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Monday, 7 January 2019

अग्निस्यरूपम्


(अब तक की संपूर्ण  कथा)

भाग-1
आज से 39 साल पहले जब मेरी चेतना की दृष्टि चारों ओर पड़ी तो देखा कि पतरा की दीवार थी लकड़ी के स्तंभ और इटालियन खपरैल का छत था। खाना-पीना, रोना-धोना तो लगा ही था। सुहाने दिन और भयानक रातों का परिचय भी वहीं हुआ।

एक वर्ष ऐसे ही बीते अब बुद्धि पर नातों और संबंधों के रज्जु पड़ने लगे थे। मुझे क्या पता माँ क्या बला है और तब मैं क्या जानूँ कि पिता किस तत्व को कहते हैं? मैं तो नानी की दुलार और नाना की मदमस्त सुरक्षा के बंधन से जकड़ा हुआ था। किसी और को जानता भी न था।

रेल्वे विभाग के लोहार खाते में एक बाभन उपनाम धारी प्राणी(मेरे नाना जी) सुलगती भट्टी की आँच के सामने लोहा पीट-पीट कर भी लोहार नहीं  बाभन ही था। कुछ संभ्रांत लोग मेरी जिस झोपड़ी के सामने से नाक पर खुशबू से लिप्त रुमाल रख कर साँस रोके गुज़र जाते थे वही स्थान मेरी नानी के वात्सल्य से मेरे लिए स्वर्ग था।
हाँ मुझे आज भी याद आते हों हे तारकोल की कालिख से लिप्त पतरा की दीवारों, बहुत याद आते हों! अनगढं लकड़ी के स्तम्भों, इटालियन खपरैलो, बरगद का दुधहा छाँव, और झोपडे के पार्श्व से अविरल बहती तीक्ष्ण गंध से युक्त विशाल नाला, मेरे जीवन में तुम्हारा महत्व किसी कालिंदी से कम नहीं।
नियति मेरी चेतना से तुम्हारी स्मृतियों को चाहे जितना यत्न करके पोछ देना चाहे पर उसकी योजना कभी सफल न होने पायेगी। मैं तुम्हें याद रखूँगा। कभी न भूलूंगा।
नानी ने कहा था, "गुड्डू कल चलेंगे, तुम्हारी माँ के यहाँ। तुम चलोगे?"

मैंने पूछा, "माँ?  यह क्या है?"

तब उन्होंने उसी पतरे की दीवार पर टँगे एक चित्र में सुन्दर सी यशोदा की चित्र दिखा कर बताया, "देखो! वो है। वैसी है।"

मैंने कहा, "ठीक है चलो।"

दूसरे दिन मैं और मेरी नानी दोनो ही किसी विशाल रूग्णालय के परिसर में थे। वातावरण में अजीब गंध था। मै सह नहीं पा रहा था। अपरिचित स्थान बुद्धि में भय बन कर छाता जा रहा था। हृदय काँप उठा। मैंने नानी से कहा,"अभी घर चलो।"
वे बोली,"बस अब हम पहुँच गये है, तुम अपनी माँ से मिलोगे न!"
इतना सुनकर स्मृति में माता यशोदा की वह आकृति उभर आयी। पर डर के कारण मेरा हाल बुरा था। मैं जिद्द करने लगा,"नहीं, अभी घर जाना है।"
पर नानी अविचल रही वो एक कक्ष में प्रवेश कर रही थी जहाँ बहुत से लोग गहरी वेदना से अजीब आवाजें निकाल कर कराह रहे थे। अजीब वेशभूषा था।थे तो मानव ही पर लगते न थे।
मैं वातावरण की भयानकता सह नहीं पाया और नानी की गोद से उतर कर उल्टे पाँव भागने लगा।
नानी एक खाट के पास रुक कर माँ को संबोधित किया," देख राधा कौन आया है आज!"
"के हौ अम्मा?"
"तोहार गुड्डू।"
"का! सच?"
"हाँ ।"
और नानी मेरे पीछे दौड़कर मुझे फिर उठा लायी। वह बोली,"देखो यह है तुम्हारी माँ।"

उस महिला के संपूर्ण बदन पर सफेद पट्टी बँधी थी। अभी कुछ देर पहले वह कराहकर और गिगिडाकर वैद्य से मृत्यु की याचना कर रही थी। हाँ, वही महिला वात्सल्य से भर गई। उसकी पीड़ा का अंत हो गया। वह बोली,"आवा लाल।"
पर मेरी हिम्मत न हुई।
मैं बेहद डर गया और भूत भूत चिल्लाकर भागा।
नानी ने कहा, "तेरी माँ है। डरो नहीं आओ।"
पर माँ तो पतरे के दीवार पर टँगी थी न!

