Home

Thursday, 26 October 2017

ध्यान का पैर


एक वर्ष या दो वर्ष पूर्व हमारे किसी सन्यस्त मित्र ने एक उपदेश किया कि "लोगो को ध्यान के पैर से चलना चाहिए।"

यहाँ हम हों या कोई संन्यासी ही क्यों न हो, हम सभी के पास बुद्धि और विवेक हैं, और हम सभी को उसका अभिमान भी है।

अतः हमने अपने उसी विवेक जनित अभिमान से उनसे प्रश्न किया कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" उन्होंने इस प्रश्न का समाधान नहीं किया। हमने भी उस प्रश्न का उत्तर देना उनकी अवमानना समझ कर छोड़ दिया था।

पर कल यह सवाल पुनः मुझसे पूछने लगा," सुदर्शन, तूँ ही बता, ध्यान किस पैर से चलता है?"

जिस समय इस प्रश्न का जन्म हुआ था, तब बुद्धि का स्तर यह था कि ध्यान निश्चल और स्थिर ध्रुव के समान है। उसका पैर नहीं हो सकता। पैर तो मन का होता है, उसके पैर का नाम है विचार, जो सबल है उसे सद्विचार कहते हैं, और निर्बल को दुर्विचार कहते हैं। मन न केवल विचारों के पैर से चलता है, अपितु भावना के पंख से उड़ने की कला में भी निष्णात् है। योजनाओं और परिकल्पनाओं के पंख से वह सुख के आकाश में उड़ान भरता है, तथा किंकर्तव्यविमूढ़ता तथा कर्महीनता से निकले स्मृति के पंख से वह दुख के आकाश में भटक जाता है।

आत्मा हो जाना ध्यान है। भावना और विचार से हीन हो जाना ध्यान है, मन की शांति को ध्यान कहते हैं, आत्मा के प्रति मन के समर्पण का नाम ध्यान है। मन सदैव आत्मा के विरुद्ध अनियंत्रित ढंग से मनमानी चलता रहता है। वह कभी आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता और सब पर अपना ही प्रभुत्व समझता है।

तब हमने ध्यान के पैर को प्रश्न से घेरा था, और समझता था कि ध्यान का पैर हो नहीं सकता, किन्तु आज पुनः वह प्रश्न मेरे बुद्धि के अभिमान को चुनौती देते हुए पूछ रहा है कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" प्रश्न की चुनौती से घिरा मैं उससे भाग नहीं सकता, अब यह नहीं कह सकता कि ध्यान के पैर नहीं होते।

मुझे बताना होगा कि ध्यान किस पैर से चलता है।

अब हम ध्यान के पैर का दर्शन करते हैं, आओ हम सभी एक साथ इस दर्शन का लाभ लें। हमारी सभ्यता में पदपंकज पूजन की परंपरा तो है ही।

ध्यान के पैर का नाम "समर्पण" है। ध्यान समर्पण के पैर से चलता है। ध्यान की गति समर्पण है और समर्पण का केन्द्र ध्यान है।

आप देख लीजिए, केन्द्र स्थिर और निश्चल है किन्तु उस केन्द्र की सृष्टि, प्रकृति या परिधि निरंतर चलती जा रही है। सब पुराना नया हो रहा है, सब नया पुराना होता जा रहा है। प्रकृति का चलना भी काल की प्रेरणा है और प्रेरणा का नाम "समर्पण" है।

प्रेरणा के दो भिन्न स्वरूप हैं एक सृष्टि का संकोच और दूसरा सृष्टि का विस्तार ....

काल की प्रेरणा से उत्पन्न ध्यान में समूचा सृष्टि विस्तृत होता है और फिर उसी की प्रेरणा से सृष्टि का संकोच होने से पुनः सब कुछ उसी में लय हो जाता है।

सृष्टि का काल में विलय होना ही शांति है। मन की शांति। क्योकि जब सृष्टि ही नहीं तो उसका स्वामी मन भी नहीं......

