मंदिरों में मस्ज़िदों में नित भटकते जीव । दुख उठाते झेलते संताप अमृत पीव । घर में है वह घट सुनहला सुधा सरस निज पास देखो दन्तुरित मुस्कान में अस्तित्व का आभाष देखो॥
हैं अभी निष्पाप इनके चारू चंचल नैन । हे वेद विद ले ज्ञान इनका बूझ मीठे बैन । अति गूढ इस गुरु की गिरा में आनंद का उल्हास देखो दन्तुरित मुस्कान में अस्तित्व का आभाष देखो॥
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