एक हवा के चलते ही, गंगा नदी के किनारे सघन कोहरा छँटता है और धूप में चमकता हुआ एक अंतरराष्ट्रीय परिषद दिखाई देने लगता है। रेत के इर्द-गिर्द असंख्य शव पड़े हुए हैं और कुछ तो नदी में भी तैर रहे हैं. इसके आगे जो कुछ भी हुआ आप लोग भी महाभारत वाले संजय की दृष्टि से स्वयं देख ले...
पाकिस्तान, बांग्लादेश, कश्मीर और बंगाल के सेक्युलर वैद्य : (एक स्वर में) "70 पर तीस भारी है।"
[पार्श्व में लगातार नारे की आवाज गूंज रही है- "हिन्दू भगवा, आतंकवादी-आतंकवादी"]
इस्रायली शल्य चिकित्सक: (गंभीर मुद्रा में) "तीस भारी नहीं, सत्तर की बीमारी का कारण है, जिस दिन तीस भारी हो गया उस दिन सत्तर नहीं बचेगा।
जब चिकित्सा हो ही गया तो उपाचार भी कर लेना चाहिए।"
सनातन के कर्क प्रेमी वैद्य: (चँहक कर खुश होते हुए) "उपचार? हाह् हाह् हाह् माने कर्क हुए अंग को फिर काटकर अलग कर दें? ह्वाट ऐन आइडिया सर जी! फन्टा स्टिक"
अंतरराष्ट्रीय वैद्य: "तो और दूसरा उपाय क्या हैं?"
सनातन बौद्ध वैद्य: "तोड़ो नहीं जोड़ों, काटो नहीं उगाओ।"
वैदिक वैद्य: "भन्ते ने बिल्कुल सही कहा, हम अब आपके तरीके से उपचार नहीं करने वाले। आप लोग तो कैंसर जीवी हैं। कैंसर की खेती और केसर की खेती में यही फर्क है। हम जितना अपनाते और जोड़ते हैं, तुम उतना ही दुत्कार कर तोड़ देते हो। अब तुम्हारी व्यवस्था एक नहीं चलने वाली, हम तुम्हें आयसोलेट करके लॉक कर देंगे। तुम्हारे फैलाव का प्रत्येक मार्ग अवरुद्ध कर देंगे। इस तरह हमारा अंग भी बचेगा, रक्त भी नहीं बहेगा, और उपचार भी होगा!"
सनातन के कर्क प्रेमी वैद्य: "इस विधि को हम मान्यता नहीं दे सकते। तुम्हारा रिसर्च पेपर कहाँ है? कितना डाटा इकट्ठा किया? क्योर होने का परसेंटेज बताओ? नो नो नो इट इज इल्लिगल।"
महादेव का डमरु बजता है, पार्श्व से एक गूँजती ध्वनि उभरती है।
" ॐऽऽ हरि ॐऽऽऽ हे मान्यता मंडली, सृष्टि के चौधरी मत बनो, 'वैदिक राष्ट्र मंडल' के संयुक्त तत्वावधान में यह विधि सर्वाधिक विश्वसनीय है। अतः हे दैत्यगुरु शुक्राचार्यो, अब और अधिक भक्तों को तुम भरमा नहीं सकते। अपने मान्यता पत्र की पुपली बनाकर रख लो, खाली समय में तुम्हें वहीं मोक्ष की अनुभूति करायेगा।"
शंख और घंट नाद के साथ धुँवा उठता है। अब यह धुँआ कहाँ से उठता है 'संयुक्त राष्ट्रमंडल' के विद्वान इसके रिसर्च में लगे हैं।
रिजल्ट आते ही "वैदिक राष्ट्र मंडल" इसे भी घोषित करेगा।
वंदेमातरम्
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