दोनों शांताकार हो गए,
भुजगशायी,
जैसे पद्म अपनी नाभि में लौट जाये,
वह देवताओं का भी स्वामी हो गया,
विश्व का आधार,
गगन के समान,
मेघ के वर्ण (समुदाय) सदृश्य आनंद वर्षा करने वाला,
शुभांगम, (उसका न केवल पैर ही है, अपितु उस ध्यानमय काल का समस्त अंग शुभलक्षणों से युक्त हैं,
लक्ष्मीकांतम् , वह श्री एवं वैभव का स्वामी है,
कमलनयनम् , जिनके नेत्र कमल जैसे न केवल कोमल और आकर्षक हैं अपितु
योगीर्भिज्ञानगम्यम्।।

वही है अकर्ता काल, जो समर्पण के पैर से चलकर ध्यान में युक्त हो जाता है।

वंदे विष्णु भव भय हरम् सर्वलोकैक नाथम्।।

योगेश सुदर्शन आर्यवर्ती
एक वर्ष या दो वर्ष पूर्व हमारे किसी सन्यस्त मित्र ने एक उपदेश किया कि "लोगो को ध्यान के पैर से चलना चाहिए।"

यहाँ हम हों या कोई संन्यासी ही क्यों न हो, हम सभी के पास बुद्धि और विवेक हैं, और हम सभी को उसका अभिमान भी है।

अतः हमने अपने उसी विवेक जनित अभिमान से उनसे प्रश्न किया कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" उन्होंने इस प्रश्न का समाधान नहीं किया। हमने भी उस प्रश्न का उत्तर देना उनकी अवमानना समझ कर छोड़ दिया था।

पर कल यह सवाल पुनः मुझसे पूछने लगा," सुदर्शन, तूँ ही बता, ध्यान किस पैर से चलता है?"

जिस समय इस प्रश्न का जन्म हुआ था, तब बुद्धि का स्तर यह था कि ध्यान निश्चल और स्थिर ध्रुव के समान है। उसका पैर नहीं हो सकता। पैर तो मन का होता है, उसके पैर का नाम है विचार, जो सबल है उसे सद्विचार कहते हैं, और निर्बल को दुर्विचार कहते हैं। मन न केवल विचारों के पैर से चलता है, अपितु भावना के पंख से उड़ने की कला में भी निष्णात् है। योजनाओं और परिकल्पनाओं के पंख से वह सुख के आकाश में उड़ान भरता है, तथा किंकर्तव्यविमूढ़ता तथा कर्महीनता से निकले स्मृति के पंख से वह दुख के आकाश में भटक जाता है।

आत्मा हो जाना ध्यान है। भावना और विचार से हीन हो जाना ध्यान है, मन की शांति को ध्यान कहते हैं, आत्मा के प्रति मन के समर्पण का नाम ध्यान है। मन सदैव आत्मा के विरुद्ध अनियंत्रित ढंग से मनमानी चलता रहता है। वह कभी आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता और सब पर अपना ही प्रभुत्व समझता है।

तब हमने ध्यान के पैर को प्रश्न से घेरा था, और समझता था कि ध्यान का पैर हो नहीं सकता, किन्तु आज पुनः वह प्रश्न मेरे बुद्धि के अभिमान को चुनौती देते हुए पूछ रहा है कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" प्रश्न की चुनौती से घिरा मैं उससे भाग नहीं सकता, अब यह नहीं कह सकता कि ध्यान के पैर नहीं होते।

मुझे बताना होगा कि ध्यान किस पैर से चलता है।

अब हम ध्यान के पैर का दर्शन करते हैं, आओ हम सभी एक साथ इस दर्शन का लाभ लें। हमारी सभ्यता में पदपंकज पूजन की परंपरा तो है ही।

ध्यान के पैर का नाम "समर्पण" है। ध्यान समर्पण के पैर से चलता है। ध्यान की गति समर्पण है और समर्पण का केन्द्र ध्यान है।

आप देख लीजिए, केन्द्र स्थिर और निश्चल है किन्तु उस केन्द्र की सृष्टि, प्रकृति या परिधि निरंतर चलती जा रही है। सब पुराना नया हो रहा है, सब नया पुराना होता जा रहा है। प्रकृति का चलना भी काल की प्रेरणा है और प्रेरणा का नाम "समर्पण" है।

प्रेरणा के दो भिन्न स्वरूप हैं एक सृष्टि का संकोच और दूसरा सृष्टि का विस्तार ....