भाग-2
😣😣😣😣😣😣

नानी अपनी बेटी राधा के कष्ट को याद करके अक्सर रो पड़ती थी। कोई दूरस्थ अतिथि आ जाता और राधा का हाल समाचार पूछ लेता बस! हृदय में स्मृतियों का प्रभंजन उठ खड़ा होता और फुफ्फुस में जेठ का लूह बहने लगता, नेत्रों से सावन की फुहार रिमझिम कर बरस जाती। फिर भी जीवन के प्राणों पर संभावित लांछन की सुलगती अग्नि बुझने का नाम न लेती थी।

वह उन्हें भरभराये कंठ और अश्रुपूर्ण नेत्र लिए बताती," उस रात राधा अपने छः महीने के बच्चे को लिए यहीं लोहे के पलंग पर कथरी बिछाये सोयी थी।नायलोन की हल्की फूल छापे की साड़ी में गौरांग बिटियाँ का रूप मेरे नेत्रों को शीतल कर रहा था। उनका रात पायली की ड्यूटी थी। जाते जाते काली जबान के स्वामी कह गये थे कि, "राधा के सिर से लैंप हटा देना।"
हम सब काम धाम में उनकी चेतावनी भूल गये। वैसे भी वह रोज़ वहीं जलता रहता था। राज और शिवकान्त बाहर कहीं सो रहे थे।
यहाँ मै शशिकांत को अपने पास लिए सो रही थी। बतियाते बतियाते रात का दूसरा पहर होने को था और नींद आ गई। सब सो गये थे। चेतना बिल्कुल सुन्न हो गया था।
रात के दूसरे पहर की बात है। अचानक मैने सुना राधा का छः महीने का बालक गुड्डू जोर-जोर से रो रहा था।
मैं खिन्न मन से उठी। मन में सोच रही थी कैसी है यह राधा भी। घोड़ा बेचकर सो जाती है मुन्ने का जरा भी ध्यान नहीं । पर देखा तो बता कुछ और ही था। मेरे लिए जो न होना चाहिए था नियति कुछ वहीं कर रही थी। कमरा आग की लपटों से धू धू कर जल रहा था। गुड्डू अम्मा अम्मा किये रोये जा रहा था। कमरे में प्रलय का भयानक प्रकाश और विषैला काला धुआँ भर गया था। हत बुद्धि सी मैं गुड्डू को राधा के पलंग से दूर ले गई। पर हाय! मेरी बेटी राधा अब भी उस पलंग पर चट चट करती बेसुध जल रही थी। नायलोन की वह सुन्दर साड़ी महाकाल धर्मराज का वह फंदा था जो उसे मृत्यु लोक खींचे लिये जाता। मैं क्या करूँ सोच नहीं पा रही थी। आस-पास के लोग पानी लाने आग बुझाने को दौड़ पड़े मैं आपने हाथों से राधा के शरीर पर फैलते मृत्यु के अटल अग्नि लपटों को बुझाने की कोशिश कर रही थी पर वह बुझने का नाम ही न लेता। बस कुछ समय की बात थी। जीवन की ज्योति बुझ जाने को थी।
बाहर राज दरवाजा पीट रहा था।
"अम्मा क्या हुआ? दरवाजा खोलो।"
मुझे कुछ सुनाई न दिया चार साल का शशिकांत गुड्डू को लेकर बाहर जाने के लिए किवाड खोल दिया। बस राज को अन्दर आने का अवसर मिल गया।
राज ने देखा माँ परेशान है और बेसुध बहन जलती जा रही है। उसके शरीर पर मोटा कंबल था। उसने आव देखा न ताव बस अपनी बहन को कंबल में लपेट कर उठा लिया और बाहर की ओर लेकर भागा। पड़ोसियों ने पानी डालकर कमरे की अग्नि तो शान्त कर दी किन्तु उन्हें जो करना था वे कर चुके थे।
मैं कुछ देर बाद होश में आयी। शशिकांत और गुड्डू को लेकर बहर निकली। क्या हुआ राधा बच पायेगी या नहीं?  कितनी जली है? गुड्डू का क्या होगा? दमाद को क्या जबाब दूँगी?
जवाब ढूँढ रही थी। सवालों ने घेर कर बेचैन कर दिया था। बाहर घंटों तक इधर उधर देखती रही। पर कोई न मिला न राज, न राधा और न ही कोई बताने वाला सब सवाल ही कर रहे थे,"कैसे हुआ यह सब?"
किन्तु इसका भी जवाब देते न बना।

