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Saturday, 11 February 2023

मुंबई हलचल

स्नेह सम्मेलन 

शिक्षक भारती, ऐतिहासिक शिक्षक स्नेह सम्मेलन संपन्न: 

शिक्षक भारती, आमदार कपिल पाटिल

मुंबई: प्रभादेवी स्थित सुप्रसिद्ध रविंद्र नाट्य मंदिर में 11फरवरी,2023को सुबह 10 बजे से अपराह्न 3बजे तक शिक्षकों की परम हितैषी शिक्षक यूनियन शिक्षक भारती का ऐतिहासिक शिक्षक सम्मेलन संपन्न हुआ।इस सम्मेलन में प्रमुख अतिथि के रूप में शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर की गरिमामय उपस्थिति रही। सम्मेलन में प्रमुख अतिथि के रूप में महाराष्ट्र एवं देश भर में सबसे लोकप्रिय शिक्षक विधायक कपिल पाटील का उनके द्वारा विगत दो दशक से शिक्षकों के हित में जारी कार्यों की मुक्त कंठ से वरिष्ठ शिक्षक नेता अशोक बेलसरे सर एवं राज्य कर्मचारी मध्यवर्ती संगठन के सचिव अविनाश दौंड ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की। 

कपिल पाटिल

सम्मेलन में मंचस्थ प्रिंसिपल विलास घेरडे ने जैसे ही नारा लगाया कपिल पाटील आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं वैसे ही शिक्षकों के बीच में से अजीत वाघमारे ने भी नारा लगाया फिर संपूर्ण शिक्षकों ने जोर जोर से भी कहा कपिल पाटील आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं। वहीं विधायक जी ने वरिष्ठ शिक्षक नेता बेलसरे सर के शिक्षकों के हित में आंदोलन में 54दिन की हुई जेल की भी याद दिलाई और उनके करीबी मित्र एवं कई लाख राज्य सरकारी कर्मचारियों की यूनियन के सचिव अविनाश दौंड ने विधायक जी द्वारा सदैव महाराष्ट्र की विधानसभा में निरंतर शिक्षकों की समस्याओं को रखकर उसका समाधान निकालने हेतु प्रशंसा करते हुए कहा कि "वर्तमान परिस्थितियों में देश को ऐसे नेताओं की नितांत आवश्यकता है।" वहीं विधायक कपिल पाटील ने स्पष्ट किया कि "देश में सभी जाति धर्म के लोगों का आदर किया जाना चाहिए।" उन्होंने शिक्षा की ज्योति जलाने वाली फातिमा शेख और सावित्री बाई फुले के त्याग को भी याद किया। विधायक जी ने स्पष्ट किया कि हमें कलाकारों का आदर करना चाहिए। शाहरुख खान एक प्रतिभाशाली कलाकार है उनके माता-पिता ने देश हित में जो लड़ाई लड़ी थी उस पर हमें गर्व होना चाहिए न कि कलाकारों को जाति धर्म में बांटने वालों के बहकावे में आकर किसी भी राष्ट्र भक्त या कलाकार का विरोध करना चाहिए। इस अवसर पर शिक्षक भारती के कार्याध्यक्ष सुभाष किसन मोरे की पुस्तक "अभी नहीं तो कभी नहीं का प्रकाशन किया गया। गौरतलब हो कि यह पुस्तक पुरानी पेंशन अभी नहीं तो कभी नहीं , पेंशन बिना स्मृति शेष एवं सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों एवं उनके परिवार को समर्पित है। पुरानी पेंशन की निरंतर जारी विधायक जी के साथ ही सभी वक्ताओं की मांग से यह स्पष्ट हो गया कि महाराष्ट्र भर के शिक्षकों के हित की चिंता शिक्षक भारती को ही है।इस संदर्भ में सुभाष मोरे द्वारा लिखित एवं शिक्षक भारती कार्यवाह प्रकाश शेलके द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की जितनी प्रशंसा की जाये वह कम है।

