Home

Tuesday, 31 July 2018

बदमाशी





वह हर मौसम में कड़ी मेहनत से जीविकोपार्जन करता था। गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले फेरे देकर सामान बेच आता और मुनाफा के रूपयों से घर के सभी सदस्यों के लिए खुशी खरीदने की जुगत भिडाता था।

घर में कुल तीन सदस्य थे। वह, उसकी पाँच वर्ष की बिटिया और खूबसूरत उसकी बेग़म।

वह दोनों ही से बेपनाह मोहब्बत करता था। आज जब उसका काम समय से बहुत पहले ही निपट गया तो सबके लिए कुछ न कुछ नायाब तोहफा खरीदा और अपने छोटे से फिरदौस की ओर चल पडा। रास्ते भर वह मोहब्बत का ख्वाब सजाता लौट रहा था। तोहफा देखकर बेगम की आँखें गहरी झील सी चमक उठेगी और मैं उसकी हथेलियों को चूमकर कहूँगा," तुम्हारी खुशी से बढ़कर मेरे लिए और कुछ नहीं है। तुम जान चाहो न बेगम तो बंदा वह भी हँस हँस कर दे दे।" तब वह झट से मेरे लबों पर अपनी नाजुक हथेली रख कर झिझकती हुई कहेगी,"तौबा तौबा, मेरी जान यह आप क्या कह रहे हैं? "
आय-हाय उसकी यह अदा कितनी दिलकश होगी! कोई जाहिल ही होगा जो अपनी महबूबा की ऐसी मोहब्बत का सिला उसे अपनी बाँहों में भरकर न दे।

सोचते-सोचते उसके रोयें रोयें में झुरझुरी दौड़ गई। उसका रफ्तार तेज़ हो गया। रास्ता लम्बा लगने लगा।
______________________________________

इधर एक कमरे में एक औरत और एक मर्द खुले दिल से हँसी ठिठोली कर रहे थे। कोई और वहाँ न था।

औरत बोली," अच्छा, अब उनके आने का वक्त हो गया है। तुम जाओ। और हाँ जाने से पहले अपनी उखड़ी उखड़ी साँसों की रफ्तार भी कम कर लो। पानी पियोगे या कुछ और? "
मर्द न जाने किस नशें मे धुत्त था बोला,"कुछ और ..."
"क्या, चाय या काॅफी?"
"अरे, जान आशिक को तलब भी जुबां से बयाॅ करना होगा क्या?"
"अरे! अब जाओ भी, इस समय कोई जुबां नहीं समझ सकती जल्दी करो और साफ साफ कहो।"
"एक बोसा दे दो बस।" दाहिनी आँख दबती चली गयी और होठों पर एक बदमाश मुस्कान फैल गई।
वह बोल उठी," सच ही किसी ने कहा है मर्द जात ही कुत्ता है।"
"क्या..."
"तौबा-तोबा अल्लाह माँफ करे।"
और अंत में आशिक की फरमाइश पूरी करके उसे बिदा किया।
____________________________

आज की रात आसमान के चाँद में आग सुलग रहा था। अरमानों जनाने पर तोहफों के सामान टूट कर बिखरे थे। दुनियाँ में पाँव रखने की जमीन ही न जाने कहाँ गुम हो गई । वह चमन के बेंच पर अपने दोनों हथेलियों से अपना सिर ज़ोर से दबाये बैठा था। मानो वह फट पड़ना चाहता हो।
दिल भारी था, कलेजे में हूक सी उठ रही थी। वह सोच रहा था,' ओह! री जिन्दगी, अब तक मैं अपनी पीठ पर रिश्तों के नाम का भारीभरकम फरेब उठाये इतराता था। सब झूठ, मोहब्बत नहीं है कहीं, सिर्फ़ फरेब है, जन्नता क्या है? कहाँ है? अब मैं जी नहीं पाऊँगा जान! न जाने तेरी क्या मजबूरी है। मैं क्या करूँ?  जिससे मोहब्बत किया उससे लडू? बिरादरी में रुसवा करुँ या आजाद कर दूँ?  शायद मैं यह दोनों ही न कर पाऊँगा।"
बड़ी देर बाद वह कुछ मन में ठान कर घर लौटा। आज उसका व्यवहार बहुत गहरा था। वह रोज ज्यादा बेग़म से इजहारे मुहब्बत किया, आज जुबान कम और आँखें ज्यादा कुछ कह रही थी।
रात सोते समय बेगम ने पूछा," आज आने में बहुत देर कर दी?"
उसने मन में खालीपन लिये दुहराया, 'हाँ जान, बहुत देर' पर सामने कह दिया आज धंधा के काम से बहुत दूर निकल गया था न इसलिए ।"
"तब तो बहुत थक गये होगे?"
"हाँ, मेरा मतलब नहीं, यह तो रोज का काम है।"
कुछ देर की खामोशी के बाद वह बोला," मैं सोच रहा हूँ क्यों न कल हम सभी सैर करने कहीं दूर दरिया के किनारे चलें।"
"और काम?"
"एक दिन न सही ।"
"दरिया के किनारे ही क्यों?  कहीं और क्यों नहीं? "
"नहीं, मुझे देखना है, दरिया में लहराने वाला पानी गहरा है या आपके दिल में मेरे लिए मोहब्बत? "
"क्या दरिया में डूबने का इरादा है?"
वह हँसा, उसकी आँखों की कोर से आँसू बह निकले।
बोला,"नहीं, आपकी मोहब्बत में डूबकर देखना है कि मुझे क्या हासिल होता है।"
"मोहब्बत में तो आप यहाँ भी डूब सकते हैं वैसे मुझे कल कुछ और काम है। माँफ करना जान, मैं साथ नहीं आ सकती हाँ आप मुनिया के साथ बेशक जाइये। उसे भी दरिया देखना है।"
"ठीक है बेग़म अच्छा शब्बा खैर..."