भाग-3
😭😭😭😭😭😭😭😭
नानी ने आँसू पोछते हुए अपनी छोटकी भौजाई पानकुँवर को उस दिन का घटनाक्रम बता दिया। वह भी अपनी भांजी की दशा रूग्णालय में देख आयी थी। आँखों में आँसू स्पष्ट तो न थे किन्तु कुछ नम अवश्य हो आया था।
वह बोली,"दीदी! राधा बहुत बुरी तरह जल गई है। उसकी पीड़ा और कराह सुनकर तो घबराहट होती है। सच कहूँ वह डाॅक्टर से गिडगिडा रही थी मुझे बचा लो, मुझे मरना नहीं है। हाय! मेरा लाल।
पूनम के पापा बता रहे थे, "एक महीना पहले यही राधा डाॅक्टरो से कहती थी मुझे जहर दे दो। मार दो। दर्द सहा नहीं जा रहा है। तब पहुना वहीं थे। बेचारे का मुँह झुरा गया था। असमय यह कैसा आफत आ गया! उन्हें तो देख कर दया आती थी। मन करता था ऐसा क्या करूँ कि चमत्कार हो जाये । मुर्झाये लटके चेहरे पर रंग लौट आये। बहुत बेचैन दिखे! राधा जब मौत माँग रही थी तो वे तिलमिला उठे।
भर्राये गले से बोले,"यह क्या है गुड्डू की अम्मा! बस हार गई! इतना ही साथ है हमारा। मुझे अकेले छोड़ कर जाना है?"
राधा बोली,"देखते नहीं मैं क्या से क्या हो गई! नहीं रही पहले जैसी। यह रूप कोई देख ले तो डर जाये। क्या करोगे ऐसी कुरूप पत्नी का आतंक जिलाकर मर जाने दो मुझे। कहो उनसे कि मार दें मुझे।"
"नहीं ऐसा मत कहो प्रिय! तब तो शायद तुमने मुझे ठीक-ठीक समझा ही नहीं। हमारा प्रेम सिर्फ तुम्हारे रूप और रंग तक ही तो नहीं है। इससे बहुत आगे और बहुत गहरा है। तुम्हारे मन में मेरे लिए अगर थोड़ा सा भी प्यार हो तो तुम्हें मेरी कसम है तुम लाख पीड़ा सह लो, अंधी कानी या अपंग और अपाहिज होकर भी अपना प्राण न त्यागो। समझ लो यह पीड़ा सहकर गुड्डू की माँ उसके उज्वल भविष्य के लिए तप कर रही है। जैसे भी हो बस एक बार ठीक हो जाओ। पहले अपनी पलकों मे रखता था पर अब से अपने दिल में रखूँगा। साहस दिखाओ धीरज रखो। सब ठीक हो जायेगा।"
"देखते नहीं कितना जल गई हूं। बचकर भी किस काम की रहूंगी मैं? किसी पर बोझ होकर जीने से अच्छा है मर जाना। पर मैं अधम हूँ इतना जल जाने पर भी मेरे प्राण नहीं जाते।"
"नहीं ऐसे नहीं सोचा करते, हाथ पैर चलाना ही काम नहीं होता। साँस लेकर आदर्श स्थापित करना भी एक काम है। विपत्ति और पीड़ा देखकर कौन जीना चाहता है। कायरों का यही आदर्श है जीवन से पलायन! पर मुझे विश्वास है मेरी राधा ऐसी नहीं है। बोलो है न!"
राधा पीड़ा में भी हल्का सा मुस्कुरा दी थी। मानों वर्षों से निर्जल बंजर भूमि पर कोई एक हरे घास का अंकुर फूटा हो। मेरी आँख डबडबा आयी थी। उन दोनों के एकान्त संवाद में मैं विघ्न नहीं होना चाहता था। न जाने और कितने दिनों का साथ है। कल बात कर पाये या नहीं । मैं दूर से ही इतनी बात सुनकर हर्ष और खेद के परस्पर विरोधी भावों से भरकर रूद्धकंठ हो चला था। पहुना बिल्कुल देवता है देवता! इस कलयुग में देवता। बिल्कुल जीता जागता हाड मांस का देवता।" इतना बताकर उनकी आँखें बरस उठी थी और सुनकर गर्व से मेरी आँखें भी पर दीदी! गुड्डू के बाबूजी को इस घटना की सूचना किसने दी थी?"

