परीक्षा का भय
जनवरी में यह धरती 31 बार 360° घूर्णित हो चुकी है। अब यही क्रम फरवरी के शेष 28 दिन और चलेगा। देखते ही देखते मार्च का महीना आ जायेगा। महाराष्ट्र शैक्षणिक बोर्ड में इसी महीने एस एस सी एवं एच एस सी की परीक्षा का भय प्रारंभ होगी और करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी इस उपक्रम में सम्मिलित भी हो जायेंगे। ऊर्जा के इस परिवहन महामार्ग की तीव्रता में कुशल विद्यार्थियों को परखा जायेगा और उनकी कुशलता के अनुरूप ही उन्हें प्रमाणित भी किया जायेगा। संप्रति यह जब होगा तब होगा, अभी तो परीक्षा से पूर्व अनेक विद्यार्थी, उनके शिक्षक और अभिभावकों का श्रम, त्याग, परीश्रम और भाग्य उनके ही कामना के तूफान में घिर गया है। यह तूफान इतना तेज होता है कि पचास से साठ प्रतिशत प्रतिभागियों को इस तूफान में जूझते पत्ते की तरह भय लगता है, अब टूटा की तब टूटा। आज हम इसी भय के भूत की व्यवस्थापन पर चर्चा करेंगे।
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हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन, मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास हम होंगे कामयाब, एक दिन. |
अनुक्रमणिका
- परीक्षा के भय का स्वरूप
- भय का कारण
- इस भय से बचने के उपाय
- विद्यार्थी की भूमिका
- शिक्षक की भूमिका
- अभिभावक की भूमिका
- उपसंहार
परीक्षा के भय का स्वरूप :
यह भय ऐसा होता है कि जीवन में अफरातफरी का माहौल खड़ा करने लगता है। विद्यार्थी जागते जागते बेसुध जीवन जीता है और सोने जाता है तो नींद नहीं आती। हर समय यही प्रतीत होता है कि अभी बहुत तैयारी बाकी है। कुछ पूरा नहीं हुआ, न जाने कौन का प्रश्न आयेगा? जो प्रश्न आने वाला है वह तैयार हुआ भी की नहीं। यही सवाल जागृत अवस्था में चिंता का रूप लेकर विद्यार्थी को बेसुध करते हैं और सोते समय ठीक से सोने नहीं देते। यह मनोदशा कमोबेश प्रत्येक विद्यार्थी की होती है। इसी से दैनिक जीवन के अन्य महत्वपूर्ण क्रियाकलाप प्रभावित होने लगते हैं। वह सामान्य नहीं रह पाता। ऐसे ही समय शिक्षक और अभिभावकों की भूमिका का बड़ा महत्व होता है।
भय का कारण :
अभिभावक और शिक्षक का भय ही विद्यार्थी रुपी सूर्य को राहू केतु की तरह ग्रस लेता है। भय प्रत्येक जीव में निहित स्वयंभू भावना है और यह भावना सदैव जागृत अवस्था में नहीं रहता। सामान्य परिस्थितियों में इसका दूर दूर तक कोई नामोनिशान नहीं होता। हां, जब कभी इसका संक्रमण काल आरंभ हो जाता है तो यह सब ओर फैलने लगता है। यह फैलाव भय की गतिविधि है। किन्तु भय जिस कोष से उत्पन्न होता है, वहीं उसके अस्तित्व का मूल कारण है। वह है आशा, अपेक्षा या अनंत कामना। इसी चाह के तूफान से भय का सूत्रपात होता है।
भय से बचने के उपाय :
भय वह भाव है जिसपर मन का कोई नियंत्रण नहीं होता। भयभीत अवस्था में व्यक्ति निरुपाय एवं लाचार दिखाई देने लगता है। हृदय का स्पंदन असामान्य हो जाता है। फिर भी जीवन की रणभूमि में यदि यह शत्रु ताल ठोक कर उपस्थित हो जाये तो उसे पीठ दिखा कर भागने से कुछ भला नहीं होने वाला। भय का एक और नाम काल है। वीर योद्धा वह है जो रणभूमि में साक्षात काल भी सम्मुख हो तो पीठ न दिखाए। उससे जूझकर विजय प्राप्त करे अथवा वीरगति का मार्ग चुन ले। इस संघर्ष में खोना तो कुछ भी नहीं है। पाने के दोनों विकल्प सम्मुख होते हैं। भयभीत अवस्था में शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह गाड़ लेने से विपत्ति टल नहीं जाती अपितु हम उस विपत्ति के आसान लक्ष्य बन जाते। अतः जूझने के अतिरिक्त हमारे हाथ कुछ रह नहीं जाता। भय से बचना है तो उससे भागकर दूर जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसपर अपनी संपूर्ण शक्ति से आक्रमण कर देना देना चाहिए। जीवन का अनुभव सदैव चेताता रहा है कि 'आक्रमण ही सुरक्षा का अंतिम सर्वोत्तम उपाय है।' इसलिए हल्ला बोल देने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए। युद्ध या संघर्ष में चित्त की दशा सदैव स्थिर रहना ज़रुरी होता है। स्थिरता ही भय को मात कर सकती है। परिणाम के बारे चिंतन करते रहने से भय को बल मिलता है, इसके विपरीत केवल अपने कर्म में संलग्न रहने से परिणाम और उससे पोषित भय धीरे धीरे क्षीण होता चला जाता है। हमारा दैनिक कार्यक्रम सदैव सबसे अधिक आवश्यक होता है, उसे निश्चित समय पर अवश्य करते रहना चाहिए। अपने कार्य नियम और संयम से करते रहने से धीरता में वृद्धि होती है। भय का प्रभाव शनैः शनैः कम होता जाता है।
