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Sunday, 26 February 2023

वचन की महिमा

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एक पहाड़ी जंगल के नीचे विजयगढ़ नाम का एक गांव था। गांव के सारे जानवर हरी घास खाने के लिए प्रभात होते ही उसी पहाड़ी के ऊपर बसे जंगल में चले जाते और शाम होते-होते घर वापस आ जाते थे।

हर दिन की तरह लक्ष्मी नाम की एक गाय अन्य गायों के साथ उसी पहाड़ी के जंगल में घास खाने के लिए गई। वह हरी घास खाने में इतनी अधिक तन्न्मय थी कि वह कब एक सिंह की कंदरा के पास पहुंच गई, उसे पता भी न चला।

शेर अपनी कंदरा में सो रहा था और वह पिछले दो तीन दिनों से भूखा भी था। जैसे ही लक्ष्मी उस भूखे सिंह के निकट पहुँची, गाय की सुंदर गंध से सिंह की निद्रा टूट गई।

वह धीरे-धीरे खोह से बाहर आया और गाय देखकर प्रसन्न हो गया। उसने मन ही मन सोचा कि आज उसकी कई दिनों की भूख मिट जाएगी। वह आज इस हृष्टपुष्ट गाय की स्वादिष्ट मांस खाएगा ऐसा  सोचते हुए उसने एक भयानक गर्जना की।

लक्ष्मी उसकी दहाड़ सुनकर सिहर गई। जब वह अपना सिर उठाकर अपने आस-पास देखी, तो वहां दूर-दूर तक उसका अपना कोई भी नहीं दिखा।

अब वह हिम्मत करके पीछे मुड़ी, तो उसे सामने अपना विकराल तीक्ष्ण दाँत दिखाकर गुर्राता हुआ सिंह खड़ा दिखाई दिया। उसने लक्ष्मी से कहा, “मुझे कई दिनों से कोई शिकार नहीं मिल रहा था, मैं भूखा हूँ। संभवतः इसलिए भगवान ने मेरा पेट भरने के लिए तुझे मेरे यहां पर भेजा है। आज मैं तुझे खाकर अपनी क्षुधा तृप्त कर लूंगा।”

उस भूखे सिंह की बात सुनकर लक्ष्मी कंपित स्वर में बोली “ है वनराज, मुझे जाने दो, मुझे मत खाओ। मेरा एक छोटा बच्चा है, जो अभी केवल मेरा ही दूध पीता है, उसे घास खाना अब तक नहीं आया है।”

लक्ष्मी की बात सुनकर वह अट्टहास करते हुए बोला, “तो क्या मैं अपने हाथ में आया अपना आहार ऐसे ही जाने दूं? मैं तो आज तुझे खाकर अपनी कई दिनों की भूख मिटाऊंगा।”

शेर के ऐसा कहने पर लक्ष्मी उसके सामने रोने लगी और विनती करते हुए बोली, “ है सर्वशक्तिमान, है कृपा निधान मुझे अपने प्राणों की चिंता नहीं है। मैं अपने बछड़े के लिए चिंतित हूँ । यदि आज मैं अपने झुंड़ के साथ घर नहीं गयी तो संभवतः मेरे शोक में मेरा बछड़ा भी अपना जान दे देगा। एक भूखे प्राणी का जितना अधिकार उसके भोजन पर होता है उतना ही एक नवजात शिशु का अधिकार अपने जीवन के लिए उसकी मां पर होता है।अतः मुझे जाने दो। मैं वचन देती हूँ आज अपने बछड़े को आखिरी बार दूध पिला कर उसे खूब दुलार कर, उसकी अनुमति लेकर कल सुबह होते ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी। फिर तुम मुझे खा लेना और अपनी भूख मिटा लेना।” 


"और यदि तुम्हारे बछड़े ने अनुमति न दी तो?" सिंह ने गरज कर पूछा।

"अगर मगर की तो बात ही नहीं है वनराज, जैसे मैं अपनें दायित्व से बँधी होने के नाते आपसे एक रात की अनुमति मांग रही हूं ऐसे ही मैं कल प्रस्तुत हो जाने को वचन बद्ध हूँ। अतः हे दयालु आप संशय न करें।" लक्ष्मी ने आर्द्र स्वर में गुहार लगाई।