(भाग-4)
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अभी भोर में प्रथम प्रहर के पूर्व का एक याम शेष था। संजय को अजीब सी घबराहट हो रही थी। मन उचट रहा था।
वे सोने की कोशिश कर रहे थे। अवचेतन में वे साफ साफ सुन रहे थे गुड्डू खूब रो रहा था। पापा पापा गुहारता। एक अज्ञात अंध कूप में गिरता हुआ।
उन्होंने खुद बताया कि, "तब मैं चाहता था कि बचा लूँ गुड्डू को पर मैं तो सिर्फ़ दर्शक मात्र रह गया। हृदय का स्पंदन अनियंत्रित विस्तृत होता गया। हाथों की हथेलियाँ और पैर के तलुवे फूलते जा रहे थे। कितना भयानक दृश्य था। प्राणों का आल्हाद वह गुड्डू किसी अंधेरे में मुझसे दूर हुआ चाहता था और मैं उसे बचाने में असमर्थ हूँ! मैं बारंबार कूदता हूँ उस अंधेरी सुरंग में कि मेरा मेरे जीवन का अमृत न छलक जाये। जीवन का आनंद कलश न रीत जाये। पर हर बार मैं किनारे हो गया। कोशिश बेकार था। वह उस सुरंग में गिरता ही रहा। "पापा-पापा" की भयाक्रांत गुहार अनुगूँजित होती रही।
फिर अवचेतन का पटल तमस से भर गया। वह अनुगूँज शान्त .... गुड्डू कहीं विलुप्त। सिर्फ़ अंधेरा ही अंधेरा था।
कुछ क्षण बाद अंधेरे में किरण बिन्दु पुनः आकार ले रहे थे। एक सुन्दर सी नारी मानो अंबर की कोई अप्सरा किसी भव्य महल के वस्तु संपन्न शयन कक्ष में उन्नीदी सी लेटी थी। गुड्डू वहीं उस सुकुमार दिव्य काया का स्तन पान कर रहा था।
यहाँ अंधेरे और प्रकाश के संधिकाल का वातावरण था। मेरी चेतना को संबल मिला। परमात्मा तूँ धन्य है। एक पल में प्राणों का पोषण लेकर जीवन की लता को सुखा देता है और दूसरे ही पल अमृत से सींचकर पुष्पाच्छादित वल्लरी से वसंत का संचार कर देता है।
चतना और निकट जाने लगी। वह नारी किञ्चित भी हिल नहीं रही थी। सुगढ़ एवं परिष्कृत पाषाण विग्रह सी निश्चल!
कुशंकाएँ पुनर्जीवित होने लगी। कहीं वह राधा तो नहीं । अरे हाँ! यह तो वही है। एक सुन्दर शव! मैं खेद और विषाद से भर गया। गुड्डू की भूख का खेद! हाय विधा! तूँ कितना निर्मम है? एक अबोध शिशु की क्षुधा का भी निर्वाह न कर सका!धिक्कार है तेरी प्रभुता को। धिक्कार है, मेरे उन विश्वासों को भी जो तेरे प्रतीकों में आस्था की दिव्यता भर कर देखता है।तूँ इतना भी न कर सका? हाय मेरा बच्चा मातृहीन हो गया। शब्दहीन खेदयुक्त विचार निरंतर उपज ही तो रहे थे। दृश्य देखकर आँख भर आया था। मैं गुड्डू को उससे अलग करने को हाथ बढ़ाया ही था कि अचानक कक्ष का प्रकाश काँपने लगा। कभी अंधेरा तो कभी प्रकाश !
क्या देखता हूँ गुड्डू के आकार में विकृति.... वह विशाल दैत्य में निरूपित होता जा रहा था। राधा के वक्ष से रक्त का फौवारा फूट पड़ा। गुड्डू के रूप का वह मायावी महाकाल पुरुष अब मुझे घूर रहा था। भयानक अधरों पर रहस्य की मुस्कान तैर रही थी। तीक्ष्ण दाँतों से रक्त टपक रहा था।
मेरी चेतना में भीषण रव उत्पन्न हुआ। द्रुत ताल पर घंटा बज रहा था। घोर और भीषण शंख निनाद... मृदंग की भयानक थाप सवाल कर रहे थे, कैसे बचाओगे गुड्डू को ? देखो तुम्हारी प्रिया राधा का क्या हाल हो गया। मैं ले जा रहा हूँ इसके प्राण! क्या तूँ मेरा मार्ग रुद्ध कर सकता है?
अब वह दानव मेरी ओर लपका, मैं ही जीकर क्या करूँगा यही सोच रहा था कि चारों और धुआँ ही धुआँ फैल गया।राधा का धुंधलाता चेहरा विलुप्त होते होते कह रहा था,"अच्छा तो अब मैं चलती हूँ।"
सारे दृश्य किसी शून्य में विलीन हो गये।
मेरे काका पुकार रहे थे,"संजय, संजय! देखो कौन आया है। तुम्हारे श्वसुर! चलो उठो।"
और मैं  जाग गया। आशंकाये  सच होती प्रतीत हुई बाबूजी मुँह लटकाये बैठे थे। लगा जैसे अनर्थ घट चुका था।
तो क्या गुड्डू को कुछ हो गया है?
न मैं पूछ पा रहा था
न वे बता पा रहे थे।
बस इतना ही कहा हस्पताल चलना है।"