विद्यार्थी की भूमिका :
इस अवस्था में विद्यार्थी की भूमिका यही होना आवश्यक है कि उसे केवल नियमित स्वाध्याय करते रहना चाहिए। स्वास्थ्य हर हाल में सबसे महत्वपूर्ण सूत्र होता है। अफरातफरी में उसे अपने स्वास्थ्य से समझौता नहीं करना चाहिए। स्वास्थ तन से ही स्वस्थ मन की रचना साकार होती है। यह बात भी स्मरणीय है कि एक स्वस्थ मन में भय अधिक देर तक ठहर नहीं पाता। स्वस्थ मन में भय का संचार कुछ पल के लिए किसी बयार की तरह भले आये किन्तु अधिक समय तक वह ठहर नहीं पाता। अल्प काल से लिए उत्पन्न मर्यादित भय भी पुलक में रूपांतरित हो जाता है। उसी से उत्साहित होकर वह विद्यार्थी प्रतिकूलता को भी अनुकूल कर लेने में सक्षम होता होता है।
शिक्षक की भूमिका :
वर्तमान समय में में शिक्षक की भूमिका मात्र सुलभक के रूप में सीमित होकर रह गयी है। तथापि भारतीय शिक्षक अब भी पारंपरिक तौर तरीके से विद्यार्थी को पुत्रवत ही देखते और पहचानते हैं। सुलभक और विद्यार्थी के मध्य जो व्यवहारिक औपचारिकता होनी चाहिए उसका अभाव विद्यार्थी को परेशान करता है। आदर्श शिक्षक कभी भी किसी विद्यार्थी के प्रति कोई राय नहीं बनाता है। हां वह उनके श्रम एवं कौशल्य का मूल्यांकन अवश्य करता है। इसी मूल्यांकन से उसे अपने विद्यार्थी के विकास को समझने की सहूलियत हो जाती है। मूल्यांकन अपने आप में कई कारकों का सम्मिलित परिणाम होता है। अतः विद्यार्थी द्वारा प्राप्त प्राप्त मूल्यांक अपने प्राथमिक रुप में परिणाम भले लगे, किन्तु वह विद्यार्थी का परिणाम नहीं होता। वह उसकी परिस्थितियों का परिणाम होता है। वैयक्तिक तौर पर प्रत्येक विद्यार्थी के परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं। दो सगे भाई भले एक ही परिसर में रहें किन्तु उनकी मानसिक, शारीरिक सामाजिक तथा बौद्धिक परिस्थितियां भिन्न होते हैं। यही कारण है कि उनके परिणाम में समानता दिखाई नहीं देता। शिक्षक को भी विद्यार्थी की तरह ही परिणाम से निरपेक्ष होकर केवल अपने कर्म में संलग्न होना चाहिए।
समस्या तो तब उत्पन्न होता है जब स्वयं शिक्षक परिणामों की चिंता करता है और इसी दौरान वह स्वयं में उत्पन्न भय को विद्यार्थी में संक्रमित कर देता है। शिक्षक विद्या अध्ययन करते समय जितना सहज और विद्यार्थी को निश्चिंत रखेगा उतना अधिक अवसर उसे मानसिक, शारीरिक, सामाजिक तथा बौद्धिक परिस्थितियों के परिणाम में विकास करने का मौका देगी। लेकिन देखा यह गया कि समस्या से मुक्ति दिलाने वाला शिक्षक स्वयं ही उनके लिए समस्या के पहाड़ को और बड़ा कर देता है।किसी विद्यार्थी में परिणाम को लेकर कोई भय न हो यह सुनिश्चित करना शिक्षक की भूमिका है। क्योंकि उत्तम परिणाम का दबाव विद्यार्थी से उसकी स्वाभाविकता छीन लेती है और तब वह कुछ ऐसा कर बैठता है जो बिल्कुल अस्वाभाविक और गैरजरूरी होता है।
अभिभावक की भूमिका :
इस तरह के प्रसंग में अभिभावक की भूमिका बहुत अधिक होती है। जब परीक्षा सत्र उनके सिर पर मंडरा रहा हो तब प्रत्येक अभिभावक की जिम्मेदारी होती है वे अपने बच्चों की मनोस्थिति पर दृष्टि बनाए रखें। साथ-साथ उनके स्वास्थ्य का पूरा पूरा ध्यान दें। परिसर को पूजा स्थल की तरह पवित्र बनाकर रखें। ध्यान रहे कि विद्यार्थी के आसपास का वातावरण कलह रहित और सामान्य बनी रहे। उनके दैनिक चर्या में अभिभावक को सहायता करने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए।
बहुधा ऐसा होता है कि विद्यार्थी अपने आवासीय परिसर से बोझिल होकर बाहर चला जाता है। उम्र के इस पड़ाव में उनकी अर्धविकसित मस्तिष्क कुछ का कुछ कराती है। तनाव से पलायन का वे आसान तरीका खोज लेते हैं। ऐसे में वे न चाहते हुए अपना बड़ा नुक़सान कर लेते हैं। अभिभावक को चाहिए कि वे अपने बच्चों पर अपनी किसी भी इच्छा को न थोपें। आपकी इच्छा का बोझ ही उन्हें इतना दीन कर देता है कि वे उन इच्छाओं का भार अनुभव करते हुए पलायन करने लगते हैं।
उपसंहार :
सारांश यही कि यह भय अनुभव का श्रृंगार है। चेतना जब एक बार इससे गुजर जाती है तो ऐसी परिस्थितियों से मुकाबला करने का संबल उन्हें मिल जाता है।
बहुविकल्पी प्रश्नाभ्यास कक्षा ९वीं विषय इतिहास

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