गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं।
हमारी परंपरायें भी चेतना की वैसी ही, अमृत धारा हैं, गंगा की तरह ही मुक्ति दायिनी हैं।जिसमें कुछ पनालों का मैल घुलकर उसे दूषित कर बैठा है, हमें उन पनालों को अवरुद्ध करना है, गंगा का नाश नहीं।
आर्यमित्रों!!, आज प्रगतिशील विचारवान लोग कुरीति और समाजिक उन्न्यन की खूब बात एवं चर्चा करते हैं और करना भी चाहिए किन्तु इतना तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं स्वयं भी, विचार तो कर रहा हूँ किन्तु खुद को प्रगतिशील समझना, मेरे बस का नहीं है, किसी बँधे बँधाये वैचारिक खेमे का होकर रह जानेवाला मेरा पूर्वाग्रही चिंतनशैली नहीं है। आत्मालोक में मुझे जो सत्य दर्शन होता है,मैं केवल उसी का पक्षधर हूँ।
आज लोग 'कन्या बचाओ, कन्या पढ़ाओ' की बात करते हैं, 'भ्रूण हत्या' की सामाजिक निंदा करते हैं। 'विधवा' विवाह को प्रचारित किया जाता है, और 'सतित्व' को दुष्प्रचारित करके उस चरित्र का प्रायः नाश किया जा चुके है।एक और मुद्दा है, वह है 'दहेज' लेने और देने की प्रथा। उक्त सभी प्रथा के केंन्द्र में केवल और केवल स्त्री का जीवन है। पर क्यों? इस पर विचार करना आवश्यक है।
हमें थोड़ा अतीत में चलना होगा। जब हमारे समाज में जीवन के क्रांति नायक बुद्ध और महावीर का जन्म हुआ था, तब से समाज में 'मोक्ष' की ओर अधिक बल दिया जाने लगा। स्त्री मोक्ष प्राप्ति की शत्रु होने के कारण वह समाज के हासिये पर जाने लगती है। ब्रह्मचर्य का एक नया स्वरूप विकसित हुआ, जिसमें स्त्री का सानिध्य तो दूर की बात उसका दर्शन तक वर्जित होने लगा। यहीं से समाज के आधे हिस्से पर अन्यायपूर्ण पक्षपात का सूत्रपात हुआ। अन्यथा आप देखेंगे तो पायेंगे कि इससे पूर्व के सभी ब्रह्मचारी नारी विरोधी नहीं थे।
ब्रह्मचर्य में स्त्री वर्जित, आचरण में हिंसा का अंत, न जाने यह कौन सा यम था, नियम था, सदाचार और सत्याचरण था!! जिसने सहज जीवन को ठुकराकर किसी सैद्धांतिक कट्टरता को अपना लिया। हठ योग से, मोक्ष तक जाने की चेष्टा की जाने लगी। इस कट्टरता की बलिवेदी पर केवल वह एक ही थी जिसे आप 'नारी' कहते हो। अहिंसा का पथ प्रदर्शित करने वाला पंथ भी कितनी बारीकी से हिंसा कर बैठा और लोग भाँप तक नहीं पाये। आज जो वैदिक सभ्यता का संतुलन डँवाडोल हुआ है, उसके मूल में उसी काल का महत्वपूर्ण योगदान है।
अहिंसक समुदाय के समक्ष जब हिंसक पंथ ने आक्रमण किया तब अहिंसक आत्मरक्षा तक नहीं कर पाये और समर्पण कर दिये। इस समर्पण में भी केवल प्रताड़ित हुई तो वह कौन थी, वही वैदिक नारायणी!! हमारी माता, वसुधा की दिव्य देवी 'नारी ही'
फिर तो 'पर्दा' होने लगा, 'दहेज' अपने नये कलेवर में प्रस्तुत हुआ। हम कन्या से अपमानित होने से बचने केलिए इतने निर्मम और निठुर हुए कि उसकी हत्या से 'भ्रूण हत्या' तक का कीर्तिमान स्थापित करने लगे। उसके अस्तित्व को 'दहेज' जैसी विकृत प्रथा से अपमानित किया। हमें उक्त सभी बातों पर बेहद तटस्थ होकर न्यायपूर्वक सोचने की जरूरत है।
इस संदर्भ में हमारे मित्र श्री Mahendra Tiwari जी का कथन है, ""क्या सचमुच #दहेज एक कुप्रथा/कुरीति/ अथवा सामजिक बुराई है??
