पंडित चंदनधारी के सुपुत्र मंगला प्रसाद त्रिपाठी का विवाह बनारस के आचार्य श्री आचार्य विचित्र शास्त्री की कन्या शुभांगी से तय किया गया था। विचित्र शास्त्री जी, बनारस में विख्यात संपूर्णानंद संस्कृत विद्यालय के सेवा निवृत्त प्राचार्य थे। इसका सीधा अर्थ था, कि विवाह में कन्यापक्ष से बनारसी विद्याभिमानी, गौरवपुष्पित विद्वत मंडल अवश्य उपस्थित होने वाले थे। जिनके शास्त्रोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए पंडित चंदनधारी ने वर पक्ष के पुरोहित केशवपुर पीठ के पीठाधीश आचार्य केशव शास्त्री जी को निमंत्रण दिया हुआ था।
निमंत्रण स्वीकार लेने का अर्थ था, बनारस की पीठ से शास्त्रार्थ की चुनौती मोल लेना। अब तक केशवपुर पीठ की मान मर्यादा सुरक्षित थी। पर शायद आगे कोई अनहोनी न हो जाये, निमंत्रण हाथ में लेकर केशव शास्त्री तय नहीं कर पा रहे थे। उनके पेट में एक बेचैन तितली उड़ रही थी। वे अपनी पीठ के गौरव स्तंभ अपने दादा जी को याद कर रहे थे। जो जौनपुर के दरबार में ज्योतिषज्ञ राजपुरोहित थे।
ज्योतिष विद्या में उनकी ख्याति ऐसी थी कि वे किसी भी घटना का सटीक भविष्यवाणी दिन याम घटी और पल तक बता देते थे। कहते हैं कि, राजा की इच्छा हुई वे अपने मृत्यु का समय जानने को उत्सुक थे। वे स्वयं अपने लिए मरणोपरांत प्रेत वस्त्र अथवा शवाच्छादनपट लेना चाहते थे। पुरोहित ने यद्पि अरंभ में मना करना चाहा, तथापि राज-हठ ने उन्हें गणना के लिए विवश कर दिया। उन्हें जब गणना किया तो पता चला कि वह अशुभ घड़ी अगले ही दिन साँयकाल को है। राजा एक दम स्वस्थ थे। वैद्य ने परीक्षण किया, उन्हें कुछ हुआ नहीं था। आचार्य ने जो स्थान बताया था, उसने इतने शीघ्र कोई अनहोनी होने की कोई सोच भी नहीं सकता था। महल के भरे दरबार में वैद्य के रक्षा दल के होते हुए भला राजा को क्या हो सकता था? तथापि आचार्य ने कहा है, इसलिए वे मनमौजी राजा अपने लिए स्वयं मंडी से प्रेत वस्त्र ले आये थे। समय बीत रहा था। राजा बिल्कुल ठीक थे, सुरक्षा बिलकुल सतर्क था। सबको लगने लगा कि यह भविष्य गणना गलत हो जायेगी। वह ज्योतिष स्वयं चाहता था, उसकी गणना गलत हो जाये। इसलिए तो मृत्यु टालने केलिए महामृत्युंजय मंत्र का पाठ कर रहा था। पर जो होना होता है, उसे कोई विद्या टाल नहीं सकती। सत्य तो वैसे भी अटल होता है। नियत समय के एक घटी पूर्व राजा को बेचैनी होने लगी, दरबारियों को लगा शायद मृत्यु के भय से ऐसा हो रहा है। वैद्य को अब भी किसी रोग का लक्षण नहीं मिला। जैसे जैसे समय निकट आता रहा राजा को लगा जैसे सिर में विस्फोट हो जायेगा। और फिर...... वहीं हुआ जो तय था।
राजा की अंतिम विदायी उनके इच्छानुसार उसी प्रेतवस्त्र में किया गया, जो वे स्वयं अपने लिए लाये थे।
केशवपुर के आचार्य अपनी विद्या ज्ञान के लिए जितना पूरे क्षेत्र मे विख्यात थे। उससे कहीं अधिक बनारस संपूर्ण आर्यावर्त में अपने ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था। यही बात केशव शास्त्री के चिंता का करण था।
