Sunday, 19 March 2017

जातिवाद बनाम वर्णाश्रम



" गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं। हमारी परंपरायें भी चेतना की वैसी है, अमृत धारा हैं, गंगा की तरह ही मुक्ति दायिनी हैं।जिसमें कुछ पनालों का मैल घुलकर उसे दूषित कर बैठा है, हमें उन पनालों को अवरुद्ध करना है, गंगा का नाश नहीं। "

जिस प्रकार से दहेज को एक सामाजिक कुप्रथा के रूप में पहले तो बढ़ावा दिया गया और बाद में उसकी निंदा की जाने लगी है, वैसा ही कुछ हमारी वर्णव्यवस्था के साथ भी व्यवहार किया गया। वह चेतना जो कर्म की व्यवस्था स्वीकारती थी उसने चुपचाप धीरे-धीरे वंश और रक्त को केन्द्र में ला दिया है। वर्ण ही जातियों का आधार बना। जाति केवल कर्म तथा योग्यता के वर्गों का वर्गीकरण है। किन्तु योग्यता का अभिमान और हीनता मानवीय दुर्बलता है। सांस्कृतिक संघर्ष के दौरान मानवता के शत्रुओं ने व्यवस्था का गुण इग्नोर करके उसकी दुर्बलता रेखांकित करते हुए उसपर जोर देकर प्रहार करने लगे है।

केरल एक ऐसा राज्य है जहाँ वामपंथी विचार धारा एवं सेक्युलरिज्म बहुसंख्य हो चुके हैं । अतः वहाँ लोग अपनी जाति प्रदर्शक उपनामों का प्रचलन समाप्त करते जा रहे हैं। आज लोग इसे बड़े क्रांति के रूप में देखते हैं। उनके शिक्षा के एवरेज की सराहना करते हैं। किसी भी शिक्षित समाज की सराहना में कोई बुराई नहीं है, किन्तु कल जब वह समाज अपनी चेतना के विस्मृत अतीत में होगा तब इसकी क्या गाॅरेन्टी है कि उच्च पदस्थ लोगों को अपने पद का अभिमान नहीं होगा? उनकी संततियाँ अपने पूर्वजों की कीर्ति का गुणगान नहीं करेंगे? तब क्या इस मानसिक दुर्बलता के कारण एक नई वर्ग श्रेणी नही बन जायेगी?

हमारे समाज को बीमारी क्या है और हम उसका इलाज क्या कर रहें है, यह बहुत ही विचारणीय सवाल है। हम रोगी को निरोग करने के बदले बीमारी से हार मानकर बीमार को ही मार देने की जड़ता भरा फैसला ले रहे हैं। इससे बीमार भले मर जाये और हमें कुछ समय के लिए लगे कि बीमारी खतम हो गई किन्तु ऐसा कभी नहीं हो सकता। बीमारी पुनः अपना जड़ स्थापित करेगी। इसलिए उचित उपचार की आवश्यकता है।

यह तभी संभव है जब लोग आत्मचेता हो जायें। मन को नियंत्रित करने की कला को साध लें। जाति व्यवस्था के प्रचलन में सुधार आवश्यक है, न कि संपूर्ण जाति को ही नष्ट करना।

मैं जातियों के अति आदर और निरादर की दूषित वृत्तियों का विरोधी हूँ, किन्तु शब्द 'जाति' से मेरा कोई द्वेष या घृणा नहीं।
जाति 'व्यवस्था' की अनिवार्यता है, किन्तु उसका मान तथा अवमान जीवन की निरर्थकता है।

अपनी वैदिक चेतना पर अविश्वास करना सांस्कृतिक पतन की राह है, बुराई समाप्त की जानी चाहिये किन्तु किसी व्यवस्था का अस्तित्व ही नष्ट करना उचित नहीं है।

वर्ण व्यवस्था दुनियाँ की सर्वोत्तम सामाजिक ज्ञान एवं बुद्धि आधारित व्यवस्था है।
यह वामपंथी या मार्कसवादी आह्वान है जो परंपरा और संस्कृति में सेंध लगा कर, सभ्यता की बहुमूल्य वैचारिक पूँजी लूट कर, एक अपरिपक्व समाजवाद की पताका फहराता है। उसका प्रचार तंत्र इतना तथ्यपरक होता है कि बहुधा बुद्धिमान भी भ्रमित होकर नाश को न्योता देने लगता हैं।

जाति बैन नहीं करना चाहिए इसके दूषित व्यवहारिका को सुधार किया जाना आवश्यक है।

जब कोई प्रबुद्ध सनातनी भी इस तरह का आह्वान करता है तब मन क्षुब्द हो जाता है, और अपनी सनातन चेतन धारा की गिरती शाख को देखते हुए चित्त बहुत विचलित होने लगता है।

अंत में मैं पुनः अपनी पिछली पोस्ट की तरह कहूँगा कि,"" गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं। हमारी परंपरायें भी चेतना की वैसी है, अमृत धारा हैं, गंगा की तरह ही मुक्ति दायिनी हैं।जिसमें कुछ पनालों का मैल घुलकर उसे दूषित कर बैठा है, हमें उन पनालों को अवरुद्ध करना है, गंगा का नाश नहीं। ""

यो. स. आर्यवर्ती