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Friday, 4 January 2019

विमर्श ...

आर्य बंधु श्री Awdhesh K Dwivedi जी का प्रश्न:-

अंधकार बिना प्रकाश का सही आंकलन सम्भव है क्या?
पर्दा और बेपर्दा दोनो की ही अपनी मर्यादा होनी चाहिए अथवा नहीं?
पर्दा अमर्यादित होकर बुरका ना बन जाये।
बेपरदा अमर्यादित होकर नग्नता न बन जाये,इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि नहीं?
बाबा जी।मार्ग दर्शन करें।

अपने आर्य बंधु-बांधव एवं स्वयं प्रश्नकर्ता के लिए मेरा मंतव्य:-

आपके सवाल बेहद पांडित्यपूर्ण हैं और इसके लिए सर्वप्रथम मैं आपको साधुवाद दूँगा।

सवाल का बीज भले एक हैं किन्तु उसके विकसित शाखाओं की तीन बिन्दु है।

प्रथम तो यह कि अंधकार के बिना प्रकाश मूल्यहीन होता है। यह धारणा भ्रामक है। प्रकाश कण भी सूक्ष्म द्रव्यों से ही निर्मित हैं, जो दूसरे किसी द्रव्य से अवरुद्ध होकर अपना मार्ग बदल लेता हैं इस प्रकार अप्रकाशित द्रव्य ही अंधकार दीख पड़ता है मूलतः तीनों ही एक ही तात्विक संरचना का अवस्था परक विस्तार है। मात्र इलेक्ट्राॅनों, न्यूट्रानों तथा प्रोटाॅन्स की मात्रा एवं संख्या भिन्नता से यह गुणात्मक विकास हुआ है। जिन्हें हमारे दर्शन शास्त्र में भी सतोंगुण (प्रकाशित कण) रजोगुण (प्रकाशोन्मुख कण) तथा तमोगुण (अप्रकाशित कण) कहा गया है। किन्तु तत्ववेत्ता जानते हैं कि उक्त सभी अणुओं के गर्भ में प्रकाश या ऊर्जा विद्यमान है। सदैव प्रकाश ही महत्वपूर्ण नहीं है, यदि ऐसा ही होता तो सृष्टि के विकस अन्य दोनों की आवश्यकता ही न होती। और सृष्टि कभी भी अनावश्यक कार्य करती ही नहीं। महत्वपूर्ण तीनों अवस्था हैं, और भूलतः तीनों एक ही हैं, यह तो धर्म चक्र अथवा कालमान का विशेष आग्रह है कि उन्हें तीन भिन्नता विशेष गुणात्मक अवस्था की मर्यादा का पालन करना होता है।

अतः मैं नहीं मानता कि अंधकार के कारण ही प्रकाश महत्वपूर्ण होता है।

अब आपके दूसरे बिंदु पर विचार करते हैं, आपने पूछा मर्यादा होनी चाहिए या नहीं,
मैं कहता हूँ हाँ जरूर होनी चाहिए और मैं सदैव मर्यादा का पक्षधर रहा हूँ । मर्यादा ही धर्म का एक और नाम है। धर्म ही सृष्टि का स्वरूप और पहचान है। अतः मैं तो सदैव इसका पक्षधर हूँ ।

तीसरा बिंदु मर्यादा ---

 पर यह भी ठीक ठीक जान लेना, कि लाज करना, पर्दा करना या वस्त्रको धारण करना या न करना मर्यादा की परिभाषा नहीं है। वेदांत का स्पष्ट निर्देश हैं अति न करो। भीषण ग्रीष्म काल हैं और उसमें आपने, अति वस्त्र धारण कर लिया तो यह अमर्यादा ही है और इसका दंड भी प्रकृति ही उसे पीड़ा देकर पूर्ण कर देती है। अति शीतकाल में निर्वस्त्र होने का हठ भी घातक होता है।
किन्तु इस न्याय व्यवस्था का संबंध मनोविकारी मानव की उच्श्रृंखलता से नहीं है। यह तो केवल एक बहाना है। मैं जानता हूँ, जितनी उच्श्रृंखलता पर्दे के भीतर चुपचाप हो जाते हैं उतना तो बेपर्दे में नहीं हो पाता। फिर भी पर्दा सम्मानित है, क्योंकि चोर पकड़ में नहीं आते। शरीर खुद वस्त्र है। उसपर और वस्त्र लाद लेना भी अमर्यादा ही है। यदि यह मर्यादा होता तो कोई कारण नहीं था कि प्रकृति हमें अमर्यादित जन्म देती। क्यों कि वह तो कभी मर्यादा का उलंघन करती ही नहीं। अब इसे हमारे मनोविकार ने मर्यादा बना दिया। मित्र मेरी बाते लीक से हटकर अवश्य हैं किन्तु मनोरोग की दवा का नाम नारी का पर्दा या प्रतिबंध नहीं है। महाभारत का प्रसंग ही लो द्रोपदी ने कौन सा अंग प्रदर्शन कर दिया कि दुशासन और दुर्योधन उन्हें अपमानित करने लगे? सुग्रीव की पत्नी ने कौन सा अंग प्रदर्शन किया कि बाली उसे भी अपनी भोग का वस्तु बना लिया? सामाजिक मनोविकार पर पर्दे की तरफदारी करके पर्दा डालना भी वैसा ही अपराध हैं जैसा कि किसी स्त्री का मान भंग करके किया जाता है। मैं मानता हूँ बदलते परिवेश में नग्नता अमर्यादा है किन्तु इसका संबंध समाज से कम और ऋतु से अधिक है। इसलिए ऋतु के प्रति किये जाने वाले अपराध का दंड समाज द्वारा दिया जान भी अनीति और अपराध ही है। ऋतु की मर्यादा को लांघने का दंड वह स्वयं देती है। अतः पाप को बनावटी बातों से ढँकना भी सामाजिक अपराध ही है। बल्कि हम स्वयं रोग को प्रोत्साहन देने का अधम कार्य कर बैठते है।

मित्र, जो मेरा विचार था मैंने कहा। मानना न मानना प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र अधिकार है।

योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती 

जय शिवाशिव....

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