किसी इंसान का नंगापन प्राकृतिक सत्य होते हुए भी समाज में स्वीकृत नहीं है। यदि कोई ऐसा दिख गया तो लोग उसे पागल समझकर उस पर पत्थर बरसायेंगे। पत्थर मारने वालों की कमी नहीं है जग में फूल बरसाने वाले कम हैं ।आप शायद यकीन करें, मेरी बात का, क्योंकि मंदिर और मज़ार में इतने फूल बरसते हैं यकीनन वे श्रद्धा के फूल नहीं होते। वे भय या लोभ की प्रेरणा से बरसते हैं । मानव का विश्वास मर गया, श्रद्धा नही रह गई ।
रुचि अपने सहपाठी मित्र से गरमा-गरम कॉफी की चुस्की लेना भूलकर बोल रही थी-"सत्य के विस्फोट की क्षमता आपके परमाणु विस्फोट से कहीं अधिक है, इसलिए तो दुनियाँ उससे ड़रती है । उसे दबाकर रखती है, कहीं वह सिर न उठा लें, अराजकता न फैला दें, बगावत का बवंडर न उठा दे। आप लोगों में सच्चाई खोजने चले हो, आप नेताओं की आलोचना करते हो, जनता की आलोचना करते हो। सत्य की शक्ति से दुनियाँ को सुधारना और सँवारना चाहते हो। अच्छी बात है, निसंदेह सत्य की शक्ति से यह संभव हो किन्तु ------" वह बड़े संयत स्वर में बोलते-बोलते रुक गई। उसके चेहरे पर संशय का शब्द भाव का रूप धरकर उभर आया। वह अपनी पलके सयास मीचे बैठी रही। कुछ असहज और परेशान सी।
उसके सम्मुख बैठे मित्र से रहा न गया, उसने पूछा, " क्या बात है? किन्तु क्या?"
"नहीं, जाने दो! तुम बुरा मान जाओगे।" दार्शनिक रुचि ने मनोवेत्ता की तरह उसकी आँखों में देते हुए कहा।
"अर्थात? मैं बुरा न मानूँ इसलिए तुम एक और सत्य को जन्म से पूर्व ही खामोशी के वीराने में गला घोंट कर मार दोगी? क्या तुम इतनी निर्मम भी हो सकती हो?" अर्ध स्मित का झीना आवरण ओढ़े उलाहना की यह उक्ति आभास करा रही थी कि यदि वह धँस जाये तो कितना तीक्ष्ण पीड़ा दे सकता है।
"निर्मम तो मैं हूँ! तुम्हारे लिए मुझे कुछ भी होना स्वीकार है।"
"नहीं, मुझे स्वीकार नहीं, बताओ किन्तु क्या?"
"प्यारे, किन्तु के आगे एक भीषण झंझावात है, एक तूफान, सदियों - सदियों तक दबाई गई सत्य की धधकती ज्वाला है, जिसमें तुम्हारा जीवन तिनके की तरह बह सकता है, किसी रूई की तरह जल कर राख हो सकता है। प्लीज अब मत पूछो मुझसे 'किन्तु क्या'?"
"नहीं तुम्हें बताना होगा, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूँगा। मैं हर तूफान का सामना करने को तैयार हूँ, बताओ। मुझे कमजोर समझकर, कमजोर न करो। यह एक अच्छे मित्र का धर्म नहीं है, विश्वास करो, बताओ, तुम्हें मेरी शपथ है।"
"सावधान, तो फिर लो, सुन लो, किन्तु यही हैं कि तुम खुद एक झूठ के पुलंदे हो! तुम जो कहते रहे हो कि मुझसे प्रेम करते हो, यह झूठ है। एक झूठे को कोई अधिकार नहीं कि वह सच्चाई की बात करे, राजनीति, राजनेता समाज और संप्रदाय की आलोचना करे-----।"
उस युवक ने उसे बीच में टोकना चाहा,"रुचि...!"
