Monday, 7 January 2019

अग्निस्यरूपम्


(अब तक की संपूर्ण  कथा)

भाग-1
आज से 39 साल पहले जब मेरी चेतना की दृष्टि चारों ओर पड़ी तो देखा कि पतरा की दीवार थी लकड़ी के स्तंभ और इटालियन खपरैल का छत था। खाना-पीना, रोना-धोना तो लगा ही था। सुहाने दिन और भयानक रातों का परिचय भी वहीं हुआ।

एक वर्ष ऐसे ही बीते अब बुद्धि पर नातों और संबंधों के रज्जु पड़ने लगे थे। मुझे क्या पता माँ क्या बला है और तब मैं क्या जानूँ कि पिता किस तत्व को कहते हैं? मैं तो नानी की दुलार और नाना की मदमस्त सुरक्षा के बंधन से जकड़ा हुआ था। किसी और को जानता भी न था।

रेल्वे विभाग के लोहार खाते में एक बाभन उपनाम धारी प्राणी(मेरे नाना जी) सुलगती भट्टी की आँच के सामने लोहा पीट-पीट कर भी लोहार नहीं  बाभन ही था। कुछ संभ्रांत लोग मेरी जिस झोपड़ी के सामने से नाक पर खुशबू से लिप्त रुमाल रख कर साँस रोके गुज़र जाते थे वही स्थान मेरी नानी के वात्सल्य से मेरे लिए स्वर्ग था।
हाँ मुझे आज भी याद आते हों हे तारकोल की कालिख से लिप्त पतरा की दीवारों, बहुत याद आते हों! अनगढं लकड़ी के स्तम्भों, इटालियन खपरैलो, बरगद का दुधहा छाँव, और झोपडे के पार्श्व से अविरल बहती तीक्ष्ण गंध से युक्त विशाल नाला, मेरे जीवन में तुम्हारा महत्व किसी कालिंदी से कम नहीं।
नियति मेरी चेतना से तुम्हारी स्मृतियों को चाहे जितना यत्न करके पोछ देना चाहे पर उसकी योजना कभी सफल न होने पायेगी। मैं तुम्हें याद रखूँगा। कभी न भूलूंगा।
नानी ने कहा था, "गुड्डू कल चलेंगे, तुम्हारी माँ के यहाँ। तुम चलोगे?"

मैंने पूछा, "माँ?  यह क्या है?"

तब उन्होंने उसी पतरे की दीवार पर टँगे एक चित्र में सुन्दर सी यशोदा की चित्र दिखा कर बताया, "देखो! वो है। वैसी है।"

मैंने कहा, "ठीक है चलो।"

दूसरे दिन मैं और मेरी नानी दोनो ही किसी विशाल रूग्णालय के परिसर में थे। वातावरण में अजीब गंध था। मै सह नहीं पा रहा था। अपरिचित स्थान बुद्धि में भय बन कर छाता जा रहा था। हृदय काँप उठा। मैंने नानी से कहा,"अभी घर चलो।"
वे बोली,"बस अब हम पहुँच गये है, तुम अपनी माँ से मिलोगे न!"
इतना सुनकर स्मृति में माता यशोदा की वह आकृति उभर आयी। पर डर के कारण मेरा हाल बुरा था। मैं जिद्द करने लगा,"नहीं, अभी घर जाना है।"
पर नानी अविचल रही वो एक कक्ष में प्रवेश कर रही थी जहाँ बहुत से लोग गहरी वेदना से अजीब आवाजें निकाल कर कराह रहे थे। अजीब वेशभूषा था।थे तो मानव ही पर लगते न थे।
मैं वातावरण की भयानकता सह नहीं पाया और नानी की गोद से उतर कर उल्टे पाँव भागने लगा।
नानी एक खाट के पास रुक कर माँ को संबोधित किया," देख राधा कौन आया है आज!"
"के हौ अम्मा?"
"तोहार गुड्डू।"
"का! सच?"
"हाँ ।"
और नानी मेरे पीछे दौड़कर मुझे फिर उठा लायी। वह बोली,"देखो यह है तुम्हारी माँ।"

उस महिला के संपूर्ण बदन पर सफेद पट्टी बँधी थी। अभी कुछ देर पहले वह कराहकर और गिगिडाकर वैद्य से मृत्यु की याचना कर रही थी। हाँ, वही महिला वात्सल्य से भर गई। उसकी पीड़ा का अंत हो गया। वह बोली,"आवा लाल।"
पर मेरी हिम्मत न हुई।
मैं बेहद डर गया और भूत भूत चिल्लाकर भागा।
नानी ने कहा, "तेरी माँ है। डरो नहीं आओ।"
पर माँ तो पतरे के दीवार पर टँगी थी न!

भाग-2
😣😣😣😣😣😣

नानी अपनी बेटी राधा के कष्ट को याद करके अक्सर रो पड़ती थी। कोई दूरस्थ अतिथि आ जाता और राधा का हाल समाचार पूछ लेता बस! हृदय में स्मृतियों का प्रभंजन उठ खड़ा होता और फुफ्फुस में जेठ का लूह बहने लगता, नेत्रों से सावन की फुहार रिमझिम कर बरस जाती। फिर भी जीवन के प्राणों पर संभावित लांछन की सुलगती अग्नि बुझने का नाम न लेती थी।

वह उन्हें भरभराये कंठ और अश्रुपूर्ण नेत्र लिए बताती," उस रात राधा अपने छः महीने के बच्चे को लिए यहीं लोहे के पलंग पर कथरी बिछाये सोयी थी।नायलोन की हल्की फूल छापे की साड़ी में गौरांग बिटियाँ का रूप मेरे नेत्रों को शीतल कर रहा था। उनका रात पायली की ड्यूटी थी। जाते जाते काली जबान के स्वामी कह गये थे कि, "राधा के सिर से लैंप हटा देना।"
हम सब काम धाम में उनकी चेतावनी भूल गये। वैसे भी वह रोज़ वहीं जलता रहता था। राज और शिवकान्त बाहर कहीं सो रहे थे।
यहाँ मै शशिकांत को अपने पास लिए सो रही थी। बतियाते बतियाते रात का दूसरा पहर होने को था और नींद आ गई। सब सो गये थे। चेतना बिल्कुल सुन्न हो गया था।
रात के दूसरे पहर की बात है। अचानक मैने सुना राधा का छः महीने का बालक गुड्डू जोर-जोर से रो रहा था।
मैं खिन्न मन से उठी। मन में सोच रही थी कैसी है यह राधा भी। घोड़ा बेचकर सो जाती है मुन्ने का जरा भी ध्यान नहीं । पर देखा तो बता कुछ और ही था। मेरे लिए जो न होना चाहिए था नियति कुछ वहीं कर रही थी। कमरा आग की लपटों से धू धू कर जल रहा था। गुड्डू अम्मा अम्मा किये रोये जा रहा था। कमरे में प्रलय का भयानक प्रकाश और विषैला काला धुआँ भर गया था। हत बुद्धि सी मैं गुड्डू को राधा के पलंग से दूर ले गई। पर हाय! मेरी बेटी राधा अब भी उस पलंग पर चट चट करती बेसुध जल रही थी। नायलोन की वह सुन्दर साड़ी महाकाल धर्मराज का वह फंदा था जो उसे मृत्यु लोक खींचे लिये जाता। मैं क्या करूँ सोच नहीं पा रही थी। आस-पास के लोग पानी लाने आग बुझाने को दौड़ पड़े मैं आपने हाथों से राधा के शरीर पर फैलते मृत्यु के अटल अग्नि लपटों को बुझाने की कोशिश कर रही थी पर वह बुझने का नाम ही न लेता। बस कुछ समय की बात थी। जीवन की ज्योति बुझ जाने को थी।
बाहर राज दरवाजा पीट रहा था।
"अम्मा क्या हुआ? दरवाजा खोलो।"
मुझे कुछ सुनाई न दिया चार साल का शशिकांत गुड्डू को लेकर बाहर जाने के लिए किवाड खोल दिया। बस राज को अन्दर आने का अवसर मिल गया।
राज ने देखा माँ परेशान है और बेसुध बहन जलती जा रही है। उसके शरीर पर मोटा कंबल था। उसने आव देखा न ताव बस अपनी बहन को कंबल में लपेट कर उठा लिया और बाहर की ओर लेकर भागा। पड़ोसियों ने पानी डालकर कमरे की अग्नि तो शान्त कर दी किन्तु उन्हें जो करना था वे कर चुके थे।
मैं कुछ देर बाद होश में आयी। शशिकांत और गुड्डू को लेकर बहर निकली। क्या हुआ राधा बच पायेगी या नहीं?  कितनी जली है? गुड्डू का क्या होगा? दमाद को क्या जबाब दूँगी?
जवाब ढूँढ रही थी। सवालों ने घेर कर बेचैन कर दिया था। बाहर घंटों तक इधर उधर देखती रही। पर कोई न मिला न राज, न राधा और न ही कोई बताने वाला सब सवाल ही कर रहे थे,"कैसे हुआ यह सब?"
किन्तु इसका भी जवाब देते न बना।

