भावार्थ -
शिशु के सौंदर्य में छिपा सत्य ही शिव स्वरूप में सबके मन को आंदोलित कर देता है। जब इनके दो दूध के दाँत दिखाई देते हैं, या जब वे प्रसन्न मुद्रा में हँसते हैं तब मानों वह अलख अज्ञात अस्तित्व ही हँसी एवं प्रसन्नता का रूप लेकर प्रत्यक्ष हो जाता है। परामात्मा की दिव्यता शिशु के आनंद केलि में प्रत्यक्ष होने लगता है।
लोग व्यर्थ ही परमात्मा का दर्शन करने के लिए विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हैं और आशा के छलावे का शिकार होकर नास्तिक हो उठते हैं यद्यपि परमात्मा उनके बेहद निकट हैं तथापि वे उसे दूर दूर तक खोजते हैं पाने की आशा में भ्रमित होकर मृगतृष्णा का आखेट बन जाते है, अंततः खीज कर उस अस्तित्व को सिरे से नकारने लगते हैं। होना उसका स्वभाव हैं, वह शैशव की अविकृत भावना में आनंद संचारित करता हुआ आपके गोंद में बैठा है, उसे पहचान लो, उसकी स्तुति करो। उसकी भावना में बह जाओ। वह आपके संसार का भार हल्का कर देगा। वह आपको विश्राम का आनंद देगा। वह जो आपके घर का शिशु ठठाकर दूध के दिव्य दाँत दिखाता हँस रहा है, क्या आप नहीं देख पाते कि उसके दाँत से निकलती दंत द्युति इंद्र के वज्र समान आपके दुख और संताप पर गिर कर उनका नाश कर रहा हैं?
अमृत से भरा वह सोने के समान चमकता घड़ा शिशु के रूप में आपके बहुत पास है। अतः आप निर्भीक होकर इस आनंद का अमृत पी लो जो बिलकुल दूर नहीं है।
इनके निर्मल नेत्रों को देखो, कहीं कोई विकार नहीं, कोई मैल नहीं। वे कितने सुंदर और चंचल हैं? हे वेदों को जानने वाले, इन नेत्रों से बरसते ज्ञान को धारण करो, उनके शब्दों को समझने की चेष्टा करो, वे हमारे गुरु है, उनकी रहस्यों से भरे शब्दों में आनंद का सूक्ष्म रूप बँधा हुआ है। शब्दों के खुलते ही आनंद प्रत्यक्ष हो जाता है।
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