काल की प्रेरणा से उत्पन्न ध्यान में समूचा सृष्टि विस्तृत होता है और फिर उसी की प्रेरणा से सृष्टि का संकोच होने से पुनः सब कुछ उसी में लय हो जाता है।

सृष्टि का काल में विलय होना ही शांति है। मन की शांति। क्योकि जब सृष्टि ही नहीं तो उसका स्वामी मन भी नहीं......

दोनों शांताकार हो गए,
भुजगशायी,
जैसे पद्म अपनी नाभि में लौट जाये,
वह देवताओं का भी स्वामी हो गया,
विश्व का आधार,
गगन के समान,
मेघ के वर्ण (समुदाय) सदृश्य आनंद वर्षा करने वाला,
शुभांगम, (उसका न केवल पैर ही है, अपितु उस ध्यानमय काल का समस्त अंग शुभलक्षणों से युक्त हैं,
लक्ष्मीकांतम् , वह श्री एवं वैभव का स्वामी है,
कमलनयनम् , जिनके नेत्र कमल जैसे न केवल कोमल और आकर्षक हैं अपितु
योगीर्भिज्ञानगम्यम्।।

वही है अकर्ता काल, जो समर्पण के पैर से चलकर ध्यान में युक्त हो जाता है।


वंदे विष्णु भव भय हरम् सर्वलोकैक नाथम्।।

योगेश 

Thursday, 19 October 2017

दीपमालिका समर्प्यामि


दीपों की माला पहनाकर
अमा यामिनी का स्वागत हो,
इसने मान हरण कर लिया
सूर्य चंद्र प्रदीप्त भाव का।

जग को दिखला देती है यह
अनंत सृष्टि में अगणित तारे,
सभी सूर्य हैं, सभी सहोदर
सब से ही संबंध हमारे।

एक सूर्य के एक राम का सूत्र
सभी को बाँध रहा है
एक एक प्रत्येक किन्तु कण
शून्य सिन्धु को साध रहा है।

आओ ऐसा आराधन हो
हो या ना कोई साधन हो
माया को मोहित कर लें हम
चलो शून्य का अभिवादन हो।

दीपक के जीवन की पूँजी
तपकर ज्योतिर्मय हो जाना
आओ हम दीपक हो जाये,
दीपावली त्योहार मनाए।

योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती

Sunday, 19 March 2017

जातिवाद बनाम वर्णाश्रम



" गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं। हमारी परंपरायें भी चेतना की वैसी है, अमृत धारा हैं, गंगा की तरह ही मुक्ति दायिनी हैं।जिसमें कुछ पनालों का मैल घुलकर उसे दूषित कर बैठा है, हमें उन पनालों को अवरुद्ध करना है, गंगा का नाश नहीं। "

जिस प्रकार से दहेज को एक सामाजिक कुप्रथा के रूप में पहले तो बढ़ावा दिया गया और बाद में उसकी निंदा की जाने लगी है, वैसा ही कुछ हमारी वर्णव्यवस्था के साथ भी व्यवहार किया गया। वह चेतना जो कर्म की व्यवस्था स्वीकारती थी उसने चुपचाप धीरे-धीरे वंश और रक्त को केन्द्र में ला दिया है। वर्ण ही जातियों का आधार बना। जाति केवल कर्म तथा योग्यता के वर्गों का वर्गीकरण है। किन्तु योग्यता का अभिमान और हीनता मानवीय दुर्बलता है। सांस्कृतिक संघर्ष के दौरान मानवता के शत्रुओं ने व्यवस्था का गुण इग्नोर करके उसकी दुर्बलता रेखांकित करते हुए उसपर जोर देकर प्रहार करने लगे है।