भाग-3
😭😭😭😭😭😭😭😭
नानी ने आँसू पोछते हुए अपनी छोटकी भौजाई पानकुँवर को उस दिन का घटनाक्रम बता दिया। वह भी अपनी भांजी की दशा रूग्णालय में देख आयी थी। आँखों में आँसू स्पष्ट तो न थे किन्तु कुछ नम अवश्य हो आया था।
वह बोली,"दीदी! राधा बहुत बुरी तरह जल गई है। उसकी पीड़ा और कराह सुनकर तो घबराहट होती है। सच कहूँ वह डाॅक्टर से गिडगिडा रही थी मुझे बचा लो, मुझे मरना नहीं है। हाय! मेरा लाल।
पूनम के पापा बता रहे थे, "एक महीना पहले यही राधा डाॅक्टरो से कहती थी मुझे जहर दे दो। मार दो। दर्द सहा नहीं जा रहा है। तब पहुना वहीं थे। बेचारे का मुँह झुरा गया था। असमय यह कैसा आफत आ गया! उन्हें तो देख कर दया आती थी। मन करता था ऐसा क्या करूँ कि चमत्कार हो जाये । मुर्झाये लटके चेहरे पर रंग लौट आये। बहुत बेचैन दिखे! राधा जब मौत माँग रही थी तो वे तिलमिला उठे।
भर्राये गले से बोले,"यह क्या है गुड्डू की अम्मा! बस हार गई! इतना ही साथ है हमारा। मुझे अकेले छोड़ कर जाना है?"
राधा बोली,"देखते नहीं मैं क्या से क्या हो गई! नहीं रही पहले जैसी। यह रूप कोई देख ले तो डर जाये। क्या करोगे ऐसी कुरूप पत्नी का आतंक जिलाकर मर जाने दो मुझे। कहो उनसे कि मार दें मुझे।"
"नहीं ऐसा मत कहो प्रिय! तब तो शायद तुमने मुझे ठीक-ठीक समझा ही नहीं। हमारा प्रेम सिर्फ तुम्हारे रूप और रंग तक ही तो नहीं है। इससे बहुत आगे और बहुत गहरा है। तुम्हारे मन में मेरे लिए अगर थोड़ा सा भी प्यार हो तो तुम्हें मेरी कसम है तुम लाख पीड़ा सह लो, अंधी कानी या अपंग और अपाहिज होकर भी अपना प्राण न त्यागो। समझ लो यह पीड़ा सहकर गुड्डू की माँ उसके उज्वल भविष्य के लिए तप कर रही है। जैसे भी हो बस एक बार ठीक हो जाओ। पहले अपनी पलकों मे रखता था पर अब से अपने दिल में रखूँगा। साहस दिखाओ धीरज रखो। सब ठीक हो जायेगा।"
"देखते नहीं कितना जल गई हूं। बचकर भी किस काम की रहूंगी मैं? किसी पर बोझ होकर जीने से अच्छा है मर जाना। पर मैं अधम हूँ इतना जल जाने पर भी मेरे प्राण नहीं जाते।"
"नहीं ऐसे नहीं सोचा करते, हाथ पैर चलाना ही काम नहीं होता। साँस लेकर आदर्श स्थापित करना भी एक काम है। विपत्ति और पीड़ा देखकर कौन जीना चाहता है। कायरों का यही आदर्श है जीवन से पलायन! पर मुझे विश्वास है मेरी राधा ऐसी नहीं है। बोलो है न!"
राधा पीड़ा में भी हल्का सा मुस्कुरा दी थी। मानों वर्षों से निर्जल बंजर भूमि पर कोई एक हरे घास का अंकुर फूटा हो। मेरी आँख डबडबा आयी थी। उन दोनों के एकान्त संवाद में मैं विघ्न नहीं होना चाहता था। न जाने और कितने दिनों का साथ है। कल बात कर पाये या नहीं । मैं दूर से ही इतनी बात सुनकर हर्ष और खेद के परस्पर विरोधी भावों से भरकर रूद्धकंठ हो चला था। पहुना बिल्कुल देवता है देवता! इस कलयुग में देवता। बिल्कुल जीता जागता हाड मांस का देवता।" इतना बताकर उनकी आँखें बरस उठी थी और सुनकर गर्व से मेरी आँखें भी पर दीदी! गुड्डू के बाबूजी को इस घटना की सूचना किसने दी थी?"