किन्तु वह आवेशित सी बोलती रही---
"हाँ, इस रुचि को तुमने पूरा नहीं देखा, पूरा नहीं जाना, पूरा-पूरा समझा नहीं, और स्वार्थी मित्रता कर बैठे, तुम्हारी प्रबल आत्मनिष्ठा तुम्हें अनुमति देता है तुम मुझे पाने के लिए मुझसे छल करो। कहो कि मैं प्यार करता हूं! इस आशा से कि कल मैं तुम्हारी सहचर हो जाऊँगी---- दुल्हन बनकर सुहाग के सेज पर तुम्हारे साथ प्रणय क्रीड़ा करूँगी और तब तुम्हारा राष्ट्र तुम्हारा संसार सिकुड़ उठेगा। सत्य का स्वरूप बदलने लगेगा। आज का सत्य किताबी ज्ञान के नाम से हीन होकर उपेक्षित कर दिया जायेगा, जीवन की व्यवहारिकता ही सत्याभाषित होगी। आज के इस सत्य की ओर बढ़ते हुए तुम्हारे कदम ठिठक जायेंगे। असुरक्षा ही असुरक्षा चारों ओर नज़र आने लगेगी।"
"नहीं-नहीं, यह झूठ है, यह सब झूठ है।"
"अरे धूर्त ! सदियों-सदियों से प्रेम के स्वाँग का यही रूप रहा है। जिसने जीवन के न जाने कितने अमूल्य सत्य की हत्या कर दी। आज तूँ उसे ही झूठ कहता है? कायर तो सदा ही मैदान छोड़कर भागते रहे हैं, फिर आज नया क्या होना था? जा भगोड़े तूँ भी भाग जा यहाँ से---- यह सच जो आज तुझे आवाज़ दे रहा है, इसकी भी समाधि बन जाने दे। नपुंसकों ने सदा ही ऐसा किया है--- यदि तूँ भी नपुंसक है तो तूँ भी यही कर।"
"नहीं-नहीं-नहीं, बस रुचि बस! तुमने क्या-क्या नहीं कहा मुझे? झूठा, कायर, धूर्त, नपुंसक---- नहीं बस करो! मेरी आत्मा यह स्वीकार नहीं कर रही-----अंदर कहीं गहरे में एक शब्दहीन भाव आकार ले रहा है----- तुमने जो कहा वह सच है! मैं मान लेना चाहता हूँ---- नहीं-नहीं, पर ऐसा नहीं है, क्या मैं कायर हूँ? नपुंसक हूँ? और यह मान लूँ? नहीं कभी नहीं।"
"बहुत अच्छे, मैं भी यही चाहती हूँ जो मुझे प्रेम करे वह कायर और कापुरुष न हो। तो तुम मानते हो कि तुम कायर नहीं?"
"हाँ।"
"तुम्हें प्रमाण देना होगा?"
"मैं तैयार हूँ।"
"तो चलो दिगंबर हो जाओ, अभी और यहीं क्या तुम में है इसना साहस।"
वह युवक उस रूप के सम्मोहन की वाणी से बँधकर निर्वस्त्र होने लगा। उस भरे पुरे काॅफी हाउस में लोग उसे ही देख रहे थे। उनकी तीक्ष्ण दृष्टि उसे चुभने लगी। वह झेप रहा था--- पर सवाल वीरता के प्रमाण का था--- सवाल पुरुषार्थ का था, सवाल सत्य के हित का था इसलिए एक हद तक निर्वस्त्र होकर वह रुक गया। रुचि को उसका सहमना और लज्जित होना अनुचित लगा। वह तंज सी कसती हुई बोली,"क्या हुआ परमवीर योद्धा? आप तो कायर नही हो! फिर? आगे बढ़ो! निकालो-निकालो वह शेष अंतर्वस्त्र भी निकालो!"
"बेशर्मी की हद है! क्या तुम निर्लज्ज हो? क्या जितना मैंने किया उतना तुम भी कर सकती हो?"
वहाँ उपस्थित लोगों को इस विवाद में दिलचस्पी होने लगी थी। लोग बेहद उत्सुक थे। रुचि को किसी की परवाह न थी। इरादे में साहस का भाव था, उसका चेहरा देखकर वह युवक मन ही मन भयभीत हो उठा। अब वह भी पछताने लगा, कि उसे क्यों चुनौती दी? वह बोली,"बिलकुल, मैं कायर नहीं हूँ---।" कहते-कहते कंधे पर रखी ओढ़नी उतार कर बड़े आवेश में टेबल पर रख दिया।
"--- पर मेरी एक शर्त है, तुम भाग मत जाना! शर्मिन्दा मत होना!! मुझे पता है तुममे इतना भी साहस नहीं कि तुम मुझे उस हालत में यहाँ सबके समक्ष आँख में आँख मिलाकर देख सको। बोलो मंजूर है?"