सहसा उन्होंने देखा, उनका श्रेष्ठ शिष्य कच्ची पगडंडी के रजकण अपने चरणाघात से उड़ाता चला आ रहा था, केशव को प्रतीत हुआ मानो, मार्ग का रजकण नहीं बल्कि वह उनके जीवन के अपयश और भय को उड़ा रहा है। उनके नेत्र किसी दिव्य आभा से प्रदीप्त हो उठे।
यह घटना सन 1974-75 की है। शायद जेपी आन्दोलन का दौर भी इसी काल के कुछ आगे-पीछे हो। इस घटना का संबंध राजनीति से नहीं, केवल उस समय की सांस्कृतिक चेतना को प्रस्तुत करने से है।
एक छोटे से गाँव में शिव प्रेम की दिव्य ज्योति युवा हो रही थी। यद्यपि वह मैकालयीन व्यवस्था के शैक्षिक संस्था में अध्ययन करता, किन्तु उसे गुरुकुल परंपरा की वैदिक शिक्षा में स्वस्फूर्त रुचि होने के कारण, केशवपुर पीठ के आचार्य से विशेष लगाव रहा। इनके मेल मिलाप को कोई बाहर से देखकर कभी कह नहीं सकता कि कहीं कोई शैक्षणिक गतिविधि है। केवल आपसी संबंधों का मेल मिलाप भर लगता था, किन्तु शिक्षा और संवाद का गहरा रिश्ता होता है। दोनों ही घंटों किन्हीं वैदिक या वैज्ञानिक विषयों पर चर्चा करते थे। आचार्य अपने शिष्य से आयु में कोई पाँच दस वर्ष ही अधिक अनुभवी होंगे। अतः संबंध गुरु शिष्य का कम और मित्रवत् अधिक था, किन्तु आचार्य जी तो धन्य थे, उन्हें एक विलक्षण शिष्य मिला था। यद्यपि कभी उन्होंने यह भाव प्रगट नहीं किया।
शिष्य संस्कृत में भाँति भाँति के छंद रच कर उन्हें दिखाता, दावा करता कि," गुरुजी, देखिये, यह हमने रचा है।"
आचार्य कुछ पल रचना को निहारते और मुस्कराते हुए कहते,"क्या तुम मुझे उल्लू समझते हो, कि मैं कालीदास को नहीं पढ़ा हूँ? अरे, यह तो कालीदास की रचना है।"
युवक ने कहा,"गुरु जी, निश्चय आप कालीदास को पढ़े होंगे, किन्तु यह तो श्री रामकृष्ण प्रिय अर्थात् मैंने लिखा है, आप इसमें मेरा दोष बताइये।"
वे निवेदन को हँस कर टाल गये। उन्हें विश्वास नहीं था कि युवक इतना निर्दोष छंद लिख सकता है। उधर वह युवक भी बहुत हैरान था, गुरु तो कोई दोष देखता ही नहीं, उल्टा उन्हें विश्वास ही नहीं कि छंद का मौलिक रचनाकार मैं हूँ। मेरी रचना को कालीदास की रचना कहते हैं। यद्यपि इस तुलना में मेरा ही गौरव है, किन्तु गुरु की दृष्टि में मैं चोर हूँ। यह दृष्टि भ्रम भी दूर करना होगा, तब देखते हैं कि मेरी रचना में कितने दोष निकलते हैं। जब तक उन्हें सब रचना कालीदास की लगती रहेगी, तब तक वे उसमें दोष नहीं देखने वाले।
अगले भेंट में युवक चार पाँच विविध छंद में एक ही भाव-विचार की रचना लेकर प्रस्तुत हुआ, कहा, "इसे कालीदास ने लिखा है, मैंने कई बार इन्हें पढ़ा, इनमें एक जगह दोष है, क्या आप बता सकते हैं गुरुजी, वह दोष क्या है?"
आचार्य दोष खोजने के लिए प्रत्येक छंद पढ़ गये, किन्तु उन्हें कहीं कोई दोष मिला ही नहीं। उन्होंने अर्थ की समानता पर ध्यान नहीं दिया था। बोले, "नहीं, छंद के नियमों में कहीं कोई दोष नहीं है। कालीदास छंदों के प्रयोग में सिद्धहस्त थे। भला उनसे कैसे दोष संभव है?"