स्नेह सम्मेलन

 सम्मेलन में पुस्तक की हजारों प्रतियां सभी उपस्थित शिक्षकों को आदर पूर्वक दी गई। 

शिक्षक भारती

सम्मेलन में कमेड़ी किंग संतोष पवार द्वारा दिग्दर्शित एवं अभिनित" संगीत शोले" इस नाटक का विशेष शो हुआ। चाय एवं भोजन की सुंदर व्यवस्था की गई थी। स्वयं विधायक कपिल पाटील, सुभाष मोरे, जालिंदर सरोदे, प्रिंसिपल विलास घेरडे एवं छात्र भारती के तेजतर्रार युवा नेता रोहित ढले ,झेंडे भोजन व्यवस्था पर नजर रखे हुए थे। सभी उपस्थित गणमान्यों ने लज़ीज़ पकवानों के बड़े ही चाव से ग्रहण किया। गौरतलब हो कि विधायक कपिल पाटील महाराष्ट्र के साथ ही देश भर के शिक्षकों के हित में सक्रिय हैं। एक दशक पूर्व उत्तर प्रदेश में शिक्षा मित्रों के हित में भी उनकी लड़ाई को शिक्षक समाज भूला नहीं है। गौरतलब हो कि विधायक कपिल पाटील ही हैं जिनकी वजह से शिक्षकों की सारी समस्या हल हो रही है।


सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन, पंथा विततो देवयानः।
 येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यंत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥

मुंबई हलचल

आदर्श मुख्याध्यापक

हिंदी हाईस्कूल के प्रिंसिपल शैलेंद्र सिंह को आदर्श मुख्याध्यापक का पुरस्कार मिला।

हिन्दी हाई स्कूल


 मुंबई: घाटकोपर के सुप्रसिद्ध हिंदी हाईस्कूल के मुख्याध्यापक शैलेंद्र सभाजीत सिंह को भाजपा शिक्षक आघाड़ी ने आदर्श मुख्याध्यापक के पुरस्कार से सम्मानित किया है।इस अवसर पर उपमुख्याध्यापक राजेंद्र सिंह, पर्यवेक्षक अभय प्रताप सिंह ने उन्हें बधाई दी है।

सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन, पंथा विततो देवयानः। 
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यंत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥

मुंबई हलचल


मिलेश सहारे को मिला आदर्श शिक्षक महापौर पुरस्कार:

 मुंबई: गुरूतेगबहादुर नगर स्थित सुप्रसिद्ध के. डी.गायकवाड मनपा हिंदी शाळा क्रमांक 2के शिक्षक मिलेश धनराज सहारे को महापौर पुरस्कार स्कूली शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर के करकमलों से प्राप्त हुआ। इस अवसर पर विधायक यामिनी जाधव, अतिरिक्त मनपा आयुक्त अश्विनी भिड़े, उपायुक्त केशव उबाले, शिक्षणाधिकारी राजेश कंकाल,राजू अमीर तडवी,प्रशासकीय अधिकारी किसन बाजीराव पावडे,शिक्षण निरीक्षक संदीप संगवे, विभाग निरीक्षक जगदीश एन.गायकवाड , कनिष्ठ पर्यवेक्षक मधुकर माली, मुख्याध्यापिका ऊषा पतनवार सहित बृहन्मुंबई महानगर पालिका शिक्षण विभाग के सभी अधिकारियों की गरिमामय उपस्थिति रही। 
मिलेश सहारे को मिला आदर्श शिक्षक महापौर पुरस्कार:


 गौरतलब हो कि सहारे को महापौर पुरस्कार प्राप्त होने पर विगत दो दशक से आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को नि: शुल्क शिक्षा दीक्षा देने एवं मनपा स्कूलों इज द बेस्ट स्कूल इन मुंबई का अभियान चलाने वाले समाजसेवी शिक्षाविद् चंद्रवीर बंशीधर यादव ने उनका अभिनंदन किया है।

सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन, पंथा विततो देवयानः। 
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यंत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥

Sunday, 5 February 2023

शैक्षणिक भय


   परीक्षा का भय 

     जनवरी में यह धरती 31 बार 360° घूर्णित हो चुकी है। अब यही क्रम फरवरी के शेष 28 दिन और चलेगा। देखते ही देखते मार्च का महीना आ जायेगा। महाराष्ट्र शैक्षणिक बोर्ड में इसी महीने एस एस सी एवं एच एस सी की परीक्षा का भय प्रारंभ होगी और करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी इस उपक्रम में सम्मिलित भी हो जायेंगे। ऊर्जा के इस परिवहन महामार्ग की तीव्रता में कुशल विद्यार्थियों को परखा जायेगा और उनकी कुशलता के अनुरूप ही उन्हें प्रमाणित भी किया जायेगा। संप्रति यह जब होगा तब होगा, अभी तो परीक्षा से पूर्व अनेक विद्यार्थी, उनके शिक्षक और अभिभावकों का श्रम, त्याग, परीश्रम और भाग्य उनके ही कामना के तूफान में घिर गया है। यह तूफान इतना तेज होता है कि पचास से साठ प्रतिशत प्रतिभागियों को इस तूफान में जूझते पत्ते की तरह भय लगता है, अब टूटा की तब टूटा। आज हम इसी भय के भूत की व्यवस्थापन पर चर्चा करेंगे।

योगेश-चिंतन
हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब,
हम होंगे कामयाब एक दिन, मन में है विश्वास,
पूरा है विश्वास हम होंगे कामयाब, एक दिन.

अनुक्रमणिका 

  • परीक्षा के भय का स्वरूप
  • भय का कारण 
  • इस भय से बचने के उपाय
  • विद्यार्थी की भूमिका
  • शिक्षक की भूमिका
  • अभिभावक की भूमिका 
  • उपसंहार 

परीक्षा के भय का स्वरूप :

   यह भय ऐसा होता है कि जीवन में अफरातफरी का माहौल खड़ा करने लगता है। विद्यार्थी जागते जागते बेसुध जीवन जीता है और सोने जाता है तो नींद नहीं आती। हर समय यही प्रतीत होता है कि अभी बहुत तैयारी बाकी है। कुछ पूरा नहीं हुआ, न जाने कौन का प्रश्न आयेगा? जो प्रश्न आने वाला है वह तैयार हुआ भी की नहीं। यही सवाल जागृत अवस्था में चिंता का रूप लेकर विद्यार्थी को बेसुध करते हैं और सोते समय ठीक से सोने नहीं देते। यह मनोदशा कमोबेश प्रत्येक विद्यार्थी की होती है। इसी से दैनिक जीवन के अन्य महत्वपूर्ण क्रियाकलाप प्रभावित होने लगते हैं। वह सामान्य नहीं रह पाता। ऐसे ही समय शिक्षक और अभिभावकों की भूमिका का बड़ा महत्व होता है।

भय का कारण :

   अभिभावक और शिक्षक का भय ही विद्यार्थी रुपी सूर्य को राहू केतु की तरह ग्रस लेता है। भय प्रत्येक जीव में निहित स्वयंभू भावना है और यह भावना सदैव जागृत अवस्था में नहीं रहता। सामान्य परिस्थितियों में इसका दूर दूर तक कोई नामोनिशान नहीं होता। हां, जब कभी इसका संक्रमण काल आरंभ हो जाता है तो यह सब ओर फैलने लगता है। यह फैलाव भय की गतिविधि है। किन्तु भय जिस कोष से उत्पन्न होता है, वहीं उसके अस्तित्व का मूल कारण है। वह है आशा, अपेक्षा या अनंत कामना। इसी चाह के तूफान से भय का सूत्रपात होता है। 

भय से बचने के उपाय :