(भाग-4)
🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞
अभी भोर में प्रथम प्रहर के पूर्व का एक याम शेष था। संजय को अजीब सी घबराहट हो रही थी। मन उचट रहा था।
वे सोने की कोशिश कर रहे थे। अवचेतन में वे साफ साफ सुन रहे थे गुड्डू खूब रो रहा था। पापा पापा गुहारता। एक अज्ञात अंध कूप में गिरता हुआ।
उन्होंने खुद बताया कि, "तब मैं चाहता था कि बचा लूँ गुड्डू को पर मैं तो सिर्फ़ दर्शक मात्र रह गया। हृदय का स्पंदन अनियंत्रित विस्तृत होता गया। हाथों की हथेलियाँ और पैर के तलुवे फूलते जा रहे थे। कितना भयानक दृश्य था। प्राणों का आल्हाद वह गुड्डू किसी अंधेरे में मुझसे दूर हुआ चाहता था और मैं उसे बचाने में असमर्थ हूँ! मैं बारंबार कूदता हूँ उस अंधेरी सुरंग में कि मेरा मेरे जीवन का अमृत न छलक जाये। जीवन का आनंद कलश न रीत जाये। पर हर बार मैं किनारे हो गया। कोशिश बेकार था। वह उस सुरंग में गिरता ही रहा। "पापा-पापा" की भयाक्रांत गुहार अनुगूँजित होती रही।
फिर अवचेतन का पटल तमस से भर गया। वह अनुगूँज शान्त .... गुड्डू कहीं विलुप्त। सिर्फ़ अंधेरा ही अंधेरा था।
कुछ क्षण बाद अंधेरे में किरण बिन्दु पुनः आकार ले रहे थे। एक सुन्दर सी नारी मानो अंबर की कोई अप्सरा किसी भव्य महल के वस्तु संपन्न शयन कक्ष में उन्नीदी सी लेटी थी। गुड्डू वहीं उस सुकुमार दिव्य काया का स्तन पान कर रहा था।
यहाँ अंधेरे और प्रकाश के संधिकाल का वातावरण था। मेरी चेतना को संबल मिला। परमात्मा तूँ धन्य है। एक पल में प्राणों का पोषण लेकर जीवन की लता को सुखा देता है और दूसरे ही पल अमृत से सींचकर पुष्पाच्छादित वल्लरी से वसंत का संचार कर देता है।
चतना और निकट जाने लगी। वह नारी किञ्चित भी हिल नहीं रही थी। सुगढ़ एवं परिष्कृत पाषाण विग्रह सी निश्चल!
कुशंकाएँ पुनर्जीवित होने लगी। कहीं वह राधा तो नहीं । अरे हाँ! यह तो वही है। एक सुन्दर शव! मैं खेद और विषाद से भर गया। गुड्डू की भूख का खेद! हाय विधा! तूँ कितना निर्मम है? एक अबोध शिशु की क्षुधा का भी निर्वाह न कर सका!धिक्कार है तेरी प्रभुता को। धिक्कार है, मेरे उन विश्वासों को भी जो तेरे प्रतीकों में आस्था की दिव्यता भर कर देखता है।तूँ इतना भी न कर सका? हाय मेरा बच्चा मातृहीन हो गया। शब्दहीन खेदयुक्त विचार निरंतर उपज ही तो रहे थे। दृश्य देखकर आँख भर आया था। मैं गुड्डू को उससे अलग करने को हाथ बढ़ाया ही था कि अचानक कक्ष का प्रकाश काँपने लगा। कभी अंधेरा तो कभी प्रकाश !
क्या देखता हूँ गुड्डू के आकार में विकृति.... वह विशाल दैत्य में निरूपित होता जा रहा था। राधा के वक्ष से रक्त का फौवारा फूट पड़ा। गुड्डू के रूप का वह मायावी महाकाल पुरुष अब मुझे घूर रहा था। भयानक अधरों पर रहस्य की मुस्कान तैर रही थी। तीक्ष्ण दाँतों से रक्त टपक रहा था।
मेरी चेतना में भीषण रव उत्पन्न हुआ। द्रुत ताल पर घंटा बज रहा था। घोर और भीषण शंख निनाद... मृदंग की भयानक थाप सवाल कर रहे थे, कैसे बचाओगे गुड्डू को ? देखो तुम्हारी प्रिया राधा का क्या हाल हो गया। मैं ले जा रहा हूँ इसके प्राण! क्या तूँ मेरा मार्ग रुद्ध कर सकता है?
अब वह दानव मेरी ओर लपका, मैं ही जीकर क्या करूँगा यही सोच रहा था कि चारों और धुआँ ही धुआँ फैल गया।राधा का धुंधलाता चेहरा विलुप्त होते होते कह रहा था,"अच्छा तो अब मैं चलती हूँ।"
सारे दृश्य किसी शून्य में विलीन हो गये।
मेरे काका पुकार रहे थे,"संजय, संजय! देखो कौन आया है। तुम्हारे श्वसुर! चलो उठो।"
और मैं  जाग गया। आशंकाये  सच होती प्रतीत हुई बाबूजी मुँह लटकाये बैठे थे। लगा जैसे अनर्थ घट चुका था।
तो क्या गुड्डू को कुछ हो गया है?
न मैं पूछ पा रहा था
न वे बता पा रहे थे।
बस इतना ही कहा हस्पताल चलना है।"

(भाग-5)
🏥🏥🏥🏥🏥🏥🏥🏥🏥

जीवन का एक यथार्थ, संघर्ष भी है। एक तत्व दूसरे से गुँथे हैं। दोनों में परस्पर सहयोग और द्वन्द्व भी है। नाश और निर्माण के इसी संतुलनात्मक सक्रियता को कोई काल कहता है तो कोई धर्म !
राधा उसी धर्म चक्र पर जीवन के प्रश्नों का उत्तर खोज रहीं थी। वह उत्तर जो किसी ग्रंथ में पूरा-पूरा लिखा न था। बिल्कुल अपूर्व और अछूता। अब उसे जीना था। मर्म की वेदना शरीर की तुलना में अधिक हो गई थी। वहाँ पर किसी वैद्य का लेप न जा पाता था। यदि मैं मर गई तो संजय के बाबूजी आदि उनका दूसरा विवाह करा देंगे। फिर गुड्डू मातृहीन होकर रह जायेगा। संभवतः अनाथ! एक तो उसके दोनों हाथ विकृत और अपंग हैं। तो क्या उसका भविष्य जेड ब्रीज पर बैठे उस भिक्षु जैसी है जो खुले आसमान के नीचे 'रघुपति राघव राजा राम,पतित पावन सीता राम।' गीत के भरोशे याचक वृत्ति से आत्महीन जीवन का बोझ घसीटता हुआ होगा!
नहीं यह मुझे मंजूर नहीं! उसके लिए यदि मुझे हजार बार मौत से लड़ना हो तो लड़कर हजारों बार पराजित करूँगी। हारूँगी नहीं । कोई विकल्प कहाँ शेष है? मुझे उसका जीवन सँवारना है। मैं विधाता के भरोशे नहीं बैठ सकती।

वैद्यों के अथक सेवा और सुश्रुषा का परिणाम था कि उसके शरीर के घाव भर रहे थे। मन में जीने की लालसा बलवान हो रही थी। पहले से बहुत अंतर आ गया था। मुर्झाया पौधा पुनः हरा होने लगा। रिश्तों के आपसी विश्वास और नेह ने असंभव को संभव कर दिया।

डाॅक्टरों ने उसे बताया तुम बहुत साहसी हो। हमें उम्मीद नहीं था तुम बचोगी। हमारे मेडिकल हिस्ट्री में यह पहली बार हुआ है कि सत्तर परसेन्ट जला हुआ कोई मानव भी बचा हो। यह किसी चमत्कार से कम नहीं। अब तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी। बस हौसला बनाये रखना। आज हम तुम्हें डिस्चार्ज कर देंगे पर समय से औषधि का सेवन करना और नियत समय पर परीक्षण कराते रहना।

मन का कैसा स्वभाव है। विपत्तिकाल में दृढ़ निश्चयी हो जाता है और शांतिकाल में शंका कुशंकाओं से घिर जाता है। अभी वह हजारों बार मौत को परास्त करने वाली अदम्य योद्धा थी और फिर अब उसका विश्वास फिर डग मग होने लगा। अनागत अंधकारमय दिखने लगा। व्यवहार की वास्तविकता भावुकता से प्रबल लगने लगी। क्या संजय सच में मुझे पहले सा मान दे पायेंगे? मन ही मन चेतना सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने लगी-