अब शिष्य की बारी थी, उसने कहा, "गुरुजी, दोष तो है, आप नहीं देख पाये। कालीदास पागल है, उसने एक ही बात बार-बार अलग अलग छंद में लिखकर पुनरुक्ति दोष किया है। यह दोष उसने जानबूझकर किया है। क्योंकि उसका गुरु उसकी अपनी रचनाओं में दोष नहीं दिखाता, वर्ना कौन कवि होगा जो एक ही बात कहने के लिए एकाधिक छंद का उपयोग करके श्रम और काल की हानि करेगा? क्या कालीदास ने कहीं किया है ऐसा? यदि नहीं तो वह पागल कालीदास मैं ही हूँ गुरुजी।"
गुरु की तंद्रा टूटी, शिष्य ने बात तो बिल्कुल ठीक कही थी। उन्होंने स्वीकार लिया कि युवक ने मौलिक रचना की है। अब उसे दुबारा देखा। कवि, केवल एक जगह शब्द रूप लिखने में चूक गया था। जिसे सुधारने के लिए गुरु ने कह कर आश्चर्य व्यक्त किये बिना नहीं रह सके। यह तो स्नातकोत्तर विद्या है, यद्यपि ऐसी कुशलताएँ शिक्षा की मोहताज नहीं होती, तथापि ऐसी रचना करना तो मेरे लिए भी संभव नहीं है।
गुरु द्वारा किया हुआ प्रसंशा, शिष्य को जीवन सत्व देता है, कौशल में संजीवनी फूँकता है, आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाता है।
शिष्य को निकट देखकर शास्त्री जी बहुत आश्वस्त हुए। उन्होंने अपनी दुविधा उस युवक से समक्ष रखी, और कहा कि "अब इस पीठ की ओर से शास्त्रार्थ में तुम्हें सम्मिलित होने जाना है। केशव पुर की ओर से तुम्हीं आचार्य होगे।"
युवक भी घबराया, बनारस का विद्वत्परिषद् उसे अनुमान था, मानों हाथी की तुलना चींटी से की जा रही थी। लेकिन केशव शास्त्री आश्वस्त थे, यदि उन पंडितों के सम्मुख यदि कोई अपने धैर्य से खड़ा रह सकता था तो केवल वही युवक। उन्होंने समझाया, " तुम तनिक भी विचलित न होओ, यह केशवपुर पीठ के सम्मान का प्रश्न है, यदि मैं गया तो शास्त्रार्थ में पराजित होने पर पीठ की प्रतिष्ठा पर बन आयेगा, तुम गये तो सब बना रहेगा। मैं जानता हूँ, तुम कभी उनसे हार नहीं सकते, और यदि तुम हार जाओगे तो उनसे मैं तो निश्चित ही हार जाऊँगा। तुम्हें शायद नहीं पता, तुमने कई बार मुझे हराया है। तुम नहीं जानते, आज तक जब मैं तुम्हें नहीं जान सका, तो भला वे क्या जान पायेंगे। तुम जाओ, तुम जरुर जीतोगे। तुम्हारे हार से भी इस पीठ की प्रतिष्ठा पर अधिक आँच नहीं आने वाली। जीत गये तो इसी शोभा अनगिनत चंद्रिकाओं की आभा दीप्त हो उठेगी। मुझे ऐसा ही प्रतीत हो रहा है।"
शिष्य सिर झुकाये रहा, मना नहीं कर पा रहा था। उसे भी गौरव और रोमाञ्च के साथ साथ भययुक्त झुरझुरी भी मालूम दे रही थी। पर अब तो जाना ही था।
वह दिन भी आ गया, शिष्य के द्वार पर एक द्रुतगामी वाहन आकर रुकी थी। जो शायद आयी थी, पंडित केशव शास्त्री को लेने, लेकिन उन्होंने अपने स्थान पर शिष्य को नियुक्त किया हैं, ऐसी सूचना दिलाई और स्वयं कहीं अन्यत्र व्यस्त थे। अतः वाहन शिष्य को द्वार पर उसे लेने आ धमकी थी। युवक के पास कोई उत्तम वस्त्र नहीं था, उसने एक खादी का कुर्ता लिया था, जो बहुत ढीला था, और पायजाम जो चूडीदार नहीं बल्की वह भी ढीला बेलबाॅटम की तरह था। कुर्ता इतना लंबा कि वह पैर की एड़ी से एक बालिस्त ऊपर तक झूल रहा था। युवक की काया इतनी क्षीण थी कि लगता था मानो, किसी हैंगर पर वस्त्र सूख रहा हो। ताम्रवर्ण का वह युवक किसी कोण से केशवपुर का आचार्य नहीं लग रहा था। अशास्त्रीय वेशभूषा ऐसा था मानों मेघ के भयानक समूहों ने प्रचंडतेजवान सूर्य के परिचय को घेर कर रहस्य के कोष में छिपा लिया हो। वह असाधारण युवक सचमुच असाधारण ही था। साधारण लोग भी समयानुसार अपने वेशभूषा का खयाल तो रखते ही थे, किन्तु वह इस संबंध में निरुपाय था।