(भाग-5)
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जीवन का एक यथार्थ, संघर्ष भी है। एक तत्व दूसरे से गुँथे हैं। दोनों में परस्पर सहयोग और द्वन्द्व भी है। नाश और निर्माण के इसी संतुलनात्मक सक्रियता को कोई काल कहता है तो कोई धर्म !
राधा उसी धर्म चक्र पर जीवन के प्रश्नों का उत्तर खोज रहीं थी। वह उत्तर जो किसी ग्रंथ में पूरा-पूरा लिखा न था। बिल्कुल अपूर्व और अछूता। अब उसे जीना था। मर्म की वेदना शरीर की तुलना में अधिक हो गई थी। वहाँ पर किसी वैद्य का लेप न जा पाता था। यदि मैं मर गई तो संजय के बाबूजी आदि उनका दूसरा विवाह करा देंगे। फिर गुड्डू मातृहीन होकर रह जायेगा। संभवतः अनाथ! एक तो उसके दोनों हाथ विकृत और अपंग हैं। तो क्या उसका भविष्य जेड ब्रीज पर बैठे उस भिक्षु जैसी है जो खुले आसमान के नीचे 'रघुपति राघव राजा राम,पतित पावन सीता राम।' गीत के भरोशे याचक वृत्ति से आत्महीन जीवन का बोझ घसीटता हुआ होगा!
नहीं यह मुझे मंजूर नहीं! उसके लिए यदि मुझे हजार बार मौत से लड़ना हो तो लड़कर हजारों बार पराजित करूँगी। हारूँगी नहीं । कोई विकल्प कहाँ शेष है? मुझे उसका जीवन सँवारना है। मैं विधाता के भरोशे नहीं बैठ सकती।

वैद्यों के अथक सेवा और सुश्रुषा का परिणाम था कि उसके शरीर के घाव भर रहे थे। मन में जीने की लालसा बलवान हो रही थी। पहले से बहुत अंतर आ गया था। मुर्झाया पौधा पुनः हरा होने लगा। रिश्तों के आपसी विश्वास और नेह ने असंभव को संभव कर दिया।