और एक नई सुबह के लिए तीनों एक छत के नीचे सो गये। न जाने रात के सन्नाटे में क्या कुछ राज़ छिपा था।
कैसा होगा कल ???
कौन जाने?

सुबह-सुबह ही बाप और बिटिया सैर को तैयार हो गये। मुन्निया बहुत खुश थी। आज अब्बा जान से वह सब फरमाइशें करूँगी जो पिछले कई दिनों से सोच रखा है। एक बड़ा सा नर्म मुलायम रोयेदार पांडा लूँगी। आइसक्रीम और चाॅकलेट खाऊँगी। एक बार्बीडाॅल भी.... जैसे सभी कुछ तय था । आज मुरादों का दिन है। सब पूरा होगा।
वह सज धज कर बिल्कुल नन्हीं परी लग रही थी।

मियाँ ने अपनी बेग़म को गहरी निगाह से देखते हुए अलविदा कहा। बेग़म के दिल में वह निग़ाह धँसी तो जरूर पर उसने उसकी खलिश को खारिज़ करते हुए मुस्कुराकर कहा," खुदा हाफिज़ जान।"
हाय! यह कातिलाना मुस्कान, इसी ने तो सारे जमाने के होशोहवास बाँधकर रख दिये हैं। वह आपनी बेग़म की  मुस्कुराती हुई दिलकश खूबसूरती को अपने होश के किताब में सहेज लिया और सैर को चला।

आज जिंदगी में वह पहली बार खुद को थोड़ा आज़ाद महसूस कर रहा था। आज मन में न कोई पहली तमन्ना थी न आखरी। आज वह अपनी फितरत से कोई औलिया था, जैसे फकीर... आज उसने महसूस किया कि रात के अंधेरे को दूर करने के लिए एक अदद लाइट भी जलाता हूँ तो उसके लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता। पर अब तो मानो वह आसमान में आफताब को ही अपने चराग सा रोशन कर दिया। आज वह हर शय का मालिक था। कल तक एक अदनी चीज पाने के लिए कितना जी तोड़ कोशिश करनी पड़ता था, चीजों की गुलामी ने जिन्दगी को मजदूर बना था। आज जब उस गुलामी को ठोकर मारी तो यकायक मालिक हो बैठा। सबका मालिक। वह सोचता हुआ मस्त हुआ जा रहा था।

मुनिया की हर फरमाइश आज वह पूरी करता दरिया की ओर बढ़ा जा रहा था। आज से पहले उसे जो जमीन बेजान मिट्टी और पत्थर का ढेर नज़र आती थी पहली बार लगा जैसे वह जिन्दा है। साँस लेती हुई। यह ताज़ी हवा उसी की खुशबूदार साँसें हैं । नदियाँ उसकी रगें और दरिया उसका दिल। आज वह पहली बार इस मिट्टी को प्यार करना चाहा। जिन्दगी भर जिसे वह बेजान बुत और कुफ्र समझा किया न जाने क्यों वही उसे माँ सी नज़र आने लगी। जिसके दूध का कर्ज वह हर्गिज अता नहीं कर सकता। आज वह अपनी इस अम्मी के दिल के लग जाना चाहता था। कहते हैं माँ के आँचल में जो सुकून है वही खुदा का अहसास है। किसी जन्नत से बढ़कर।