   भय वह भाव है जिसपर मन का कोई नियंत्रण नहीं होता। भयभीत अवस्था में व्यक्ति निरुपाय एवं लाचार दिखाई देने लगता है। हृदय का स्पंदन असामान्य हो जाता है। फिर भी जीवन की रणभूमि में यदि यह शत्रु ताल ठोक कर उपस्थित हो जाये तो उसे पीठ दिखा कर भागने से कुछ भला नहीं होने वाला। भय का एक और नाम काल है। वीर योद्धा वह है जो रणभूमि में साक्षात काल भी सम्मुख हो तो पीठ न दिखाए। उससे जूझकर विजय प्राप्त करे अथवा वीरगति का मार्ग चुन ले। इस संघर्ष में खोना तो कुछ भी नहीं है। पाने के दोनों विकल्प सम्मुख होते हैं। भयभीत अवस्था में शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह गाड़ लेने से विपत्ति टल नहीं जाती अपितु हम उस विपत्ति के आसान लक्ष्य बन जाते। अतः जूझने के अतिरिक्त हमारे हाथ कुछ रह नहीं जाता। भय से बचना है तो उससे भागकर दूर जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसपर अपनी संपूर्ण शक्ति से आक्रमण कर देना देना चाहिए। जीवन का अनुभव सदैव चेताता रहा है कि 'आक्रमण ही सुरक्षा का अंतिम सर्वोत्तम उपाय है।' इसलिए हल्ला बोल देने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए। युद्ध या संघर्ष में चित्त की दशा सदैव स्थिर रहना ज़रुरी होता है। स्थिरता ही भय को मात कर सकती है। परिणाम के बारे चिंतन करते रहने से भय को बल मिलता है, इसके विपरीत केवल अपने कर्म में संलग्न रहने से परिणाम और उससे पोषित भय धीरे धीरे क्षीण होता चला जाता है। हमारा दैनिक कार्यक्रम सदैव सबसे अधिक आवश्यक होता है, उसे निश्चित समय पर अवश्य करते रहना चाहिए। अपने कार्य नियम और संयम से करते रहने से धीरता में वृद्धि होती है। भय का प्रभाव शनैः शनैः कम होता जाता है।

विद्यार्थी की भूमिका :

   इस अवस्था में विद्यार्थी की भूमिका यही होना आवश्यक है कि उसे केवल नियमित स्वाध्याय करते रहना चाहिए। स्वास्थ्य हर हाल में सबसे महत्वपूर्ण सूत्र होता है। अफरातफरी में उसे अपने स्वास्थ्य से समझौता नहीं करना चाहिए। स्वास्थ तन से ही स्वस्थ मन की रचना साकार होती है। यह बात भी स्मरणीय है कि एक स्वस्थ मन में भय अधिक देर तक ठहर नहीं पाता। स्वस्थ मन में भय का संचार कुछ पल के लिए किसी बयार की तरह भले आये किन्तु अधिक समय तक वह ठहर नहीं पाता। अल्प काल से लिए उत्पन्न मर्यादित भय भी पुलक में रूपांतरित हो जाता है। उसी से उत्साहित होकर वह विद्यार्थी प्रतिकूलता को भी अनुकूल कर लेने में सक्षम होता होता है।

शिक्षक की भूमिका :

