एक वर्ष या दो वर्ष पूर्व हमारे किसी सन्यस्त मित्र ने एक उपदेश किया कि "लोगो को ध्यान के पैर से चलना चाहिए।"
यहाँ हम हों या कोई संन्यासी ही क्यों न हो, हम सभी के पास बुद्धि और विवेक हैं, और हम सभी को उसका अभिमान भी है।
अतः हमने अपने उसी विवेक जनित अभिमान से उनसे प्रश्न किया कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" उन्होंने इस प्रश्न का समाधान नहीं किया। हमने भी उस प्रश्न का उत्तर देना उनकी अवमानना समझ कर छोड़ दिया था।
पर कल यह सवाल पुनः मुझसे पूछने लगा," सुदर्शन, तूँ ही बता, ध्यान किस पैर से चलता है?"
जिस समय इस प्रश्न का जन्म हुआ था, तब बुद्धि का स्तर यह था कि ध्यान निश्चल और स्थिर ध्रुव के समान है। उसका पैर नहीं हो सकता। पैर तो मन का होता है, उसके पैर का नाम है विचार, जो सबल है उसे सद्विचार कहते हैं, और निर्बल को दुर्विचार कहते हैं। मन न केवल विचारों के पैर से चलता है, अपितु भावना के पंख से उड़ने की कला में भी निष्णात् है। योजनाओं और परिकल्पनाओं के पंख से वह सुख के आकाश में उड़ान भरता है, तथा किंकर्तव्यविमूढ़ता तथा कर्महीनता से निकले स्मृति के पंख से वह दुख के आकाश में भटक जाता है।
आत्मा हो जाना ध्यान है। भावना और विचार से हीन हो जाना ध्यान है, मन की शांति को ध्यान कहते हैं, आत्मा के प्रति मन के समर्पण का नाम ध्यान है। मन सदैव आत्मा के विरुद्ध अनियंत्रित ढंग से मनमानी चलता रहता है। वह कभी आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता और सब पर अपना ही प्रभुत्व समझता है।
तब हमने ध्यान के पैर को प्रश्न से घेरा था, और समझता था कि ध्यान का पैर हो नहीं सकता, किन्तु आज पुनः वह प्रश्न मेरे बुद्धि के अभिमान को चुनौती देते हुए पूछ रहा है कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" प्रश्न की चुनौती से घिरा मैं उससे भाग नहीं सकता, अब यह नहीं कह सकता कि ध्यान के पैर नहीं होते।
मुझे बताना होगा कि ध्यान किस पैर से चलता है।
अब हम ध्यान के पैर का दर्शन करते हैं, आओ हम सभी एक साथ इस दर्शन का लाभ लें। हमारी सभ्यता में पदपंकज पूजन की परंपरा तो है ही।
ध्यान के पैर का नाम "समर्पण" है। ध्यान समर्पण के पैर से चलता है। ध्यान की गति समर्पण है और समर्पण का केन्द्र ध्यान है।
आप देख लीजिए, केन्द्र स्थिर और निश्चल है किन्तु उस केन्द्र की सृष्टि, प्रकृति या परिधि निरंतर चलती जा रही है। सब पुराना नया हो रहा है, सब नया पुराना होता जा रहा है। प्रकृति का चलना भी काल की प्रेरणा है और प्रेरणा का नाम "समर्पण" है।
प्रेरणा के दो भिन्न स्वरूप हैं एक सृष्टि का संकोच और दूसरा सृष्टि का विस्तार ....
काल की प्रेरणा से उत्पन्न ध्यान में समूचा सृष्टि विस्तृत होता है और फिर उसी की प्रेरणा से सृष्टि का संकोच होने से पुनः सब कुछ उसी में लय हो जाता है।
सृष्टि का काल में विलय होना ही शांति है। मन की शांति। क्योकि जब सृष्टि ही नहीं तो उसका स्वामी मन भी नहीं......
दोनों शांताकार हो गए,
भुजगशायी,
जैसे पद्म अपनी नाभि में लौट जाये,
वह देवताओं का भी स्वामी हो गया,
विश्व का आधार,
गगन के समान,
मेघ के वर्ण (समुदाय) सदृश्य आनंद वर्षा करने वाला,
शुभांगम, (उसका न केवल पैर ही है, अपितु उस ध्यानमय काल का समस्त अंग शुभलक्षणों से युक्त हैं,
लक्ष्मीकांतम् , वह श्री एवं वैभव का स्वामी है,
कमलनयनम् , जिनके नेत्र कमल जैसे न केवल कोमल और आकर्षक हैं अपितु
योगीर्भिज्ञानगम्यम्।।
वही है अकर्ता काल, जो समर्पण के पैर से चलकर ध्यान में युक्त हो जाता है।
वंदे विष्णु भव भय हरम् सर्वलोकैक नाथम्।।
योगेश
यहाँ हम हों या कोई संन्यासी ही क्यों न हो, हम सभी के पास बुद्धि और विवेक हैं, और हम सभी को उसका अभिमान भी है।
अतः हमने अपने उसी विवेक जनित अभिमान से उनसे प्रश्न किया कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" उन्होंने इस प्रश्न का समाधान नहीं किया। हमने भी उस प्रश्न का उत्तर देना उनकी अवमानना समझ कर छोड़ दिया था।
पर कल यह सवाल पुनः मुझसे पूछने लगा," सुदर्शन, तूँ ही बता, ध्यान किस पैर से चलता है?"