अंततोगत्वा सिंह लक्ष्मी की बात मान लिया और धमकी देते हुए बोला, “अगर कल तू नहीं आई, तो मैं तेरे गांव आऊंगा, फिर तुझे तेरे बेटे सहित खा जाऊंगा।”

लक्ष्मी सिंह को धन्यवाद देती हुई वहां से उदास अपनें घर की ओर चली। रास्ते में उसकी प्रिय सखियों ने उदासी का कारण जानना चाहा, पर उसने किसी को कुछ न बताया। वहां से वह सीधे अपने बछड़े के पास गयी। उसे खूब दूध पिलायी, और देर रात तक प्यार करती रही। फिर बछड़े को जंगल में  हुई सारी घटना बताते हुए बोली कि, मेरे बेटे, अब से तुम्हें अपना ध्यान स्वयं ही रखना होगा। मैं कल सुबह होते ही अपना वचन पूरा करने के लिए शेर के पास चली जाऊंगी।"

अपनी मां की बातें सुनकर बछड़ा रोने लगा,"बोला, मां मैं तुम्हारे बिना एक क्षण भी नहीं जी सकता। कल तुम जहां जाओ मुझे भी साथ ले चलना। हम जीयेंगे या साथ या मरेंगे।" 

लक्ष्मी ने कहा,"नहीं बेटा ऐसा अशुभ नहीं कहते। चलो अब चुपचाप सो जाओ। मेरे वचन के पैर में अपनें मोह की बेड़ी न डालो।"

लक्ष्मी को नहीं पता था कि उसकी यह बातें उसकी प्रिय सहेलियां सुन रहीं थीं। एक तो बहुत बूढ़ी भी हो चुकी थी, उसने मन में सोचा, कल मैं स्वयं वनराज के सामने इससे पहले चली जाऊंगी और विनती करुंगी कि लक्ष्मी के बदलें वह मुझे ही का ले।

किन्तु जो होना होता है वही होकर रहता है। दूसरे दिन सुबह होते ही लक्ष्मी जंगल की तरफ निकल गयी और उस कंदरा के समीप पहुंचकर सिंह से बोली, “अपने वचन के अनुसार मैं तुम्हारे पास आ गई हूँ। अब तुम मुझे खा सकते हो।”

सिंह अट्टहास करता हुआ बोला,"मैं किस किस को खाऊँ समझ नहीं पा रहा हूं। देखो, तुम्हारी हितेषी सभी सहेलियां हठ कर रहीं हैं कि मैं उन्हें खा लूं, तेरा बेटा भी यहां आया हुआ है वह कहता है कि मैं किसी को नहीं केवल उसे ही खाऊँ। उसका मांस बहुत स्वादिष्ट और नर्म है। तुम कहती हो कि मैं अपना वचन निभाने आ गयी। तुम लोगों का आपसी प्रेम देखकर मेरा भूख मिट गया है। मेरा मन आनंद से भरा जा रहा है। सच मुच गाय धरती पर ममता की महान मूरत है।" यह कहते कहते वह सिंह एक दिव्य रुप में परिवर्तित होने लगा। अब वहां एक मेघ वर्ण का चतुर्भुजी अलौकिक देह प्रत्यक्ष हुआ जिसने पीले परिधान धारण किए थे, जिनके एक हाथ में सुदर्शन चक्र था, एक में कौमुदी गदा, एक में शंख तथा एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा था। उन्होंने गंभीर गदगद स्वर में कहा, “मैं तो बस तुम्हारी परीक्षा ले रहा था लक्ष्मी। तुम अपने वचन की पक्की हो। मैं इससे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम अब अपने बछड़े के साथ घर  वापस चली जाओ। मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि जब तक यह जगह है तब तक तुम इस समूची सृष्टि की माता कहलाती रहोगी”


उसी दिन के बाद से लोग सभी गायों को गौ माता कहने लगे।


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