Saturday, 4 March 2023

कीर्ति

कीर्ति

तुम जो स्वेद से भींगे, 

चिढ़ चिढ़े सूरज की तीखी धूप में 

अपना लक्ष्य खोज रहे हो, 

नहीं जानते कि 

इसी मार्ग में 

आगे बहुत आगे 

सैकड़ों भुजाओं वाला 

एक रसीला नौजवान बरगद, 

हरे पत्तों के हँसी की, 

शीतल छाया लिए 

तुम्हारे आगमन की 

प्रतीक्षा में तप रहा है। 

मैंने देखा है, 

उसी शीतल छाया में 

अपनी दृष्टि की 

दिव्य सुगंधित फूल बिछाए, 

वह अत्यंत सुंदरी, 

तुम्हारी 

परम प्रियतम् 'कीर्ति', 

बेचैन है कि कब तुम्हारा आगमन हो 

और 

कब वह अपनी सुकोमल 

भुजाओं की आलिंगन में बांध कर 

स्वयम् मुक्त हो जाये। 

वह तुमपर न्योछावर होने को आतुर है, 

वह तुममें लीन होना चाहती है। 

इस अहिल्या की जड़ता में 

देखो राम ! 

तुम्हारी कीर्ति मुक्ति को कितना आतुर है? 

तुम पहुंचोगे न वहां तक?  

उसे अपनी ध्वजा बनाने?


3 comments:

Anonymous said...

मन में एक गहरी छाप छोड़ी हुई बहुत सुंदर उत्कृष्ट रचना..वाह

योगेश सुदर्शन मिश्र said...

उत्साह वर्धन हेतु सादर धन्यवाद।

योगेश सुदर्शन मिश्र said...

उत्साह वर्धन हेतु सादर धन्यवाद।