केरल एक ऐसा राज्य है जहाँ वामपंथी विचार धारा एवं सेक्युलरिज्म बहुसंख्य हो चुके हैं । अतः वहाँ लोग अपनी जाति प्रदर्शक उपनामों का प्रचलन समाप्त करते जा रहे हैं। आज लोग इसे बड़े क्रांति के रूप में देखते हैं। उनके शिक्षा के एवरेज की सराहना करते हैं। किसी भी शिक्षित समाज की सराहना में कोई बुराई नहीं है, किन्तु कल जब वह समाज अपनी चेतना के विस्मृत अतीत में होगा तब इसकी क्या गाॅरेन्टी है कि उच्च पदस्थ लोगों को अपने पद का अभिमान नहीं होगा? उनकी संततियाँ अपने पूर्वजों की कीर्ति का गुणगान नहीं करेंगे? तब क्या इस मानसिक दुर्बलता के कारण एक नई वर्ग श्रेणी नही बन जायेगी?

हमारे समाज को बीमारी क्या है और हम उसका इलाज क्या कर रहें है, यह बहुत ही विचारणीय सवाल है। हम रोगी को निरोग करने के बदले बीमारी से हार मानकर बीमार को ही मार देने की जड़ता भरा फैसला ले रहे हैं। इससे बीमार भले मर जाये और हमें कुछ समय के लिए लगे कि बीमारी खतम हो गई किन्तु ऐसा कभी नहीं हो सकता। बीमारी पुनः अपना जड़ स्थापित करेगी। इसलिए उचित उपचार की आवश्यकता है।

यह तभी संभव है जब लोग आत्मचेता हो जायें। मन को नियंत्रित करने की कला को साध लें। जाति व्यवस्था के प्रचलन में सुधार आवश्यक है, न कि संपूर्ण जाति को ही नष्ट करना।

मैं जातियों के अति आदर और निरादर की दूषित वृत्तियों का विरोधी हूँ, किन्तु शब्द 'जाति' से मेरा कोई द्वेष या घृणा नहीं।
जाति 'व्यवस्था' की अनिवार्यता है, किन्तु उसका मान तथा अवमान जीवन की निरर्थकता है।

अपनी वैदिक चेतना पर अविश्वास करना सांस्कृतिक पतन की राह है, बुराई समाप्त की जानी चाहिये किन्तु किसी व्यवस्था का अस्तित्व ही नष्ट करना उचित नहीं है।

वर्ण व्यवस्था दुनियाँ की सर्वोत्तम सामाजिक ज्ञान एवं बुद्धि आधारित व्यवस्था है।
यह वामपंथी या मार्कसवादी आह्वान है जो परंपरा और संस्कृति में सेंध लगा कर, सभ्यता की बहुमूल्य वैचारिक पूँजी लूट कर, एक अपरिपक्व समाजवाद की पताका फहराता है। उसका प्रचार तंत्र इतना तथ्यपरक होता है कि बहुधा बुद्धिमान भी भ्रमित होकर नाश को न्योता देने लगता हैं।

जाति बैन नहीं करना चाहिए इसके दूषित व्यवहारिका को सुधार किया जाना आवश्यक है।

जब कोई प्रबुद्ध सनातनी भी इस तरह का आह्वान करता है तब मन क्षुब्द हो जाता है, और अपनी सनातन चेतन धारा की गिरती शाख को देखते हुए चित्त बहुत विचलित होने लगता है।

अंत में मैं पुनः अपनी पिछली पोस्ट की तरह कहूँगा कि,"" गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं। हमारी परंपरायें भी चेतना की वैसी है, अमृत धारा हैं, गंगा की तरह ही मुक्ति दायिनी हैं।जिसमें कुछ पनालों का मैल घुलकर उसे दूषित कर बैठा है, हमें उन पनालों को अवरुद्ध करना है, गंगा का नाश नहीं। ""

यो. स. आर्यवर्ती

Saturday, 18 March 2017

दहेज....




गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं।

हमारी परंपरायें भी चेतना की वैसी ही, अमृत धारा हैं, गंगा की तरह ही मुक्ति दायिनी हैं।जिसमें कुछ पनालों का मैल घुलकर उसे दूषित कर बैठा है, हमें उन पनालों को अवरुद्ध करना है, गंगा का नाश नहीं।

आर्यमित्रों!!, आज प्रगतिशील विचारवान लोग कुरीति और समाजिक उन्न्यन की खूब बात एवं चर्चा करते हैं और करना भी चाहिए किन्तु इतना तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं स्वयं भी, विचार तो कर रहा हूँ किन्तु खुद को प्रगतिशील समझना, मेरे बस का नहीं है, किसी बँधे बँधाये वैचारिक खेमे का होकर रह जानेवाला मेरा पूर्वाग्रही चिंतनशैली नहीं है। आत्मालोक में मुझे जो सत्य दर्शन होता है,मैं केवल उसी का पक्षधर हूँ।

आज लोग 'कन्या बचाओ, कन्या पढ़ाओ' की बात करते हैं, 'भ्रूण हत्या' की सामाजिक निंदा करते हैं। 'विधवा' विवाह को प्रचारित किया जाता है, और 'सतित्व' को दुष्प्रचारित करके उस चरित्र का प्रायः नाश किया जा चुके है।एक और मुद्दा है, वह है 'दहेज' लेने और देने की प्रथा। उक्त सभी प्रथा के केंन्द्र में केवल और केवल स्त्री का जीवन है। पर क्यों? इस पर विचार करना आवश्यक है।

हमें थोड़ा अतीत में चलना होगा। जब हमारे समाज में जीवन के क्रांति नायक बुद्ध और महावीर का जन्म हुआ था, तब से समाज में 'मोक्ष' की ओर अधिक बल दिया जाने लगा। स्त्री मोक्ष प्राप्ति की शत्रु होने के कारण वह समाज के हासिये पर जाने लगती है। ब्रह्मचर्य का एक नया स्वरूप विकसित हुआ, जिसमें स्त्री का सानिध्य तो दूर की बात उसका दर्शन तक वर्जित होने लगा। यहीं से समाज के आधे हिस्से पर अन्यायपूर्ण पक्षपात का सूत्रपात हुआ। अन्यथा आप देखेंगे तो पायेंगे कि इससे पूर्व के सभी ब्रह्मचारी नारी विरोधी नहीं थे।

ब्रह्मचर्य में स्त्री वर्जित, आचरण में हिंसा का अंत, न जाने यह कौन सा यम था, नियम था, सदाचार और सत्याचरण था!! जिसने सहज जीवन को ठुकराकर किसी सैद्धांतिक कट्टरता को अपना लिया। हठ योग से, मोक्ष तक जाने की चेष्टा की जाने लगी। इस कट्टरता की बलिवेदी पर केवल वह एक ही थी जिसे आप 'नारी' कहते हो। अहिंसा का पथ प्रदर्शित करने वाला पंथ भी कितनी बारीकी से हिंसा कर बैठा और लोग भाँप तक नहीं पाये। आज जो वैदिक सभ्यता का संतुलन डँवाडोल हुआ है, उसके मूल में उसी काल का महत्वपूर्ण योगदान है।

अहिंसक समुदाय के समक्ष जब हिंसक पंथ ने आक्रमण किया तब अहिंसक आत्मरक्षा तक नहीं कर पाये और समर्पण कर दिये। इस समर्पण में भी केवल प्रताड़ित हुई तो वह कौन थी, वही वैदिक नारायणी!! हमारी माता, वसुधा की दिव्य देवी 'नारी ही'

फिर तो 'पर्दा' होने लगा, 'दहेज' अपने नये कलेवर में प्रस्तुत हुआ। हम कन्या से अपमानित होने से बचने केलिए इतने निर्मम और निठुर हुए कि उसकी हत्या से 'भ्रूण हत्या' तक का कीर्तिमान स्थापित करने लगे। उसके अस्तित्व को 'दहेज' जैसी विकृत प्रथा से अपमानित किया। हमें उक्त सभी बातों पर बेहद तटस्थ होकर न्यायपूर्वक सोचने की जरूरत है।

इस संदर्भ में हमारे मित्र श्री Mahendra Tiwari जी का कथन है, ""क्या सचमुच #दहेज एक कुप्रथा/कुरीति/ अथवा सामजिक बुराई है??