डाॅक्टरों ने उसे बताया तुम बहुत साहसी हो। हमें उम्मीद नहीं था तुम बचोगी। हमारे मेडिकल हिस्ट्री में यह पहली बार हुआ है कि सत्तर परसेन्ट जला हुआ कोई मानव भी बचा हो। यह किसी चमत्कार से कम नहीं। अब तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी। बस हौसला बनाये रखना। आज हम तुम्हें डिस्चार्ज कर देंगे पर समय से औषधि का सेवन करना और नियत समय पर परीक्षण कराते रहना।

मन का कैसा स्वभाव है। विपत्तिकाल में दृढ़ निश्चयी हो जाता है और शांतिकाल में शंका कुशंकाओं से घिर जाता है। अभी वह हजारों बार मौत को परास्त करने वाली अदम्य योद्धा थी और फिर अब उसका विश्वास फिर डग मग होने लगा। अनागत अंधकारमय दिखने लगा। व्यवहार की वास्तविकता भावुकता से प्रबल लगने लगी। क्या संजय सच में मुझे पहले सा मान दे पायेंगे? मन ही मन चेतना सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने लगी-

(भाग-6)

"आलोकित पथ करो हमारा
हे! जग के अंतरयामी।
शुद्ध चेतना प्राण शक्ति दो
जड़ चेतन सबके स्वामी।।

कर्म वह करें धर्म जयी हों
दुर्गम सत्य सदा विजयी हो
प्रज्ञा चक्षु ज्ञान की ऊर्जा
प्रच्छालित कर जीवन कामी।।

आलोकित पथ करो हमारा
हे जग के अंतर यामी।।"

जीवन रण का दिव्य अस्त्र वह
रूप हमारा तूँ ने ले लिया।
और तमस में विघ्न शैल पर
ध्यान धरूँ तेरा नाम रे नामी।।

आलोकित पथ करो हमारा
हे जग के अंतर यामी।।"

चेतन से अवचेतन की यात्रा तक यही प्रार्थना उठती रहीं।

आज से 39 साल पहले जब मेरी चेतना की दृष्टि चारों ओर पड़ी तो देखा कि पतरा की दीवार थी लकड़ी के स्तंभ और इटालियन खपरैल का छत था। खाना-पीना, रोना-धोना तो लगा ही था। सुहाने दिन और भयानक रातों का परिचय भी वहीं हुआ।
एक वर्ष ऐसे ही बीते अब बुद्धि पर नातों और संबंधों के रज्जु पड़ने लगे थे। मुझे क्या पता माँ क्या बला है और तब मैं क्या जानूँ कि पिता किस तत्व को कहते हैं? मैं तो नानी की दुलार और नाना की मदमस्त सुरक्षा के बंधन से जकड़ा हुआ था। किसी और को जानता भी न था।

 कुछ संभ्रांत लोग मेरी जिस झोपड़ी के सामने से नाक पर खुशबू से लिप्त रुमाल रख कर साँस रोके गुज़र जाते थे वही स्थान मेरी नानी के वात्सल्य से मेरे लिए स्वर्ग था।
हाँ! मुझे आज भी याद आते हों, हे! तारकोल की कालिख से लिप्त पतरा की दीवारों, बहुत याद आते हों! अनगढ़ लकड़ी के स्तम्भों, इटालियन खपरैलो, बरगद का दुधहा छाँव, और झोपडे के पार्श्व से अविरल बहती तीक्ष्ण गंध से युक्त विशाल नाला, मेरे जीवन में तुम्हारा महत्व किसी कालिंदी से कम नहीं।
नियति मेरी चेतना से तुम्हारी स्मृतियों को चाहे जितना यत्न करके पोछ देना चाहे पर उसकी योजना कभी सफल न होने पायेगी। मैं तुम्हें याद रखूँगा। कभी न भूलूंगा।

यहाँ पत्थर के फर्श पर चिथरे चिथरे वस्त्रों के रंग बिरंगे अस्तित्व को नानी की सूचिका ने जोड़ कर सुगढ़ कथरी का बिछौना बनाया था। जिसपर न जाने कितनी रात नाना की छाती पर औधे मुँह चिपक कर सोया था। उनकी सुरक्षा का विश्वास निद्रादेवी को सुगमता से लाकर मेरी पुष्पित चेतना का अर्घ उन्हें समर्पित कर देता था।
उस विश्वास को कैसे भूल जाऊँ? उन निश्चिंत नीदों को कैसे भुला दूँ?