(भाग-6)

"आलोकित पथ करो हमारा
हे! जग के अंतरयामी।
शुद्ध चेतना प्राण शक्ति दो
जड़ चेतन सबके स्वामी।।

कर्म वह करें धर्म जयी हों
दुर्गम सत्य सदा विजयी हो
प्रज्ञा चक्षु ज्ञान की ऊर्जा
प्रच्छालित कर जीवन कामी।।

आलोकित पथ करो हमारा
हे जग के अंतर यामी।।"

जीवन रण का दिव्य अस्त्र वह
रूप हमारा तूँ ने ले लिया।
और तमस में विघ्न शैल पर
ध्यान धरूँ तेरा नाम रे नामी।।

आलोकित पथ करो हमारा
हे जग के अंतर यामी।।"

चेतन से अवचेतन की यात्रा तक यही प्रार्थना उठती रहीं।

आज से 39 साल पहले जब मेरी चेतना की दृष्टि चारों ओर पड़ी तो देखा कि पतरा की दीवार थी लकड़ी के स्तंभ और इटालियन खपरैल का छत था। खाना-पीना, रोना-धोना तो लगा ही था। सुहाने दिन और भयानक रातों का परिचय भी वहीं हुआ।
एक वर्ष ऐसे ही बीते अब बुद्धि पर नातों और संबंधों के रज्जु पड़ने लगे थे। मुझे क्या पता माँ क्या बला है और तब मैं क्या जानूँ कि पिता किस तत्व को कहते हैं? मैं तो नानी की दुलार और नाना की मदमस्त सुरक्षा के बंधन से जकड़ा हुआ था। किसी और को जानता भी न था।

 कुछ संभ्रांत लोग मेरी जिस झोपड़ी के सामने से नाक पर खुशबू से लिप्त रुमाल रख कर साँस रोके गुज़र जाते थे वही स्थान मेरी नानी के वात्सल्य से मेरे लिए स्वर्ग था।
हाँ! मुझे आज भी याद आते हों, हे! तारकोल की कालिख से लिप्त पतरा की दीवारों, बहुत याद आते हों! अनगढ़ लकड़ी के स्तम्भों, इटालियन खपरैलो, बरगद का दुधहा छाँव, और झोपडे के पार्श्व से अविरल बहती तीक्ष्ण गंध से युक्त विशाल नाला, मेरे जीवन में तुम्हारा महत्व किसी कालिंदी से कम नहीं।
नियति मेरी चेतना से तुम्हारी स्मृतियों को चाहे जितना यत्न करके पोछ देना चाहे पर उसकी योजना कभी सफल न होने पायेगी। मैं तुम्हें याद रखूँगा। कभी न भूलूंगा।

यहाँ पत्थर के फर्श पर चिथरे चिथरे वस्त्रों के रंग बिरंगे अस्तित्व को नानी की सूचिका ने जोड़ कर सुगढ़ कथरी का बिछौना बनाया था। जिसपर न जाने कितनी रात नाना की छाती पर औधे मुँह चिपक कर सोया था। उनकी सुरक्षा का विश्वास निद्रादेवी को सुगमता से लाकर मेरी पुष्पित चेतना का अर्घ उन्हें समर्पित कर देता था।
उस विश्वास को कैसे भूल जाऊँ? उन निश्चिंत नीदों को कैसे भुला दूँ?

वह बस्ती संयुक्त सांस्कृतिक लोगों से सुसज्जित और शोभित था। आप पास से विभिन्न भाषाओं की ध्वनियाँ उठती जो सब में इतनी भिन्नता के अतिरिक्त भी बंधुता का बोध कराती।
कभी आवाज वायु में प्रश्नवाचक होकर तैरता,"सापड़िया?"
कभी शुभकामना का बोध लेकर उभर उठता,"गुड माॅर्निंग।"
तो कभी किसी का नेह निमंत्रण भी होता,"अरे!गुड्डू तूँ तिकडे काय करतो? ये की!" वह चहल पहल जैसे कोई एक ही विशाल संयुक्त परिवार! उन सबकी एक ही जाति थी एक ही वर्ग था और वह था सिर्फ़ गरीबी और दरिद्रता। पर नहीं मैं उन्हें दरिद्र भी कैसे कह सकता हूँ?  सब स्वभाव से राजा थे। सुख की पूँजी बिना सोचे बिचारे दान कर देते थे और दुख को आपस में बाँट लेते थे। धारावी लेबरकैंप के हे निर्धन श्रमिकों मैं आप लोगों को कैसे भूल सकता हूँ?

वहीं मुझे दो मित्र भी मिले एक थी सुनैना और दूसरा था डैनियल! वह कुछ ही दिनों की आत्मीयता चेतना रज्जु में कस कर बँधा हुआ पड़ा रह गया है। उनके साथ खेलना। लालच,क्षोभ,ईर्ष्या,स्पर्धा और द्वन्द्व हमारी चेतना में इन भावनाओं का अस्थाई संचार था। यदि कुछ स्थाई था तो केवल प्रेम! सभी भावनाओं से तटस्थ केवल प्रेम!!
इनके बीच मेरे शैशव के आठ नौ सौ दिन बीते थे। अब मेरी आयु अंतरीक्ष पथ पर सूर्य का तीसरा परीक्रमा आरंभ कर चुकी थी।
नानी उदास थी कल संजय गुड्डू को ले जाने आने वाले हैं। वह चला जायेगा। इसका रोना-धोना जिद करना अब नहीं सुन पायेंगे। आज इसे इसके पसंद का व्यंजन दो इसके आत्मा को अपने प्रेम से सींच लो फिर वह इतना अविरल न मिलेगा।
वे अनमने होकर नाना से बोली,"आखिर जिस पेड़ की डाल है उसी में लगेगा।"
नाना पूछे,"क्या हर्ज है अगर अभी कुछ दिन यहाँ और रह जाये!"
वे बोली,"उनका बच्चा है,उन्हें जानेगा नहीं तो कैसे चलेगा? पढ़ाना लिखाना है वो स्कूल में नाम डालने की सोच रहे हैं। हमारा मोह बच्चे का भविष्य तो खराब नहीं कर सकता। इसे जाना होगा।"
"पर यह यूँ अचानक न जायेगा। बहुत रोयेगा। चाहो तो पूछकर देख लो।"
"क्यों बेटा! तुम अपनी अम्मा के पास जाओगे न! कल तुम्हारे पापा तुम्हें लेने आयेंगे।"
"नहीं, मैं कहीं नहीं जाऊँगा यहीं रहूँगा नानी सिर्फ तुम्हारे पास हमेशा हमेशा।"
"पर वो तुम्हारे पापा है न! वो तो जबरदस्ती तुम्हें ले जायेंगे।"
"मैं रास्ते में चिल्लाऊँगा कि यह चोर है मुझे चुराकर ले जा रहा है। यह मुझे बिरिज के खंबे में नीचे गाड़ देगा मुझे बचाओ। तब सब उनको मारेंगे और मैं भाग आऊँगा। देखना वो न ले जा पायेंगे।"......