वह लग-भग दिगंबर हो चुकी थी। नाममात्र के अंग वस्त्र शेष रह गए थे। सच पूछो तो युवक मन ही मन बेहद लज्जित था। उसकी आँखों में आँसू आ गए थे, पता नही शर्म, कायरता या दीनता के? बिल्कुल नहीं पता। पर उसके मन में कोई विकार न हुआ!!! वह बड़ी ही सहज लग रही थी।
विकृत मन वालों के नेत्र सीधी उस ओर न उठ सके। लंपट और लुच्चे स्वभाव के लोग, लोगों की दृष्टि बचाकर कटाक्षपात कर लेते थे। कुछ और भी थे संस्कारहीन निर्लज्ज उन पर कुछ असर न हुआ वे पशुवत ललचिली दृष्टि से रूप की धधकती ज्वाला की ओर ऐसे आकर्षित हुए मानो पतंग अग्नि में आहुत होने से संकोच न कर रहा हो। और वह अपने शेष वस्त्र भी उतारने को तत्पर थी। युवक अपनी चेतना में संज्ञाशून्य होता जा रहा था, अहंकार शून्य, संस्कार शून्य। उसने चेतनाशून्यता की इसी अवस्था में दिगंबर स्वरुप को सहज भाव से स्वीकार लिया और रुचि के दोनों हाथ पकड़ कर उसे रोका, "बस करो, गुरू! बस करो तुम सच मुच निर्लज्ज हो।"
वह बोली,"लज्जा आत्मा पर चढ़े संस्कारों के मैल का नाम है, पंडित जी! इसे जब तक न धोइयेगा तब तक सच का दर्शन न हो सकेगा। तुमने जो साहसी कार्य किया है, मैं उसकी दाद देती हूँ। पर अभी बात पूरी नहीं हुई। अभी भी तुममें सच का सामना करने का साहस नहीं है। यह मेरा देंह कोई सच नहीं। जिसके प्रभाव में तुम मुझसे जुड़ने चले आये। अपने जीवन को लैला-मजनू या हीर-राँझे की कहानी सा गढ़ने चले आये। यह देंह मेरा दिव्य वस्त्र ही है, इसे तुम रुचि समझने की भूल न करना। वह जिसे तुम रुचि समझते हो वह प्रचंड़ सूर्य से भी अधिक तेजस्विनी है। जब तुम मेरा यह दिगंबर देह देखने का साहस नही कर सकते, तो तुम मुझे किस दृष्टि से देख सकोगे?"
फिर तो वहाँ जो होना था वही सब होता गया। रुचि के घर वाले आ पहुँचे, नगर में घटना वाड़वाग्नि सी फैल गई। आधुनिक तंत्रों के तंत्रज्ञों ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा दी। वह घटना स्थल समूचे नगर के आकर्षण का केंद्र हो गया था। पुलिस, पत्रकार कैमरा सब खिंचा चला आया।
एक बड़ा प्रपंच उठ खड़ा होने को था फिर भी रुचि किञ्चित सहमी नहीं, सँकुचाई नहीं। उसने उस युवक से कहा,"अब इन वस्त्रों को जला दो। तुरंत जला दो और यहाँ से ऐसे ही निकल जाओ। भविष्य में शायद अब मैं इस रूप में तुम्हें न मिलूँ। शायद मेरा यह नाम भी न हो। पर जब तुम्हें सत्य का दर्शन हो जायेगा, तब मैं अक्सर तुमसे मिलती रहूंगी। तब तुम मेरे भ्रम से भ्रमित न हो पाओगे।---- जल्दी करो।"
युवक ने उसका कहा मान लिया। वस्त्र जल कर राख हो हुए या उसका अहंकार और पूर्वसंचित संस्कार जला कोई नही जानता। इसी बीच रुचि के संबंधी उस तक पहुँच गए। एक सशक्त मुष्ठिका प्रहार से उसके मुख का भूगोल बदल चुका था। वह सँभल पाता इससे पूर्व न जाने कितने प्रहारों से लगातार आहत होता रहा। कुछ ही देर बाद वह रक्त से लथपथ बेसुध होने लगा।
रुचि के घरवाले रुचि को एक चादर से ढँक कर ले जाने लगे। उस युवक ने अपनी बेसुध होती चेतना से उसे जाते देखा, वह मार खाकर भी सहज और निस्पाप दिखती थी। जाते-जाते वह कहती रही,"इन चोटों की परवाह न करना पंडित जी! इनके मूल से साहस और धैर्य के पुष्प पुष्पित होने चाहिए। आज से तुम्हारे जीवन की दिशा बदल गई, मेरी भूमिका समाप्त, यही एक मित्र की ओर से चिर विदाई का भेंट रहा। इसे तिरस्कृत न करना। अब इस मार्ग से पीछे न हटना, अन्यथा तुम मुझे पाते पाते खो दोगे पंड़ित!"
वह जाते जाते उसे चेताती रही और फिर उसके प्रस्थान के दृश्य का रंग धुंधलाने लगा---- युवक की चेतना पर निविड़ तमस का रंग चढ़ आया---- मानों काले मेघों के समूह ने सूर्य का अपहरण कर लिया।

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