   वर्तमान समय में में शिक्षक की भूमिका मात्र सुलभक के रूप में सीमित होकर रह गयी है। तथापि भारतीय शिक्षक अब भी पारंपरिक तौर तरीके से विद्यार्थी को पुत्रवत ही देखते और पहचानते हैं। सुलभक और विद्यार्थी के मध्य जो व्यवहारिक औपचारिकता होनी चाहिए उसका अभाव विद्यार्थी को परेशान करता है। आदर्श शिक्षक कभी भी किसी विद्यार्थी के प्रति कोई राय नहीं बनाता है। हां वह उनके श्रम एवं कौशल्य का मूल्यांकन अवश्य करता है। इसी मूल्यांकन से उसे अपने विद्यार्थी के विकास को समझने की सहूलियत हो जाती है। मूल्यांकन अपने आप में कई कारकों का सम्मिलित परिणाम होता है। अतः विद्यार्थी द्वारा प्राप्त प्राप्त मूल्यांक अपने प्राथमिक रुप में परिणाम भले लगे, किन्तु वह विद्यार्थी का परिणाम नहीं होता। वह उसकी परिस्थितियों का परिणाम होता है। वैयक्तिक तौर पर प्रत्येक विद्यार्थी के परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं। दो सगे भाई भले एक ही परिसर में रहें किन्तु उनकी मानसिक, शारीरिक सामाजिक तथा बौद्धिक परिस्थितियां भिन्न होते हैं। यही कारण है कि उनके परिणाम में समानता दिखाई नहीं देता। शिक्षक को भी विद्यार्थी की तरह ही परिणाम से निरपेक्ष होकर केवल अपने कर्म में संलग्न होना चाहिए।

   समस्या तो तब उत्पन्न होता है जब स्वयं शिक्षक परिणामों की चिंता करता है और इसी दौरान वह स्वयं में उत्पन्न भय को विद्यार्थी में संक्रमित कर देता है। शिक्षक विद्या अध्ययन करते समय जितना सहज और विद्यार्थी को निश्चिंत रखेगा उतना अधिक अवसर उसे मानसिक, शारीरिक, सामाजिक तथा बौद्धिक परिस्थितियों के परिणाम में विकास करने का मौका देगी। लेकिन देखा यह गया कि समस्या से मुक्ति दिलाने वाला शिक्षक स्वयं ही उनके लिए समस्या के पहाड़ को और बड़ा कर देता है।किसी विद्यार्थी में परिणाम को लेकर कोई भय न हो यह सुनिश्चित करना शिक्षक की भूमिका है। क्योंकि उत्तम परिणाम का दबाव विद्यार्थी से उसकी स्वाभाविकता छीन लेती है और तब वह कुछ ऐसा कर बैठता है जो बिल्कुल अस्वाभाविक और गैरजरूरी होता है।

अभिभावक की भूमिका :

   इस तरह के प्रसंग में अभिभावक की भूमिका बहुत अधिक होती है। जब परीक्षा सत्र उनके सिर पर मंडरा रहा हो तब प्रत्येक अभिभावक की जिम्मेदारी होती है वे अपने बच्चों की मनोस्थिति पर दृष्टि बनाए रखें। साथ-साथ उनके स्वास्थ्य का पूरा पूरा ध्यान दें। परिसर को पूजा स्थल की तरह पवित्र बनाकर रखें। ध्यान रहे कि विद्यार्थी के आसपास का वातावरण कलह रहित और सामान्य बनी रहे। उनके दैनिक चर्या में अभिभावक को सहायता करने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। 

   बहुधा ऐसा होता है कि विद्यार्थी अपने आवासीय परिसर से बोझिल होकर बाहर चला जाता है। उम्र के इस पड़ाव में उनकी अर्धविकसित मस्तिष्क कुछ का कुछ कराती है। तनाव से पलायन का वे आसान तरीका खोज लेते हैं। ऐसे में वे न चाहते हुए अपना बड़ा नुक़सान कर लेते हैं। अभिभावक को चाहिए कि वे अपने बच्चों पर अपनी किसी भी इच्छा को न थोपें। आपकी इच्छा का बोझ ही उन्हें इतना दीन कर देता है कि वे उन इच्छाओं का भार अनुभव करते हुए पलायन करने लगते हैं।

उपसंहार : 

   सारांश यही कि यह भय अनुभव का श्रृंगार है। चेतना जब एक बार इससे गुजर जाती है तो ऐसी परिस्थितियों से मुकाबला करने का संबल उन्हें मिल जाता है।

बहुविकल्पी प्रश्नाभ्यास कक्षा ९वीं विषय इतिहास 




सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन, पंथा विततो देवयानः। 
येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यंत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