क्रमशः......

🌷🙏योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती 🙏🌷

गौरवगाथा



पंडित चंदनधारी के सुपुत्र मंगला प्रसाद त्रिपाठी का विवाह बनारस के आचार्य श्री आचार्य विचित्र शास्त्री की कन्या शुभांगी से तय किया गया था। विचित्र शास्त्री जी, बनारस में विख्यात संपूर्णानंद संस्कृत विद्यालय के सेवा निवृत्त प्राचार्य थे। इसका सीधा अर्थ था, कि विवाह में कन्यापक्ष से बनारसी विद्याभिमानी, गौरवपुष्पित विद्वत मंडल अवश्य उपस्थित होने वाले थे। जिनके शास्त्रोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए पंडित चंदनधारी ने वर पक्ष के पुरोहित केशवपुर पीठ के पीठाधीश आचार्य केशव शास्त्री जी को निमंत्रण दिया हुआ था।

निमंत्रण स्वीकार लेने का अर्थ था, बनारस की पीठ से शास्त्रार्थ की चुनौती मोल लेना। अब तक केशवपुर पीठ की मान मर्यादा सुरक्षित थी। पर शायद आगे कोई अनहोनी न हो जाये, निमंत्रण हाथ में लेकर केशव शास्त्री तय नहीं कर पा रहे थे। उनके पेट में एक बेचैन तितली उड़ रही थी। वे अपनी पीठ के गौरव स्तंभ अपने दादा जी को याद कर रहे थे। जो जौनपुर के दरबार में ज्योतिषज्ञ राजपुरोहित थे।

ज्योतिष विद्या में उनकी ख्याति ऐसी थी कि वे किसी भी घटना का सटीक भविष्यवाणी दिन याम घटी और पल तक बता देते थे। कहते हैं कि, राजा की इच्छा हुई वे अपने मृत्यु का समय जानने को उत्सुक थे। वे स्वयं अपने लिए मरणोपरांत प्रेत वस्त्र अथवा शवाच्छादनपट लेना चाहते थे। पुरोहित ने यद्पि अरंभ में मना करना चाहा, तथापि राज-हठ ने उन्हें गणना के लिए विवश कर दिया। उन्हें जब गणना किया तो पता चला कि वह अशुभ घड़ी अगले ही दिन साँयकाल को है। राजा एक दम स्वस्थ थे। वैद्य ने परीक्षण किया, उन्हें कुछ हुआ नहीं था। आचार्य ने जो स्थान बताया था, उसने इतने शीघ्र कोई अनहोनी होने की कोई सोच भी नहीं सकता था। महल के भरे दरबार में वैद्य के रक्षा दल के होते हुए भला राजा को क्या हो सकता था? तथापि आचार्य ने कहा है, इसलिए वे मनमौजी राजा अपने लिए स्वयं मंडी से प्रेत वस्त्र ले आये थे। समय बीत रहा था। राजा बिल्कुल ठीक थे, सुरक्षा बिलकुल सतर्क था। सबको लगने लगा कि यह भविष्य गणना गलत हो जायेगी। वह ज्योतिष स्वयं चाहता था, उसकी गणना गलत हो जाये। इसलिए तो मृत्यु टालने केलिए महामृत्युंजय मंत्र का पाठ कर रहा था। पर जो होना होता है, उसे कोई विद्या टाल नहीं सकती। सत्य तो वैसे भी अटल होता है। नियत समय के एक घटी पूर्व राजा को बेचैनी होने लगी, दरबारियों को लगा शायद मृत्यु के भय से ऐसा हो रहा है। वैद्य को अब भी किसी रोग का लक्षण नहीं मिला। जैसे जैसे समय निकट आता रहा राजा को लगा जैसे सिर में विस्फोट हो जायेगा। और फिर...... वहीं हुआ जो तय था।
राजा की अंतिम विदायी उनके इच्छानुसार उसी प्रेतवस्त्र में किया गया, जो वे स्वयं अपने लिए लाये थे।

केशवपुर के आचार्य अपनी विद्या ज्ञान के लिए जितना पूरे क्षेत्र मे विख्यात थे। उससे कहीं अधिक बनारस संपूर्ण आर्यावर्त में अपने ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था। यही बात केशव शास्त्री के चिंता का करण था।

सहसा उन्होंने देखा, उनका श्रेष्ठ शिष्य कच्ची पगडंडी के रजकण अपने चरणाघात से उड़ाता चला आ रहा था, केशव को प्रतीत हुआ मानो, मार्ग का रजकण नहीं बल्कि वह उनके जीवन के अपयश और भय को उड़ा रहा है। उनके नेत्र किसी दिव्य आभा से प्रदीप्त हो उठे।

यह घटना सन 1974-75 की है। शायद जेपी आन्दोलन का दौर भी इसी काल के कुछ आगे-पीछे हो। इस घटना का संबंध राजनीति से नहीं, केवल उस समय की सांस्कृतिक चेतना को प्रस्तुत करने से है।

एक छोटे से गाँव में शिव प्रेम की दिव्य ज्योति युवा हो रही थी। यद्यपि वह मैकालयीन व्यवस्था के शैक्षिक संस्था में अध्ययन करता, किन्तु उसे गुरुकुल परंपरा की वैदिक शिक्षा में स्वस्फूर्त रुचि होने के कारण, केशवपुर पीठ के आचार्य से विशेष लगाव रहा। इनके मेल मिलाप को कोई बाहर से देखकर कभी कह नहीं सकता कि कहीं कोई शैक्षणिक गतिविधि है। केवल आपसी संबंधों का मेल मिलाप भर लगता था, किन्तु शिक्षा और संवाद का गहरा रिश्ता होता है। दोनों ही घंटों किन्हीं वैदिक या वैज्ञानिक विषयों पर चर्चा करते थे। आचार्य अपने शिष्य से आयु में कोई पाँच दस वर्ष ही अधिक अनुभवी होंगे। अतः संबंध गुरु शिष्य का कम और मित्रवत् अधिक था, किन्तु आचार्य जी तो धन्य थे, उन्हें एक विलक्षण शिष्य मिला था। यद्यपि कभी उन्होंने यह भाव प्रगट नहीं किया।

शिष्य संस्कृत में भाँति भाँति के छंद रच कर उन्हें दिखाता, दावा करता कि," गुरुजी, देखिये, यह हमने रचा है।"

आचार्य कुछ पल रचना को निहारते और मुस्कराते हुए कहते,"क्या तुम मुझे उल्लू समझते हो, कि मैं कालीदास को नहीं पढ़ा हूँ?  अरे, यह तो कालीदास की रचना है।"

युवक ने कहा,"गुरु जी, निश्चय आप कालीदास को पढ़े होंगे, किन्तु यह तो श्री रामकृष्ण प्रिय अर्थात् मैंने लिखा है, आप इसमें मेरा दोष बताइये।"
वे निवेदन को हँस कर टाल गये। उन्हें विश्वास नहीं था कि युवक इतना निर्दोष छंद लिख सकता है। उधर वह युवक भी बहुत हैरान था, गुरु तो कोई दोष देखता ही नहीं, उल्टा उन्हें विश्वास ही नहीं कि छंद का मौलिक रचनाकार मैं हूँ। मेरी रचना को कालीदास की रचना कहते हैं। यद्यपि इस तुलना में मेरा ही गौरव है, किन्तु गुरु की दृष्टि में मैं चोर हूँ। यह दृष्टि भ्रम भी दूर करना होगा, तब देखते हैं कि मेरी रचना में कितने दोष निकलते हैं। जब तक उन्हें सब रचना कालीदास की लगती रहेगी, तब तक वे उसमें दोष नहीं देखने वाले।

अगले भेंट में युवक चार पाँच विविध छंद में  एक ही भाव-विचार की रचना लेकर प्रस्तुत हुआ, कहा, "इसे कालीदास ने लिखा है, मैंने कई बार इन्हें पढ़ा, इनमें एक जगह दोष है, क्या आप बता सकते हैं गुरुजी, वह दोष क्या है?"

