आर्यावर्त के भूखंडों पर हरे भरे वृक्ष वंश की समृद्धि संपूर्ण सम्मान एवं वैभव से सुशोभित था।
मानव वृक्ष को सम्मान करते थे। कहीं कहीं किन्हीं विशेष प्रजातियों को देवी या देवता मानकर पूजते थे। हरे वृक्ष की टहनी तोड़ना पाप था। फल और पुष्प भी तोड़ने से पहले वृक्ष की अनुमति ली जाती थी, उनसे प्रार्थना किया जाता था।
सभी जानते थे कि वृक्ष सजीव है, उनमें चेतना भी है और भावना भी। रात को विश्राम करते वृक्ष को छेड़ना अपराध माना जाता था।
बात लगभग 1750 ई.वी की है। इस दौर से लग-भग 750 वर्ष पूर्व से आतातायी दस्यु समूह हमारी सभ्यता के साथ साथ संस्कृति पर भी आक्रमण कर रहे थे। हम नाम नहीं लेना चाहते उन दस्युओं का, किन्तु उनके कारण हमारे वन्य और ग्राम्य जीवन तथा नागर सभ्यता की तारतम्यता ही टूटती चली गई।
ग्रामीण तो गँवार हो गये, और वनवासी- असभ्य पिछड़े चोर और डकैत कहे जाने लगे। प्रधानता केवल नागरीय सभ्यता को दी जाने लगी। नागरिक ही केवल सभ्य हैं। ज्ञान बुद्धि कला संस्कृति धर्म शिक्षा पर केवल नागरिकों का एकाधिकार है।
मानव अन्यायी स्वार्थी अत्याचारी और नृशंस हो चला है। उसकी अपनी इच्छा सर्वोपरि है। आह! री भोग की लिप्सा।
पृथ्वी कोई मृत और जड़ वस्तु नहीं है, किन्तु अपनी चेतना के महत्वाकांक्षी अभिमान से जड़ीभूत मानव उसे जड़ मान लेने की भूल किये बैठा है। इसमें भी स्पंदन है, प्राण है, श्वासों की सुरीली ध्वनियों का आरोह और अवरोह भी है। हम सभी इन बातों से अनभिज्ञ तथ्य और प्रमाण में उलझकर, सत्य का सत्यानाश करते चले जायेगें।
यही हुआ है, यही हो रहा है, काश! अब भी लोग चेत लें।
पृथ्वी का फुफ्फुस संक्रमणकारी मानवों ने बुरी तरह नष्ट कर दिया है। वन और वृक्ष नष्ट हो रहे हैं। वायु परेशान है। जल दूषित हो रहे हैं, ऋतुओ के धर्म में अधर्म का प्रवेश हो चला है।
जड़वत् चेतना की अश्रव्य आर्त ध्वनियाँ त्राहि-त्राहि कर उठी है।
वृक्ष को उनके अधिकारों की भूमि लौटा दो। वे भी हमारी और आपकी तरह इस पृथ्वी के निवासी हैं। जैसे आपको आपके जीवन का अधिकार है, ठीक ऐसे ही उनका भी अधिकार है। पृथ्वी का अधिकार है। धर्म कहता है- हे श्रेष्ठ, हे आर्य मानव, सबके अधिकारों की रक्षा करो। अग्नि, जल, स्थल, वायु सबकी मर्यादा को अपने संविधान में स्थान दो। आज दलित मानव नहीं, मानवता है, प्रकृति है, इन्हें अत्यंत आरक्षण की आवश्यकता है।
योगेश सुदर्शन आर्यवर्ती
मानव वृक्ष को सम्मान करते थे। कहीं कहीं किन्हीं विशेष प्रजातियों को देवी या देवता मानकर पूजते थे। हरे वृक्ष की टहनी तोड़ना पाप था। फल और पुष्प भी तोड़ने से पहले वृक्ष की अनुमति ली जाती थी, उनसे प्रार्थना किया जाता था।
सभी जानते थे कि वृक्ष सजीव है, उनमें चेतना भी है और भावना भी। रात को विश्राम करते वृक्ष को छेड़ना अपराध माना जाता था।
बात लगभग 1750 ई.वी की है। इस दौर से लग-भग 750 वर्ष पूर्व से आतातायी दस्यु समूह हमारी सभ्यता के साथ साथ संस्कृति पर भी आक्रमण कर रहे थे। हम नाम नहीं लेना चाहते उन दस्युओं का, किन्तु उनके कारण हमारे वन्य और ग्राम्य जीवन तथा नागर सभ्यता की तारतम्यता ही टूटती चली गई।
ग्रामीण तो गँवार हो गये, और वनवासी- असभ्य पिछड़े चोर और डकैत कहे जाने लगे। प्रधानता केवल नागरीय सभ्यता को दी जाने लगी। नागरिक ही केवल सभ्य हैं। ज्ञान बुद्धि कला संस्कृति धर्म शिक्षा पर केवल नागरिकों का एकाधिकार है।
मानव अन्यायी स्वार्थी अत्याचारी और नृशंस हो चला है। उसकी अपनी इच्छा सर्वोपरि है। आह! री भोग की लिप्सा।
पृथ्वी कोई मृत और जड़ वस्तु नहीं है, किन्तु अपनी चेतना के महत्वाकांक्षी अभिमान से जड़ीभूत मानव उसे जड़ मान लेने की भूल किये बैठा है। इसमें भी स्पंदन है, प्राण है, श्वासों की सुरीली ध्वनियों का आरोह और अवरोह भी है। हम सभी इन बातों से अनभिज्ञ तथ्य और प्रमाण में उलझकर, सत्य का सत्यानाश करते चले जायेगें।
यही हुआ है, यही हो रहा है, काश! अब भी लोग चेत लें।
पृथ्वी का फुफ्फुस संक्रमणकारी मानवों ने बुरी तरह नष्ट कर दिया है। वन और वृक्ष नष्ट हो रहे हैं। वायु परेशान है। जल दूषित हो रहे हैं, ऋतुओ के धर्म में अधर्म का प्रवेश हो चला है।
जड़वत् चेतना की अश्रव्य आर्त ध्वनियाँ त्राहि-त्राहि कर उठी है।
वृक्ष को उनके अधिकारों की भूमि लौटा दो। वे भी हमारी और आपकी तरह इस पृथ्वी के निवासी हैं। जैसे आपको आपके जीवन का अधिकार है, ठीक ऐसे ही उनका भी अधिकार है। पृथ्वी का अधिकार है। धर्म कहता है- हे श्रेष्ठ, हे आर्य मानव, सबके अधिकारों की रक्षा करो। अग्नि, जल, स्थल, वायु सबकी मर्यादा को अपने संविधान में स्थान दो। आज दलित मानव नहीं, मानवता है, प्रकृति है, इन्हें अत्यंत आरक्षण की आवश्यकता है।
योगेश सुदर्शन आर्यवर्ती