...इसमें कोई दो राय नहीं कि दहेजप्रथा आज एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई का रूप धारण कर चुकी है
पर अगर इसके औचित्य के बारे में गहराई से विचार करेंगे तो..जो बात सामने आती है .. वो ये है...
...."जैसे आज #कोर्ट या #अदालत ने भी संपत्ति का #उत्तराधिकारी लड़कों ,लड़कियों दोनों को समान रूप से माना है..
उसी तरह #प्राचीन_काल में विवाहोपरांत कन्याओं के हिस्से की #सम्पत्ति उसे दान/दहेज के रूप में प्रदान कर दी जाती थी.. चूँकि वो अपने साथ अचल संपत्ति बाग़ बगीचे घर या खेत तो ले नहीं जा सकती थी ,तो उसे उस संपत्ति के समकक्ष स्वर्ण ,आभूषण, वस्त्र गृहोपयोगी वस्तुएं ,आदि देकर #विदा किया जाता था ये स्वेच्छिक होता था और इसे भेंट,उपहार ,सम्मान के तौर पे ही लिया ,दिया जाता था ,
और इतने पे ही संतुष्टि नहीं होती थी ., जीवन भर कन्या को केवल देने का ही संकल्प लिया जाता था, कन्या के यहाँ भोजन तक नहीं किया जाता था /अगर कभी मजबूरी वश कर भी लिया तो उसका मूल्य चुका कर ही मानते थे..

(आज जो अदालत/कानून  ने संपत्ति उत्तराधिकार सभी संतानो को बराबर माना है। हमारे हिन्दू सनातन संस्कृति में युगों शताब्दियों पहले से ही विद्यमान है , आश्चर्य और गर्व दोनों है)

पर कालांतर में जैसे जैसे मनुष्य कलयुगी ,अधर्मी ,लालची , होता गया.. इसे अपना हक मानकर चलने लगा और एक स्वस्थ परम्परा को #सामाजिक #कुरीति के रूप में परिवर्तित कर बैठा...

आज जरूरत इस बात की है कि हम इसके बारे में जागरूक हों ...और अन्य लोगों को भी इस बात का बोध कराएं.., कि बहुत सी ऐसी #प्रथाएं हैं जिन्हें हमने अपने लालच या स्वार्थवश #कुरीति या #कुप्रथा बना दिया है।"

मेरे मतानुसार, 'दहेज' यह शब्द जितना बुरा प्रचारित है, वास्तव में उतना बुरा नहीं है, यह हमारी कमी है कि, हमें केवल बुरा देखने की लत पड़ गई है; अतः हम अपने ही सांस्कृतिक परंपरा की निंदा करते हैं। और आक्रमणकारी यही चाहते हैं, उन्होंने अब हमारी सूक्ष्म चेतना पर आक्रमण करना आरंभ कर दिया है। वे इसे मिटा दें इससे पूर्व जागृत होना बहुत जरूरी है।

  वैदिक सभ्यता के न्याय व्यवस्था का प्रतिमान था यह शब्द जिसे हम कहते हैं 'दहेज'। जिसके द्वारा पिता की संपत्ति से सभी संतानों के भाग को मानवीय संवेदना और स्नेह के वशीभूत होकर दिया जाता है। इसमें कोई बुराई नहीं, भला न्याय में क्या बुराई? बुराई तो इस बात में है कि पिता पुत्री के धन को हड़प ले, भाई बहन का हिस्सा न दे, पति पत्नी की संपत्ति का लोभी हो जाये। यह सारी मानवीय दुर्बलतायें, हमारी चैतन्य गंगा में विशेष कालखंडो के पर्नालों से युक्त होकर संक्रमित हुई हैं। हमें संक्रमण का अवरोध करना होगा।

गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं।

दुर्भाग्य से, और कुप्रचारों के प्रभाव से हम अपनी वैदिक सोच, एवं सभ्यता का नाश स्वयं करने पर तुले हैं।

जय आर्यावर्त

यो. स. आर्यवर्ती