Home

Sunday, 12 February 2023

चैतन्य-चिंतन: अच्छे दिन


अच्छे दिनों का भारत

Achchhe din

आज-कल भारत में अच्छे दिन चल रहे हैं। जहां भी देखो वहां सुख है, समृद्धि है, संतोष है। चारो ओर देश तीव्र गति से विकास कर रहा है। विपक्षी दल में सुमति और सुसंगति है। कोई महत्व की स्पर्धा नहीं, सब नैतिकता के प्रति समर्पित हैं, सभी कर्म परायण और धर्म परायण हो चलें हैं। ऐसे तो कलियुग पहले से ही अपने सौंदर्य के सम्मोहन से सबको वशीभूत किये इठला और इतरा रहा है।

देखो न, यहां राजनीति में रामराज्य हैं, शासन में सुशासन शिक्षा में मुक्ति के पंख समाज स्वयं अपने शब्दार्थ से सार्थक होता है। क्या आपने कभी देखा था ऐसा अच्छा दिन? रहने दो कुछ मत कहो, नज़र लग जायेगी। इस नवजात काल पुरुष की, इस अच्छे दिन की बलैया लो, दुनिया इसे दिठियाने को तैयार हैं।

इन्हीं दिनों देखो, केशव प्रसाद मौर्या रामचरित मानस की तारीफ करते नहीं अघाते। लोग आस्था के वैकुंठ सागर में आकंठ डूब उतरा रहे हैं। समाजिक सद्भाव की सेतु पर भारतीय सभ्यता अपनी छाती चौड़ी किये इतराता चल रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विद्वानों की खोपड़ी में साक्षात मां शारदा अपनी वीणा के सप्त सुरों की रागिनी छेड़ रहीं हैं। मोहन भागवत साक्षात बाबा तुलसीदास का अवतार ही ग्रहण किए संसार के अज्ञानियों को अपनी बुद्धि की प्रतिमा से, मोक्षदायिनी ज्ञान से धन्य धन्य कर रहे हैं। बताओ देखा था कभी इतना अच्छा दिन? 

इस देश में ब्राह्मण द्रविड़ हो चलें हैं। क्षत्रियों ने ऐसा छत्र विस्तार किया की हर एक वीर धीर और स्वास्थ हैं। वैश्य जैसे दानी समुदाय संसार का ध्यान अपनी ओर खींच रहें हैं। शूद्र को सभी ताड़ना जान गये। इस प्रकार अच्छे दिन की प्रगति देखने ही लायक है। संसार के महानतम पर्यटकों ने भारत में अपना डेरा जमा लिया है, और इसके गौरव की संस्कृतियां और स्तुतियां लिखी जा रहीं हैं।

इस राष्ट्र के निवासियों का चारित्रिक उत्थान इतना गरिमामय मय हो चला है कि जहां भी दृष्टि उठाओ, काम को भस्म करते शिव दिखाई देते हैं, भरत जैसे त्यागी तपोनिधि, राम जैसे आदर्श गली गली मुहल्ले मुहल्ले मिल जाते हैं। यहां ईश्वरीय अनुकंपा रात दिन बरसती है। अब किसी की मजाल नहीं कि कोई रावण बजार से सुंदर सुशील लक्ष्मी का हरण कर सके! कोई सफाई कर्मचारी लक्ष्मी के चरित्र को लांक्षित करें, अब कोई ऐसी परिस्थिति नहीं कि राम और लव कुश आपस में ही लड़ पड़े और धन क्षुब्ध होकर अपनी माता से गुहार करे कि "हे माता, तूं मुझे अपनी कोख में अब छिपा ले यह संसार मेरे रहने लायक नहीं।" 

इन दिनों, पवन, वरूण, अग्नि, मरुत, रूद्र, अश्विनी, वनस्पति, आदि सभी देव और उनके पार्षद द्रव्य सुखी और समृद्ध हैं। अगर यह अच्छा दिन नहीं है तो और क्या है?


जन्म और मृत्यु 

       जिसे जगत् जन्म समझता है, उसे मैं अस्तित्व का विभाजन मानता हूँ . अखंड अस्तित्व से कट कर छुद्र अहंकार का बोध पा लेना यही जन्म है . अहंकार नर्क के उस काल कोठरी का परिचायक है , जो दुख पीड़ा और कष्ट के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकती .वह एक स्वतन्त्र दिव्य एवं विराट अस्तित्व को कैद कर लेती है . उसे उसकी शक्ति से जुदा करके पीड़ित एवं दंडित करती है . सोचो तो , जन्म पाने वाला प्राणी अपने पहले ही सांस के साथ हँसता मुस्कुराता हुआ क्यों नहीं रहा पाता ? वह रोने क्यों लगता है ? किसी के जन्म पर लोग नाचते गाते हैं , ढोल नगाड़ा बजाते हैं . उत्सव मनाते हैं , यह कैसा प्रमाद है? लोग किसी को कैदी देखकर क्यों खुश हैं ? वह बेचारा तो रो रहा है… अपनी प्रिया की विरह में , अधूरा , अपूर्ण , काल की शृंखला में बंधा हुआ . अहंकार की कोठारी में – अपनी मुक्ति के लिए… सभी माता गंगा की तरह श्रेष्ठ गुरु तो नहीं हो सकती . सभी माता मुक्तीदायिनी नहीं हो सकती . यहाँ यशोदा और देवकी बनाने की होड़ लगी है . गंगा की तरह मोह और अहंकार को मिटाने वाली माताएँ जगत् में कितनी हैं ? बेचारा क़ैदी ! अब उसे काल के आधीन चलना पड़ेगा . वह काल की कृपा पर जीवन जीएगा . अखंड शक्ति के स्वामितवा वाले उस अस्तित्व को उसकी प्रिया मिलने भी आएगी पर बिल्कुल नियंत्रित तरीके से , अल्पकाल के लिए , थोड़ा सा सुख देने …. बस इतने से सुख के लिए अस्तित्व को भीषण परिश्रम करना है . पत्थर तोड़ना है , मृत्तिकामर्दन करना है … तमाम निरर्थक कर्म करने हैं . काल उसे जीवन के निरर्थक कर्म में अधिक उलझाएगा , जिससे कि वह शिथिल हो जाए … सार्थक कर्म की पहचान न कर सके , उसकी बेड़ियों को न काट सके ।

       कुछ लोग मृत्यु को मुक्ति मानने का भ्रम पाले बैठे हैं . सावधान ! इस भ्रम में न रहना . तुमने जीवन में किया ही क्या ? मृत्यु मुक्ति नहीं है , अन्यथा तुम उससे डरते ही क्यों ? मुक्ति से कोई भयभीत नहीं होता . मुक्ति से सभी आनंदित होते हैं . यदि आप अपने जीवन से आनंदित हैं , यदि आप अपने मौन से नहीं डरते , तब मैं समझता हूँ कि आपने अहंकार की कोठरी से मुक्त होने की सुरंग खोद ली है . अन्यथा ….. मृत्यु मात्र अहंकार का स्थानांतरण है . एक अहंकार से विस्थापित होकर दूसरे अहंकार तक पहुँचने की यात्रा है . जीवन और मृत्यु अस्तित्व के पड़ाव नहीं हैं , वे अविद्या एवं अज्ञान के निरंतर प्रवाह हैं . विद्या के प्रकाश में जिए बिना और ज्ञान के आनंद में झूमे बिना काल के प्रवाह से मुक्ति संभव नहीं है ।

     

 सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन, पंथा विततो देवयानः। 
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यंत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥

No comments:

Post a Comment

मनोगत प्रगट करें