कविता या गीत को गाने या कहने की अपनी एक गति या चाल होती है। किसी कविता या गीत के पहले पद को गाने में लगने वाले समय को उस गीत या कविता की लय कहते हैं।
लय के प्रकार
- विलंबित लय
- मध्य लय
- द्रुत लय
1- विलंबित लय:-
गायन में सबसे धीमी गति के लय को विलंबित लय कहते हैं। इस लय में खयाल, धामर, मसितखानी गत, ध्रुपद आदि एक ताल, तिलवाड़ा, चैताल, तीन ताल, झुमरा ताल में निबद्ध होता है।
2- मध्य लय:-
मध्यम गति से गाया जाने वाला रचना मध्य लय कहलाता है। अधिकतर रचनाएं इसी लय से अर्थात् मध्य लय से शुरू होती है।
3- द्रुत लय:-
द्रुत लय नाम से ही स्पष्ट है कि इसे तीव्र गति से गाया जाता है। ऐसी रचना मध्य लय से दोगुनी गति से गाया जाता है।
ताल क्या है?
किसी रचना में विविध मात्राओं की समान इकाई को ताल कहते हैं। ताल का उपयोग मात्राओं को नापने के लिए किया जाता है। सुर, ताल और लय किसी संगीत रूपी मंड़प के तीन सुदृढ़ स्तंभ के समान होते हैं। लय से मात्रा और मात्रा से ताल का निर्माण होता है। मात्राओं के विभाग द्वारा ही ताल का स्वरूप बनता है अतः इसी प्रकार विभिन्न तालों का स्वरूप निर्मित हो जाता है।ताल के प्रकार
यूं तो इसके अनेक प्रकार हो सकते हैं। किन्तु इनकी रचना का मूल जिन कारकों पर निर्भर हैं वे हैं 'ताली-खाली और मात्रा'। प्रकारों में एक ताल, तीन ताल आदि मुख्य हैं।
ताल के भाग
मात्रा- मात्रा ताल का ही एक भाग होता है। किसी पद के गाने में लगने वाला समय मात्रा कहलाता है। मात्रा का स्वरूप अचल नहीं होता अपितु वह लय के आधार पर घटता बढ़ता रहता है।आवर्तन-
किसी ताल की संपूर्ण मात्राओं के समूह को आवर्तन कहते हैं।
ठेका-
ताल के आवर्तन बोलों का समूह जो तालवाद्य जैसे की तबला, ढोलक या पखावज आदि पर बजाया जाता है, उसे ठेका कहते हैं। जैसे- 'ना,धिन्न, धि,न,क,धि,न॥' कहरवा ताल का ठेका है।
सम-
किसी ताल की पहली ताली सम होती है। प्रायः ताल की पहली मात्रा सम होती है। सम पर विशेष बल दिया जाता है जिससे की वह अन्य मात्राओं में पहचाना जा सके। जिस प्रकार संगीत का प्राण ताल है उसी प्रकार ताल का प्राण सम है। सम को X चिन्ह से दर्शाया जाता है।
ताली-
विभिन्न मात्राओं की संख्या के अनुसार ताली बजते हुए सम पर आकर विश्राम करतीं हैं। x123x इसे उपरोक्त चिन्ह के अनुसार दिखाया जा सकता है।खाली-
संगीत में वह अवस्था है जहां ताली नहीं बजती। इसे 0 के चिन्ह से दर्शाते हैं।
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