संप्रति वह तैयार होकर बारात के साथ वहाँ गया, जहाँ होने वाली घटनाएँ घटित होने को आतुर थी। इधर बारात द्वार पूजा को चली, उधर वर पक्ष के आचार्य को दीर्घ शंका के निवारण हेतु अलोप होना पड़ा। वरपक्ष और कन्यापक्ष आमने-सामने खड़े थे। कन्यापक्ष ने मंगलाचरण से श्रीगणेश किया, तदोपरांत शास्त्रार्थ का सवाल जवाब होना था। वर पक्ष की ओर से पंडितों की पंक्ति में अपने रूप की कांति से माथे पर तिलकचंदन लगाये वर के पिता जी ही आचार्य प्रतीत हो रहे थे। किन्तु वे संस्कृत भाषा के जानकार नही थे अतः शास्त्रार्थ के लिए कन्या पक्ष के आचार्य ने जो कुछ उन्हें संस्कृत मे निवेदित किया, वे समझ नहीं पाये। उनके साथ खड़े एक पेडित जी ने जब उन्हें बताया कि कन्या पक्ष के आचार्य उन्हें वर पक्ष का आचार्य समझकर शास्त्रार्थ आरंभ करने को कह रहे हैं। अब वे चकपकाये, उच्च स्वर में घोषित किया,"अरे नहीं - नहीं, मैं तो वर का पिता हूँ, हमारे आचार्य तो शायद पीछे कहीं हैं...." पंडित तिलकधारी की दृष्टि श्री रामकृष्ण प्रिय को खोजने लगी।
अब तो सब लोग आचार्य का अनुसंधान करने लगे। कन्या पक्ष के विद्वानों की उत्कंठित दृष्टि भी उन्हें देखने को अकुला उठी। तभी, विचित्र वेष से सुसज्जित वह क्षीणकाय युवक दूर से आता दिखा। तिलकधारी भी प्रसन्नतायुक्त उच्छ्वास त्यागते हुए, उस युवक के माथे पर तिलक लगाकर जोर से घोषणा कर दिये, "देखिये, वर पक्ष के आचार्य यह रहे।"
बनारसी आचार्यों ने बड़े विस्मय से पंडित रामकृष्ण प्रिय की ओर देखा। वे कहीं किसी कोण से आचार्य लगते ही नहीं थे। उन्हें वर पक्ष के आचार्य को सूचित किया, "द्वार पूजा में मंगलाचरण संपन्न हो चुका है, अब परंपरानुसार कन्या पक्ष के आचार्य शास्त्रानुसार प्रश्न करता है। किन्तु यह अवसर हम आपको देते हैं, यदि कोई संशय हो तो पूछिये?"
रामकृष्ण ने बिना एक पल सोचे,"प्रतिवाद किया, नहीं, मैं संशय मुक्त हूँ। कोई शंका नहीं है। यदि आपको हो तो आप कहिये।"
कन्या पक्ष के एक वयोवृद्ध आचार्य, जिनकी आयु नब्बे से अधिक हो चुकी थी, साफा पगड़ी पहने हुए, वैष्णव तिलक लगाये हुए, अपनी सुदीर्घ काया और गौर वर्ण की कांति से सौंदर्य की अनुपम अनुभवी छटा बिखेर रहे थे। अत्यंत अस्फुट स्वर में, एक बार ही, कह उठे, "साधु।"
शास्त्र विवेचना को अमृत से सींचने वाला एकमेव यही शब्द है। इससे विश्वास दृढ़ होता है। रामकृष्ण आश्वस्त हुए।
कन्यापक्ष के आचार्यों ने, वर पक्ष के आचार्य की वेशभूषा पर आपत्ति व्यक्त करते हुए प्रश्न किया, "क्या आपने जो वेशभूषा धारण किया है, वह म्लेक्ष वेषभूषा नहीं? क्या सनातनी वेष भूषा यहीं है? आप हमारी शंका का समाधान करें?"
वर पक्ष के आचार्य ने, सोचा था कि शायद पुरुष, प्रकृति या ब्रह्म के संबंध में कोई प्रश्न किया जायेगा, इस प्रश्न के लिए वे तैयार नहीं थे। जीवन कहाँ मोड़ लेगी, किसे पता होता है? हम जिस समस्या के लिए तैयार होते हैं, बहुदा वह नहीं आती, होना होता है, वह कोई पहले से नहीं जान पाता। तथापि बिना विलंब किये पंडित श्री रामकृष्ण जी ने कहा, "मैं नहीं समझता कि मेरा धारण किया हुआ वस्त्र म्लेक्ष है। यदि यह वस्त्र म्लेक्ष है, तो निश्चय ही वह वस्त्र भी म्लेक्ष है, जिसे आप सभी विद्वत् जनों ने धारण किया।"
यह उत्तर पा कर सम्मुख बैठे सभी विद्वान क्रुद्ध होने लगे। आवेग में कह उठे, "बताओ, हमारा वस्त्र म्लेच्छ कैसे है?"
