एक मजदूर की आत्मकथा
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लेखक: सचिन पटेल कक्षा -१०वींनायगांव सेकेंडरी स्कूल, दादर |
जी हा! मैं मजदूरी करता हूं, मैं सारा दिन कमाकर बड़ी ही कठिनाई से अपना घर चलाता हूँ। जीवन में हर कोई मजदूर बनने की नहीं सोचता या कहें तो हर कोई बड़े- बड़े सपने देखता है कि मैं ये बनूँगा, वो बनूँगा। आराम से खाऊँगा - पीयूँगा। मैंने भी कुछ ऐसा ही सपना देखा किन्तु आर्थिक परिस्थिति, समाज का, परिवार वालों का साथ न देना, आदि कारणों से, पढ़ नहीं पाया, जो बनना चाहता था वो नहीं बन पाया, मेरा जो सपना था, वह साकार नहीं हो पाया। इसलिए मैं आज एक मजदूर हूँ।
अपनी मुश्किल परिस्थितियों के कारण मैं अंदर से बिलकुल टूट चुका था। इसलिए मुझे अपना घर चलाने के लिए मजदूरी करना पड़ा। कोई भी नहीं चाहता कि वो मजदूर बनें, परंतु हालात कुछ और ही बना देता है। वो कहते है न कि कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता, इसलिए मैंने अपने परिवार को खाना खिलाने के लिए मजदूरी की। मैं हर रोज अपने कार्य स्थल पर जाता हूँ। अपना कार्य अर्थात मजदूरी करता हूँ। पैसे कमाता हूँ और अपने घर चले आता हूँ। मेरी यही दिनचर्या है। परंतु मैं कहता हूँ कि किसी के भी जीवन में पढ़ने के लिए पैसे की समस्या ही नहीं होनी चाहिए। मैंने सुना है कि पढ़ने की चाह जिसमें होती है वो किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में, हर हालत में पढ़कर ही रहता है।
शायद मेरे अंदर वैसा पढ़ने की चाह ही नहीं थी। इसलिए मैं पढ़ नहीं पाया। मैं हमेशा कहता हूं कि मैं पैसे की कमी के कारण पढ़ नहीं, पाया परंतु मैं शायद गलत था। मेरे अंदर वो पढ़ने की चाह ही नहीं थी। जब मैं ढुलाई करता हूँ तब जो वजन सहना पड़ता़ है उसका जो दर्द सहना पड़़ता है शायद वो मेरे बचपन के भूल, शिक्षा से पलायन का अपराध हैं । जिस दिन मेरी पढ़ाई छूटी उस दिन से मैंने जितने मजे किए , ये उसी पापों की सजा है। मुझे आज जाकर समझ आया की हमारे जीवन में पढ़ाई कितना बहुमूल्य है जो हर व्यक्ति को करनी ही चाहिए। पढाई एक ऐसा शस्त्र है जो जीवन के हर लड़ाई में काम आता है।
मैं सोचता हूँ कि मैं जो आज कर रहा हूँ वो मेरे बच्चे न करें, वो खूब पढ़ें लिखे और बड़े आदमी बने। मैं जो हासिल नही कर पाया वो मेरे बच्चे हासिल करें। आज कोई- कोई आदमी सोचता है कि मैं पढ़- लिख नहीं पाया इसलिए रोज इतने दर्द सहता हूं और इसी निराशा में वे आत्महत्या कर लेते हैं। वे अपनी जिंदगी से हार जाते है परंतु उन्हें सोचना चाहिए की जिंदगी एक अमूल्य चीज है जो मांगने पर भी नहीं मिलती। मुझे आज समझ में आया है कि हार मानकर कुछ नहीं होने वाला। जो लोग ये सब सोचकर आत्महत्या करने वाले है उनको मैं ये बताना चाहूँगा कि जिंदगी - बार-बार नहीं मिलती हमें उसे संभालकर जीना है।
हमने तो अपनी आधी जिंदगी बेकार कर ली और फिर जब हमारे बच्चे वह हासिल करेंगे जो हमने सोची भी नहीं है तो हमें कितनी खुशी होगी। हम मजदूर है तो क्या हुआ, किसी से हम भीख माँगकर तो नहीं खा रहे हैं? अपने दम पर खुद कमाकर खा रहे हैं तो किसका डर ? मजदूर का सपना होता है कि चलों मैं पढ़़ नही पाया, मेरे अंदर पढ़़ने की चाह नही थी, तो क्या हुआ, हम अपने बच्चों के आस-पास पढ़ाई का ऐसा वातावरण रचेंगे कि वो हमारी परिस्थिति को समझते हुए मेरा नाम रोशन करेगा, पढ़ेगा और तब उस वक्त मुझे कितनी खुशी होगी।
हर मजदूर का यही मानना जिस तरह कुछ सामान ढोकर उसे अच्छा रंग कुछ रूप देकर, उसे बेहतरीन बनाते है, उसी तरह हमारी जिंदगी भी है, हम जितना अपने सामने आने वाली कठिनाइयों का सामना करेंगे, उतनी ही अच्छी हमारी आगे की जिंदगी भी होगी। मैं चाहता हूँ कि हर मजदूर ऐसा ही सोचे अपनी जिंदगी को सकारात्मक रूप में देखे, न कि नकारात्मक स्वरूप में, ताकि उसकी जिंदगी अच्छी हो। जिस तरह हम लोहा तपाकर, उसको ठोक पीटकर, हम धारदार तलवार बनाते है, उसी तरह तप कर, मेहनत से, एक अच्छी जिन्दगी बनाए ।
धन्यवाद !

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