाप्त। जय राम जी की।
योगेश-
सवाल ही गलत किया है। फिर तो आपको सूर्य तक जाने कि क्या जरूरत है? आप पूछे पृथ्वी सत्य है या नहीं? और सबका निचोड़ मात्र इतना है कि पृथक पृथक गुणों को धारण किये हुए एक मैं ही हूँ जो सत्य है। तुम सूर्य से उत्पन्न प्रकाश को सत्य मानो या गहों से उत्पन्न अँधेरे को। वह सारा सत्य मैं हूँ सिर्फ मैं। अभिव्यक्ति मेरा अहंकार है। वही सूर्य की तरह चमकता है, काल की तरह नियमन करता है। ब्रह्मांण में स्थित असंख्य आकाश गंगा को तृणवत् तूफान में बहाती काॅस्मिक ऊर्जा का सत्य सिर्फ मैं हूँ। आप अपने चारों ओर जो भी देखेंगे वह मेरा ही अहंकार व्यक्त हुआ है। इस लिए आप किसी भौतिक ज्ञान का अहंकार न करना क्योंकि आपका कुल अहंकार मेरे अहंकार का अंदाजा भी नही लगा सकता।आप मेरे अहंकार का मात्र 0.02% भाग ही देख पाते हैं। आप विराट दर्शन के चक्कर में मुझ सूक्ष्म सत्य की अवहेलना किये बैठे है। संप्रति , आपका भला हो। मैं बहस नही कर रहा था, किन्तु आपने इसे बहस कह दिया , मन मेरा आहत हुआ। आपसे मेरी कोई स्पर्धा नहीं है । आप जीतोगे तो मैं जीतूँगा। मैं किसी सूरत में पराजित नहीं होता। सामान्य सखावत् चर्चा को आपने वाद प्रतिवाद क्यों समझ लिया?
अनुज-
प्रश्न तो अनुत्तरित ही रह गया... सूर्य सत्य है या नही?
योगेश-
वाह! कह तो दिया सत्याभाष है। मैं सत्य हूँ, सूर्य मेरा अहंकार है।और क्या उत्तर चाहिए?
अनुज-
हाँ या ना?
पृथ्वी की गति भी आभास है, और सूर्य भी आभास है। फिर वह चित्र भी आभास ही होगा। फिर आभासी चित्र पे चर्चा किस बात की?
योगेश-
किन्तु मैं तो आभाष नहीं हूँ, मेरा धर्म तो आभाष नहीं है, जब जब कोई मेरे धर्म के बीच कोई भ्रांति उत्पन्न करेगा मैं चर्चा करूँगा। या जो आवश्यक होगा वह सब। तुम्हारा सरोकार नहीं है तुम भले चले जाओ। चर्चा भी मत करो। और आत्मा मर गया है यह आम मुगलियां संस्कृति का अभ्यास सहज हो तो स्वीकार भी कर लो। मानना बड़ा आसान होता है जानना दुरूह।
पंकज-
विशेष अर्थ में लिखा है ।सही है
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