रामकृष्ण अपने संपूर्ण विश्वास से मुस्कुराए, उनका लक्ष्य अचूक रहा, प्रतिक्रिया उनकी सफलता का द्योतक था। सविनय कहा, "इस प्रश्न का उत्तर तो आप लोगों को देना चाहिए कि, मेरा वस्त्र म्लेच्छ कैसे है?"
वे एक साथ सनातन वस्त्र की विवेचना करने लगे, "सनातन वस्त्र वह हैं, जो न कहीं से काटा गया हो, न कहीं सूई से सिलाई करके जोड़ा गया हो। हम ने जो, उत्तरी, धौत्र, कौपीन, पगड़ी आदि धारण किया हैं, वह सब इस परिभाषा से पोषित होने के कारण सम्यक सनातन वेशभूषा है, जब की आपने जो कुर्ता पाजामा पहना है, या आज कल जो लो आंग्ल वेशभूषा धारण करते हैं, वह अनार्य हैं, म्लेच्छ है। अशास्त्रीय है और अशोभनीय है।
अब आप सिद्ध करो, जो आपने कहा कि, 'यदि यह वस्त्र म्लेक्ष है, तो निश्चय ही वह वस्त्र भी म्लेक्ष है, जिसे आप सभी विद्वत् जनों ने धारण किया'।"
रामकृष्ण जी पुनः मुस्कुराते हुए कहा, "जिस तरह मेरा वस्त्र कटा है, ठीक ऐसे ही मैं देखता हूँ आपके वस्तु भी अखंड नहीं हैं, उसे काटकर अलग-अलग किया गया है, आपका धौत्र आपकी उत्तरीय से अलग है, और आपकी पगड़ी भी अखंड़ तो नहीं है। अब रही सिलकर जोड़ने की बात तो ताना-बाना पर एक एक सूत्र को जोड़कर ही यह वस्त्र निर्मित हुआ है। इस प्रकार मेरा वस्त्र तो फिर भी इस युक्ति से श्रेष्ठ है। क्योंकि हमने इसे अपनी आवश्यकता नुसार बना लिया है।"
सभी विद्वान एक स्वर में चीख उठे, "कुतर्क है, यह तो कुतर्क है, चलो हमने मान लिया कि हमारा और तुम्हारा दोनों का वस्त्र म्लेच्छ है, तो सनातन और दिव्य वस्त्र कौन सा हैं?"
उन्होंने संयत स्वर में जवाब दिया, "वह वस्त्र जो सृष्टि हमें अपने स्वयं के हाथों से पहनाती है। जिसको हमारे शास्त्रों ने अखंड़ परिभाषित है। जो बेजोड़ है। केवल और केवल वही हमारा दिव्य और सनातन वस्त्र है।"
कन्या पक्ष के विद्वान एक स्वर में कह उठे, "हाँ, यही तो हम कह रहे हैं, क्या आप कुछ दूसरी बात बता रहे हैं? "
रामकृष्ण ने पूरे विश्वास से बताया, "जी हाँ, मैं बिलकुल दूसरी बात बता रहा हूँ, आप जिसे सनातन वस्त्र कर रहे थे, वह कृत्रिम और मानव निर्मित है, वह सनातन नहीं है, प्राकृतिक नहीं है। वह मानवाभिमान के पुरुषार्थ से निर्मित केवल विकार है। फिर चाहे वह मेरा वस्त्र हो, या आपका। सनातन वस्त्र तो वह नवजात शिशु धारणकर के आता है। दिव्य वस्त्र तो वह है जिसे शुकदेव जी धारण करते थे, सनातन वस्त्र तो वह है, जिसे महावीर जैन ने पहना था। वह सनातन और दिव्यवस्त्र केवल दिगम्बर है, दिगम्बर ..."
श्री रामकृष्ण जी का इतना कहना था कि, वे वयोवृद्ध आचार्य, जिनका कन्या पक्ष के सभी विद्वान आदर सम्मान करते थे, उनके शरीर में एक दिव्य स्फूर्ति का संचार हुआ, वे स्वयम् को रोक नहीं सके, भाव विह्वल होकर तीन बार, "साधु, साधु साधु।" कहा, बढ़ कर रामकृष्ण के निकट आ गये, उन्हें अपने आलिंगन में कसके भींच लिया, प्रेम और आदर ने उस नौजवान की पीठ ठोकने लगे। वर पक्ष के लोगों ने अपने विजय की घोषणा की। केवशपुर की मर्यादा सुरक्षित हुआ।
~योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती ....
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