वह बस्ती संयुक्त सांस्कृतिक लोगों से सुसज्जित और शोभित था। आप पास से विभिन्न भाषाओं की ध्वनियाँ उठती जो सब में इतनी भिन्नता के अतिरिक्त भी बंधुता का बोध कराती।
कभी आवाज वायु में प्रश्नवाचक होकर तैरता,"सापड़िया?"
कभी शुभकामना का बोध लेकर उभर उठता,"गुड माॅर्निंग।"
तो कभी किसी का नेह निमंत्रण भी होता,"अरे!गुड्डू तूँ तिकडे काय करतो? ये की!" वह चहल पहल जैसे कोई एक ही विशाल संयुक्त परिवार! उन सबकी एक ही जाति थी एक ही वर्ग था और वह था सिर्फ़ गरीबी और दरिद्रता। पर नहीं मैं उन्हें दरिद्र भी कैसे कह सकता हूँ?  सब स्वभाव से राजा थे। सुख की पूँजी बिना सोचे बिचारे दान कर देते थे और दुख को आपस में बाँट लेते थे। धारावी लेबरकैंप के हे निर्धन श्रमिकों मैं आप लोगों को कैसे भूल सकता हूँ?

वहीं मुझे दो मित्र भी मिले एक थी सुनैना और दूसरा था डैनियल! वह कुछ ही दिनों की आत्मीयता चेतना रज्जु में कस कर बँधा हुआ पड़ा रह गया है। उनके साथ खेलना। लालच,क्षोभ,ईर्ष्या,स्पर्धा और द्वन्द्व हमारी चेतना में इन भावनाओं का अस्थाई संचार था। यदि कुछ स्थाई था तो केवल प्रेम! सभी भावनाओं से तटस्थ केवल प्रेम!!
इनके बीच मेरे शैशव के आठ नौ सौ दिन बीते थे। अब मेरी आयु अंतरीक्ष पथ पर सूर्य का तीसरा परीक्रमा आरंभ कर चुकी थी।
नानी उदास थी कल संजय गुड्डू को ले जाने आने वाले हैं। वह चला जायेगा। इसका रोना-धोना जिद करना अब नहीं सुन पायेंगे। आज इसे इसके पसंद का व्यंजन दो इसके आत्मा को अपने प्रेम से सींच लो फिर वह इतना अविरल न मिलेगा।
वे अनमने होकर नाना से बोली,"आखिर जिस पेड़ की डाल है उसी में लगेगा।"
नाना पूछे,"क्या हर्ज है अगर अभी कुछ दिन यहाँ और रह जाये!"
वे बोली,"उनका बच्चा है,उन्हें जानेगा नहीं तो कैसे चलेगा? पढ़ाना लिखाना है वो स्कूल में नाम डालने की सोच रहे हैं। हमारा मोह बच्चे का भविष्य तो खराब नहीं कर सकता। इसे जाना होगा।"
"पर यह यूँ अचानक न जायेगा। बहुत रोयेगा। चाहो तो पूछकर देख लो।"
"क्यों बेटा! तुम अपनी अम्मा के पास जाओगे न! कल तुम्हारे पापा तुम्हें लेने आयेंगे।"
"नहीं, मैं कहीं नहीं जाऊँगा यहीं रहूँगा नानी सिर्फ तुम्हारे पास हमेशा हमेशा।"
"पर वो तुम्हारे पापा है न! वो तो जबरदस्ती तुम्हें ले जायेंगे।"
"मैं रास्ते में चिल्लाऊँगा कि यह चोर है मुझे चुराकर ले जा रहा है। यह मुझे बिरिज के खंबे में नीचे गाड़ देगा मुझे बचाओ। तब सब उनको मारेंगे और मैं भाग आऊँगा। देखना वो न ले जा पायेंगे।"......

क्रमशः......

🌷🙏योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती 🙏🌷

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