...इसमें कोई दो राय नहीं कि दहेजप्रथा आज एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई का रूप धारण कर चुकी है
पर अगर इसके औचित्य के बारे में गहराई से विचार करेंगे तो..जो बात सामने आती है .. वो ये है...
...."जैसे आज #कोर्ट या #अदालत ने भी संपत्ति का #उत्तराधिकारी लड़कों ,लड़कियों दोनों को समान रूप से माना है..
उसी तरह #प्राचीन_काल में विवाहोपरांत कन्याओं के हिस्से की #सम्पत्ति उसे दान/दहेज के रूप में प्रदान कर दी जाती थी.. चूँकि वो अपने साथ अचल संपत्ति बाग़ बगीचे घर या खेत तो ले नहीं जा सकती थी ,तो उसे उस संपत्ति के समकक्ष स्वर्ण ,आभूषण, वस्त्र गृहोपयोगी वस्तुएं ,आदि देकर #विदा किया जाता था ये स्वेच्छिक होता था और इसे भेंट,उपहार ,सम्मान के तौर पे ही लिया ,दिया जाता था ,
और इतने पे ही संतुष्टि नहीं होती थी ., जीवन भर कन्या को केवल देने का ही संकल्प लिया जाता था, कन्या के यहाँ भोजन तक नहीं किया जाता था /अगर कभी मजबूरी वश कर भी लिया तो उसका मूल्य चुका कर ही मानते थे..
(आज जो अदालत/कानून ने संपत्ति उत्तराधिकार सभी संतानो को बराबर माना है। हमारे हिन्दू सनातन संस्कृति में युगों शताब्दियों पहले से ही विद्यमान है , आश्चर्य और गर्व दोनों है)
पर कालांतर में जैसे जैसे मनुष्य कलयुगी ,अधर्मी ,लालची , होता गया.. इसे अपना हक मानकर चलने लगा और एक स्वस्थ परम्परा को #सामाजिक #कुरीति के रूप में परिवर्तित कर बैठा...
आज जरूरत इस बात की है कि हम इसके बारे में जागरूक हों ...और अन्य लोगों को भी इस बात का बोध कराएं.., कि बहुत सी ऐसी #प्रथाएं हैं जिन्हें हमने अपने लालच या स्वार्थवश #कुरीति या #कुप्रथा बना दिया है।"
मेरे मतानुसार, 'दहेज' यह शब्द जितना बुरा प्रचारित है, वास्तव में उतना बुरा नहीं है, यह हमारी कमी है कि, हमें केवल बुरा देखने की लत पड़ गई है; अतः हम अपने ही सांस्कृतिक परंपरा की निंदा करते हैं। और आक्रमणकारी यही चाहते हैं, उन्होंने अब हमारी सूक्ष्म चेतना पर आक्रमण करना आरंभ कर दिया है। वे इसे मिटा दें इससे पूर्व जागृत होना बहुत जरूरी है।
वैदिक सभ्यता के न्याय व्यवस्था का प्रतिमान था यह शब्द जिसे हम कहते हैं 'दहेज'। जिसके द्वारा पिता की संपत्ति से सभी संतानों के भाग को मानवीय संवेदना और स्नेह के वशीभूत होकर दिया जाता है। इसमें कोई बुराई नहीं, भला न्याय में क्या बुराई? बुराई तो इस बात में है कि पिता पुत्री के धन को हड़प ले, भाई बहन का हिस्सा न दे, पति पत्नी की संपत्ति का लोभी हो जाये। यह सारी मानवीय दुर्बलतायें, हमारी चैतन्य गंगा में विशेष कालखंडो के पर्नालों से युक्त होकर संक्रमित हुई हैं। हमें संक्रमण का अवरोध करना होगा।
गंगा मैली हो जाये तो लोग उसके सफाई की बात करते हैं, न कि गंगा को ही खत्म करने की सोचते हैं।
दुर्भाग्य से, और कुप्रचारों के प्रभाव से हम अपनी वैदिक सोच, एवं सभ्यता का नाश स्वयं करने पर तुले हैं।
जय आर्यावर्त
यो. स. आर्यवर्ती
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