आचार्य दोष खोजने के लिए प्रत्येक छंद पढ़ गये, किन्तु उन्हें कहीं कोई दोष मिला ही नहीं। उन्होंने अर्थ की समानता पर ध्यान नहीं दिया था। बोले, "नहीं, छंद के नियमों में कहीं कोई दोष नहीं है। कालीदास छंदों के प्रयोग में सिद्धहस्त थे। भला उनसे कैसे दोष संभव है?"

अब शिष्य की बारी थी, उसने कहा, "गुरुजी, दोष तो है, आप नहीं देख पाये। कालीदास पागल है, उसने एक ही बात बार-बार अलग अलग छंद में लिखकर पुनरुक्ति दोष किया है। यह दोष उसने जानबूझकर किया है। क्योंकि उसका गुरु उसकी अपनी रचनाओं में दोष नहीं दिखाता, वर्ना कौन कवि होगा जो एक ही बात कहने के लिए एकाधिक छंद का उपयोग करके श्रम और काल की हानि करेगा? क्या कालीदास ने कहीं किया है ऐसा? यदि नहीं तो वह पागल कालीदास मैं ही हूँ गुरुजी।"

गुरु की तंद्रा टूटी, शिष्य ने बात तो बिल्कुल ठीक कही थी। उन्होंने स्वीकार लिया कि युवक ने मौलिक रचना की है। अब उसे दुबारा देखा। कवि, केवल एक जगह शब्द रूप लिखने में चूक गया था। जिसे सुधारने के लिए गुरु ने कह कर आश्चर्य व्यक्त किये बिना नहीं रह सके। यह तो स्नातकोत्तर विद्या है, यद्यपि ऐसी कुशलताएँ शिक्षा की मोहताज नहीं होती, तथापि ऐसी रचना करना तो मेरे लिए भी संभव नहीं है।

गुरु द्वारा किया हुआ प्रसंशा, शिष्य को जीवन सत्व देता है, कौशल में संजीवनी फूँकता है, आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाता है।

शिष्य को निकट देखकर शास्त्री जी बहुत आश्वस्त हुए। उन्होंने अपनी दुविधा उस युवक से समक्ष रखी, और कहा कि "अब इस पीठ की ओर से शास्त्रार्थ में तुम्हें सम्मिलित होने जाना है। केशव पुर की ओर से तुम्हीं आचार्य होगे।"

युवक भी घबराया, बनारस का विद्वत्परिषद् उसे अनुमान था, मानों हाथी की तुलना चींटी से की जा रही थी। लेकिन केशव शास्त्री आश्वस्त थे, यदि उन पंडितों के सम्मुख यदि कोई अपने धैर्य से खड़ा रह सकता था तो केवल वही युवक। उन्होंने समझाया, " तुम तनिक भी विचलित न होओ, यह केशवपुर पीठ के सम्मान का प्रश्न है, यदि मैं गया तो शास्त्रार्थ में पराजित होने पर पीठ की प्रतिष्ठा पर बन आयेगा, तुम गये तो सब बना रहेगा। मैं जानता हूँ, तुम कभी उनसे हार नहीं सकते, और यदि तुम हार जाओगे तो उनसे मैं तो निश्चित ही हार जाऊँगा। तुम्हें शायद नहीं पता, तुमने कई बार मुझे हराया है। तुम नहीं जानते, आज तक जब मैं तुम्हें नहीं जान सका, तो भला वे क्या जान पायेंगे। तुम जाओ, तुम जरुर जीतोगे। तुम्हारे हार से भी इस पीठ की प्रतिष्ठा पर अधिक आँच नहीं आने वाली। जीत गये तो इसी शोभा अनगिनत चंद्रिकाओं की आभा दीप्त हो उठेगी। मुझे ऐसा ही प्रतीत हो रहा है।"

शिष्य सिर झुकाये रहा, मना नहीं कर पा रहा था। उसे भी गौरव और रोमाञ्च के साथ साथ भययुक्त झुरझुरी भी मालूम दे रही थी। पर अब तो जाना ही था।

वह दिन भी आ गया, शिष्य के द्वार पर एक द्रुतगामी वाहन आकर रुकी थी। जो शायद आयी थी, पंडित केशव शास्त्री को लेने, लेकिन उन्होंने अपने स्थान पर शिष्य को नियुक्त किया हैं, ऐसी सूचना दिलाई और स्वयं कहीं अन्यत्र व्यस्त थे। अतः वाहन शिष्य को द्वार पर उसे लेने आ धमकी थी। युवक के पास कोई उत्तम वस्त्र नहीं था, उसने एक खादी का कुर्ता लिया था, जो बहुत ढीला था, और पायजाम जो चूडीदार नहीं बल्की वह भी ढीला बेलबाॅटम की तरह था। कुर्ता इतना लंबा कि वह पैर की एड़ी से एक बालिस्त ऊपर तक झूल रहा था। युवक की काया इतनी क्षीण थी कि लगता था मानो, किसी हैंगर पर वस्त्र सूख रहा हो। ताम्रवर्ण का वह युवक किसी कोण से केशवपुर का आचार्य नहीं लग रहा था। अशास्त्रीय वेशभूषा ऐसा था मानों मेघ के भयानक समूहों ने प्रचंडतेजवान सूर्य के परिचय को घेर कर रहस्य के कोष में छिपा लिया हो। वह असाधारण युवक सचमुच असाधारण ही था। साधारण लोग भी समयानुसार अपने वेशभूषा का खयाल तो रखते ही थे, किन्तु वह इस संबंध में निरुपाय था।

संप्रति वह तैयार होकर बारात के साथ वहाँ गया, जहाँ होने वाली घटनाएँ घटित होने को आतुर थी। इधर बारात द्वार पूजा को चली, उधर वर पक्ष के आचार्य को दीर्घ शंका के निवारण हेतु अलोप होना पड़ा। वरपक्ष और कन्यापक्ष आमने-सामने खड़े थे। कन्यापक्ष ने मंगलाचरण से श्रीगणेश किया, तदोपरांत शास्त्रार्थ का सवाल जवाब होना था। वर पक्ष की ओर से पंडितों की पंक्ति में अपने रूप की कांति से माथे पर तिलकचंदन लगाये वर के पिता जी ही आचार्य प्रतीत हो रहे थे। किन्तु वे संस्कृत भाषा के जानकार नही थे अतः शास्त्रार्थ के लिए कन्या पक्ष के आचार्य ने जो कुछ उन्हें संस्कृत मे निवेदित किया, वे समझ नहीं पाये। उनके साथ खड़े एक पेडित जी ने जब उन्हें बताया कि कन्या पक्ष के आचार्य उन्हें वर पक्ष का आचार्य समझकर शास्त्रार्थ आरंभ करने को कह रहे हैं। अब वे चकपकाये, उच्च स्वर में घोषित किया,"अरे नहीं - नहीं, मैं तो वर का पिता हूँ,  हमारे आचार्य तो शायद पीछे कहीं हैं...."  पंडित तिलकधारी की दृष्टि श्री रामकृष्ण प्रिय को खोजने लगी।