जिस समय इस प्रश्न का जन्म हुआ था, तब बुद्धि का स्तर यह था कि ध्यान निश्चल और स्थिर ध्रुव के समान है। उसका पैर नहीं हो सकता। पैर तो मन का होता है, उसके पैर का नाम है विचार, जो सबल है उसे सद्विचार कहते हैं, और निर्बल को दुर्विचार कहते हैं। मन न केवल विचारों के पैर से चलता है, अपितु भावना के पंख से उड़ने की कला में भी निष्णात् है। योजनाओं और परिकल्पनाओं के पंख से वह सुख के आकाश में उड़ान भरता है, तथा किंकर्तव्यविमूढ़ता तथा कर्महीनता से निकले स्मृति के पंख से वह दुख के आकाश में भटक जाता है।
आत्मा हो जाना ध्यान है। भावना और विचार से हीन हो जाना ध्यान है, मन की शांति को ध्यान कहते हैं, आत्मा के प्रति मन के समर्पण का नाम ध्यान है। मन सदैव आत्मा के विरुद्ध अनियंत्रित ढंग से मनमानी चलता रहता है। वह कभी आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता और सब पर अपना ही प्रभुत्व समझता है।
तब हमने ध्यान के पैर को प्रश्न से घेरा था, और समझता था कि ध्यान का पैर हो नहीं सकता, किन्तु आज पुनः वह प्रश्न मेरे बुद्धि के अभिमान को चुनौती देते हुए पूछ रहा है कि, "ध्यान किस पैर से चलता है?" प्रश्न की चुनौती से घिरा मैं उससे भाग नहीं सकता, अब यह नहीं कह सकता कि ध्यान के पैर नहीं होते।
मुझे बताना होगा कि ध्यान किस पैर से चलता है।
अब हम ध्यान के पैर का दर्शन करते हैं, आओ हम सभी एक साथ इस दर्शन का लाभ लें। हमारी सभ्यता में पदपंकज पूजन की परंपरा तो है ही।
ध्यान के पैर का नाम "समर्पण" है। ध्यान समर्पण के पैर से चलता है। ध्यान की गति समर्पण है और समर्पण का केन्द्र ध्यान है।
आप देख लीजिए, केन्द्र स्थिर और निश्चल है किन्तु उस केन्द्र की सृष्टि, प्रकृति या परिधि निरंतर चलती जा रही है। सब पुराना नया हो रहा है, सब नया पुराना होता जा रहा है। प्रकृति का चलना भी काल की प्रेरणा है और प्रेरणा का नाम "समर्पण" है।
प्रेरणा के दो भिन्न स्वरूप हैं एक सृष्टि का संकोच और दूसरा सृष्टि का विस्तार ....
काल की प्रेरणा से उत्पन्न ध्यान में समूचा सृष्टि विस्तृत होता है और फिर उसी की प्रेरणा से सृष्टि का संकोच होने से पुनः सब कुछ उसी में लय हो जाता है।
सृष्टि का काल में विलय होना ही शांति है। मन की शांति। क्योकि जब सृष्टि ही नहीं तो उसका स्वामी मन भी नहीं......
दोनों शांताकार हो गए,
भुजगशायी,
जैसे पद्म अपनी नाभि में लौट जाये,
वह देवताओं का भी स्वामी हो गया,
विश्व का आधार,
गगन के समान,
मेघ के वर्ण (समुदाय) सदृश्य आनंद वर्षा करने वाला,
शुभांगम, (उसका न केवल पैर ही है, अपितु उस ध्यानमय काल का समस्त अंग शुभलक्षणों से युक्त हैं,
लक्ष्मीकांतम् , वह श्री एवं वैभव का स्वामी है,
कमलनयनम् , जिनके नेत्र कमल जैसे न केवल कोमल और आकर्षक हैं अपितु
योगीर्भिज्ञानगम्यम्।।
वही है अकर्ता काल, जो समर्पण के पैर से चलकर ध्यान में युक्त हो जाता है।
वंदे विष्णु भव भय हरम् सर्वलोकैक नाथम्।।
योगेश
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