अब तो सब लोग आचार्य का अनुसंधान करने लगे। कन्या पक्ष के विद्वानों की उत्कंठित दृष्टि भी उन्हें देखने को अकुला उठी। तभी, विचित्र वेष से सुसज्जित वह क्षीणकाय युवक दूर से आता दिखा। तिलकधारी भी प्रसन्नतायुक्त उच्छ्वास त्यागते हुए, उस युवक के माथे पर तिलक लगाकर जोर से घोषणा कर दिये, "देखिये, वर पक्ष के आचार्य यह रहे।"
बनारसी आचार्यों ने बड़े विस्मय से पंडित रामकृष्ण प्रिय की ओर देखा। वे कहीं किसी कोण से आचार्य लगते ही नहीं थे। उन्हें वर पक्ष के आचार्य को सूचित किया, "द्वार पूजा में मंगलाचरण संपन्न हो चुका है, अब परंपरानुसार कन्या पक्ष के आचार्य शास्त्रानुसार प्रश्न करता है। किन्तु यह अवसर हम आपको देते हैं, यदि कोई संशय हो तो पूछिये?"
रामकृष्ण ने बिना एक पल सोचे,"प्रतिवाद किया, नहीं, मैं संशय मुक्त हूँ। कोई शंका नहीं है। यदि आपको हो तो आप कहिये।"
कन्या पक्ष के एक वयोवृद्ध आचार्य, जिनकी आयु नब्बे से अधिक हो चुकी थी, साफा पगड़ी पहने हुए, वैष्णव तिलक लगाये हुए, अपनी सुदीर्घ काया और गौर वर्ण की कांति से सौंदर्य की अनुपम अनुभवी छटा बिखेर रहे थे। अत्यंत अस्फुट स्वर में, एक बार ही, कह उठे, "साधु।"
शास्त्र विवेचना को अमृत से सींचने वाला एकमेव यही शब्द है। इससे विश्वास दृढ़ होता है। रामकृष्ण आश्वस्त हुए।
कन्यापक्ष के आचार्यों ने, वर पक्ष के आचार्य की वेशभूषा पर आपत्ति व्यक्त करते हुए प्रश्न किया, "क्या आपने जो वेशभूषा धारण किया है, वह म्लेक्ष वेषभूषा नहीं? क्या सनातनी वेष भूषा यहीं है? आप हमारी शंका का समाधान करें?"
वर पक्ष के आचार्य ने, सोचा था कि शायद पुरुष, प्रकृति या ब्रह्म के संबंध में कोई प्रश्न किया जायेगा, इस प्रश्न के लिए वे तैयार नहीं थे। जीवन कहाँ मोड़ लेगी, किसे पता होता है? हम जिस समस्या के लिए तैयार होते हैं, बहुदा वह नहीं आती, होना होता है, वह कोई पहले से नहीं जान पाता। तथापि बिना विलंब किये पंडित श्री रामकृष्ण जी ने कहा, "मैं नहीं समझता कि मेरा धारण किया हुआ वस्त्र म्लेक्ष है। यदि यह वस्त्र म्लेक्ष है, तो निश्चय ही वह वस्त्र भी म्लेक्ष है, जिसे आप सभी विद्वत् जनों ने धारण किया।"
यह उत्तर पा कर सम्मुख बैठे सभी विद्वान क्रुद्ध होने लगे। आवेग में कह उठे, "बताओ, हमारा वस्त्र म्लेच्छ कैसे है?"
रामकृष्ण अपने संपूर्ण विश्वास से मुस्कुराए, उनका लक्ष्य अचूक रहा, प्रतिक्रिया उनकी सफलता का द्योतक था। सविनय कहा, "इस प्रश्न का उत्तर तो आप लोगों को देना चाहिए कि, मेरा वस्त्र म्लेच्छ कैसे है?"
वे एक साथ सनातन वस्त्र की विवेचना करने लगे, "सनातन वस्त्र वह हैं, जो न कहीं से काटा गया हो, न कहीं सूई से सिलाई करके जोड़ा गया हो। हम ने जो, उत्तरी, धौत्र, कौपीन, पगड़ी आदि धारण किया हैं, वह सब इस परिभाषा से पोषित होने के कारण सम्यक सनातन वेशभूषा है, जब की आपने जो कुर्ता पाजामा पहना है, या आज कल जो लो आंग्ल  वेशभूषा धारण करते हैं, वह अनार्य हैं, म्लेच्छ है। अशास्त्रीय है और अशोभनीय है।
अब आप सिद्ध करो, जो आपने कहा कि, 'यदि यह वस्त्र म्लेक्ष है, तो निश्चय ही वह वस्त्र भी म्लेक्ष है, जिसे आप सभी विद्वत् जनों ने धारण किया'।"
रामकृष्ण जी पुनः मुस्कुराते हुए कहा, "जिस तरह मेरा वस्त्र कटा है, ठीक ऐसे ही मैं देखता हूँ आपके वस्तु भी अखंड नहीं हैं, उसे काटकर अलग-अलग किया गया है, आपका धौत्र आपकी उत्तरीय से अलग है, और आपकी पगड़ी भी अखंड़ तो नहीं है। अब रही सिलकर जोड़ने की बात तो ताना-बाना पर एक एक सूत्र को जोड़कर ही यह वस्त्र निर्मित हुआ है। इस प्रकार मेरा वस्त्र तो फिर भी इस युक्ति से श्रेष्ठ है। क्योंकि हमने इसे अपनी आवश्यकता नुसार बना लिया है।"
सभी विद्वान एक स्वर में चीख उठे, "कुतर्क है, यह तो कुतर्क है, चलो हमने मान लिया कि हमारा और तुम्हारा दोनों का वस्त्र म्लेच्छ है, तो सनातन और दिव्य वस्त्र कौन सा हैं?"
उन्होंने संयत स्वर में जवाब दिया, "वह वस्त्र जो सृष्टि हमें अपने स्वयं के हाथों से पहनाती है। जिसको हमारे शास्त्रों ने अखंड़ परिभाषित है। जो बेजोड़ है। केवल और केवल वही हमारा दिव्य और सनातन वस्त्र है।"
कन्या पक्ष के विद्वान एक स्वर में कह उठे, "हाँ, यही तो हम कह रहे हैं, क्या आप कुछ दूसरी बात बता रहे हैं? "
रामकृष्ण ने पूरे विश्वास से बताया, "जी हाँ, मैं बिलकुल दूसरी बात बता रहा हूँ, आप जिसे सनातन वस्त्र कर रहे थे, वह कृत्रिम और मानव निर्मित है, वह सनातन नहीं है, प्राकृतिक नहीं है। वह मानवाभिमान के पुरुषार्थ से निर्मित केवल विकार है। फिर चाहे वह मेरा वस्त्र हो, या आपका। सनातन वस्त्र तो वह नवजात शिशु धारणकर के आता है। दिव्य वस्त्र तो वह है जिसे शुकदेव जी धारण करते थे, सनातन वस्त्र तो वह है, जिसे महावीर जैन ने पहना था। वह सनातन और दिव्यवस्त्र केवल दिगम्बर है, दिगम्बर ..."

श्री रामकृष्ण जी का इतना कहना था कि, वे वयोवृद्ध आचार्य, जिनका कन्या पक्ष के सभी विद्वान आदर सम्मान करते थे, उनके शरीर में एक दिव्य स्फूर्ति का संचार हुआ, वे स्वयम् को रोक नहीं सके, भाव विह्वल होकर तीन बार, "साधु, साधु साधु।" कहा, बढ़ कर रामकृष्ण के निकट आ गये, उन्हें अपने आलिंगन में कसके भींच लिया, प्रेम और आदर ने उस नौजवान की पीठ ठोकने लगे। वर पक्ष के लोगों ने अपने विजय की घोषणा की। केवशपुर की मर्यादा सुरक्षित हुआ।




~योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती ....

Friday, 4 January 2019

विमर्श ...

आर्य बंधु श्री Awdhesh K Dwivedi जी का प्रश्न:-

अंधकार बिना प्रकाश का सही आंकलन सम्भव है क्या?
पर्दा और बेपर्दा दोनो की ही अपनी मर्यादा होनी चाहिए अथवा नहीं?
पर्दा अमर्यादित होकर बुरका ना बन जाये।
बेपरदा अमर्यादित होकर नग्नता न बन जाये,इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि नहीं?
बाबा जी।मार्ग दर्शन करें।

अपने आर्य बंधु-बांधव एवं स्वयं प्रश्नकर्ता के लिए मेरा मंतव्य:-

आपके सवाल बेहद पांडित्यपूर्ण हैं और इसके लिए सर्वप्रथम मैं आपको साधुवाद दूँगा।

सवाल का बीज भले एक हैं किन्तु उसके विकसित शाखाओं की तीन बिन्दु है।

प्रथम तो यह कि अंधकार के बिना प्रकाश मूल्यहीन होता है। यह धारणा भ्रामक है। प्रकाश कण भी सूक्ष्म द्रव्यों से ही निर्मित हैं, जो दूसरे किसी द्रव्य से अवरुद्ध होकर अपना मार्ग बदल लेता हैं इस प्रकार अप्रकाशित द्रव्य ही अंधकार दीख पड़ता है मूलतः तीनों ही एक ही तात्विक संरचना का अवस्था परक विस्तार है। मात्र इलेक्ट्राॅनों, न्यूट्रानों तथा प्रोटाॅन्स की मात्रा एवं संख्या भिन्नता से यह गुणात्मक विकास हुआ है। जिन्हें हमारे दर्शन शास्त्र में भी सतोंगुण (प्रकाशित कण) रजोगुण (प्रकाशोन्मुख कण) तथा तमोगुण (अप्रकाशित कण) कहा गया है। किन्तु तत्ववेत्ता जानते हैं कि उक्त सभी अणुओं के गर्भ में प्रकाश या ऊर्जा विद्यमान है। सदैव प्रकाश ही महत्वपूर्ण नहीं है, यदि ऐसा ही होता तो सृष्टि के विकस अन्य दोनों की आवश्यकता ही न होती। और सृष्टि कभी भी अनावश्यक कार्य करती ही नहीं। महत्वपूर्ण तीनों अवस्था हैं, और भूलतः तीनों एक ही हैं, यह तो धर्म चक्र अथवा कालमान का विशेष आग्रह है कि उन्हें तीन भिन्नता विशेष गुणात्मक अवस्था की मर्यादा का पालन करना होता है।

अतः मैं नहीं मानता कि अंधकार के कारण ही प्रकाश महत्वपूर्ण होता है।

अब आपके दूसरे बिंदु पर विचार करते हैं, आपने पूछा मर्यादा होनी चाहिए या नहीं,
मैं कहता हूँ हाँ जरूर होनी चाहिए और मैं सदैव मर्यादा का पक्षधर रहा हूँ । मर्यादा ही धर्म का एक और नाम है। धर्म ही सृष्टि का स्वरूप और पहचान है। अतः मैं तो सदैव इसका पक्षधर हूँ ।

तीसरा बिंदु मर्यादा ---

 पर यह भी ठीक ठीक जान लेना, कि लाज करना, पर्दा करना या वस्त्रको धारण करना या न करना मर्यादा की परिभाषा नहीं है। वेदांत का स्पष्ट निर्देश हैं अति न करो। भीषण ग्रीष्म काल हैं और उसमें आपने, अति वस्त्र धारण कर लिया तो यह अमर्यादा ही है और इसका दंड भी प्रकृति ही उसे पीड़ा देकर पूर्ण कर देती है। अति शीतकाल में निर्वस्त्र होने का हठ भी घातक होता है।
किन्तु इस न्याय व्यवस्था का संबंध मनोविकारी मानव की उच्श्रृंखलता से नहीं है। यह तो केवल एक बहाना है। मैं जानता हूँ, जितनी उच्श्रृंखलता पर्दे के भीतर चुपचाप हो जाते हैं उतना तो बेपर्दे में नहीं हो पाता। फिर भी पर्दा सम्मानित है, क्योंकि चोर पकड़ में नहीं आते। शरीर खुद वस्त्र है। उसपर और वस्त्र लाद लेना भी अमर्यादा ही है। यदि यह मर्यादा होता तो कोई कारण नहीं था कि प्रकृति हमें अमर्यादित जन्म देती। क्यों कि वह तो कभी मर्यादा का उलंघन करती ही नहीं। अब इसे हमारे मनोविकार ने मर्यादा बना दिया। मित्र मेरी बाते लीक से हटकर अवश्य हैं किन्तु मनोरोग की दवा का नाम नारी का पर्दा या प्रतिबंध नहीं है। महाभारत का प्रसंग ही लो द्रोपदी ने कौन सा अंग प्रदर्शन कर दिया कि दुशासन और दुर्योधन उन्हें अपमानित करने लगे? सुग्रीव की पत्नी ने कौन सा अंग प्रदर्शन किया कि बाली उसे भी अपनी भोग का वस्तु बना लिया? सामाजिक मनोविकार पर पर्दे की तरफदारी करके पर्दा डालना भी वैसा ही अपराध हैं जैसा कि किसी स्त्री का मान भंग करके किया जाता है। मैं मानता हूँ बदलते परिवेश में नग्नता अमर्यादा है किन्तु इसका संबंध समाज से कम और ऋतु से अधिक है। इसलिए ऋतु के प्रति किये जाने वाले अपराध का दंड समाज द्वारा दिया जान भी अनीति और अपराध ही है। ऋतु की मर्यादा को लांघने का दंड वह स्वयं देती है। अतः पाप को बनावटी बातों से ढँकना भी सामाजिक अपराध ही है। बल्कि हम स्वयं रोग को प्रोत्साहन देने का अधम कार्य कर बैठते है।

मित्र, जो मेरा विचार था मैंने कहा। मानना न मानना प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र अधिकार है।

योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती 

जय शिवाशिव....