मुनिया बहुत खुश थी। आज वह अपने अब्बूजान की कई दफा गाल चूम ली। उसकी हर फरमाइश आज पूरी थी। जो चाहा वह खाया। जो माँगा वह पाया। अब वह अपने हमजोलियों में शान से खेल सकेगी। किसी के खिलौने को लालची निग़ाह से टुकुर टुकुर देखने की गरज नहीं, रिरियाकर माँगने की जरूरत नहीं। आज वह बतायेगी जमाने को कि देखो मेरे अब्बू मुझे कितना प्यार करते हैं, सोचते - सोचते वह इक दफा और अब्बू के गाल चूम ली थी।
"अरे, अब यह किस लिए बेटा?"
"ऐसे ही, you are so sweet अब्बू।
अब्बू सिर्फ़ मुस्कुराकर रह गये। कोई गहरा भेद था। जैसे मीठा ज़हर।

साँझ होते होते दोनों दरिया किनारे पहुँच गये। किनारे के किसी एकान्त में धरती की धड़कन सुनने लगे। जैसे की माँ कुछ गुनगुना रही हो। मुनियाँ किनारे की रेत पर फेनिल आब को अपना सिर पटकता देख दंग थी। वह किनारे की रेत पर पानी में दूर तक दौड़ कर आयी और अब्बा से कहा," बहुत मज़ा आया, आप भी आओ न!"
उसने मुनिया की बात टाल दी। कुछ देर किनारे पर रेत का महल बनाता रहा, जिसे दरिया की कोई मजबूत लहर आकर बिखेर देती। पर वह बार बार वही काम करता। मुनिया अचानक बोली," अब्बा क्यो न हम यहाँ से कहीं दूर जाकर अपना महल बना लें? यहाँ तो ये लहरें बार-बार तोड़ देती हैं ।
वह मुस्कुराया, 'वक्त से भाग कर कहाँ तक जायेंगे बिटिया? ' मन का यह विचार लबों का नूर होकर फैल गई थी।
वह किनारे से दूर जाकर एक सुंदर घरौदा बना बैठा था, मुनियाँ चहकती खिलखिलाती उस घरौदे में अपने सभी खिलौने सजा बैठी। और कुछ गीत गुनगुना रहीं थी। यकायक इस शख्स को न जाने क्या सूझा उसने अपना जूता दरिया में दूर तक फेंक दिया। लेकिन दरिया की लहरों ने कुछ देर बाद उसे किनारे पर लाकर पटक दिया।
मुनिया दंग  गई ।

"ऐसा क्यों हुआ अब्बा? फैकी हुई जूती लौट आयी!"
"बिटिया! इस दरिया नुमा धरती का दिल इंसान की तरह लालची नहीं होता न इसलिए।
इसमें जो डूब सकता है उसे वह कुछ देर अपना भी लेती है लेकिन जिसे डूबना ही गँवारा नहीं उसका सही जगह किनारा ही होता।"
"क्या मैं अपनी बार्बी को इसमे फेंकू तो वह भी लौट आयेगी?"
"हाँ क्यों नहीं, करके देखो!"
मुनिया ने बेभरोशे आँख बंद कर के उसे दरिया में फेंक दी।
कुछ देर बाद वह किनारे आ गई। उसे बहुत खुशी हो वह दुबारा तिबारा यही दोहराने लगीं। उसका विश्वास बढ़ता चला गया था। उसे हँसता देख बाप बहुत खुश था । फलक का आग दरिया में पूरी तरह दाखिल हो चुका था। देखते देखते पूनम का चाँद निकलने लगा।

मुनिया आखरीबार अब अपनी बार्बी को फेंक चुकी थी पर यह क्या लहरें पलट गई। वह तो अंदर और अंदर जाने लगी। मुनिया की आँखों में आँसू आ गये, हाय! उसकी गुडिया।
"अब्बू ! देखो न दरिया भी बेइमान हो गया। आप मेरी गुड़िया ला दो बस।"
वह अपनी बेटी को प्यार से देखा," दरिया की ऐसी हिमाकत कि मेरी गुड़िया की गुड़िया न दे, यहीं बैठो अभी लाता हूँ बेटी।
फलक के आफताब के बाद ही आज खुदा का एक और रुहानी नूर दरिया में दाखिल हुआ। 

किनारे बैठी मुनिया ने देखा अब्बू कहीं दूर दूर भी नज़र नहीं आये। हाय! मेरे अब्बू, वह भी उन्हें खोजने के लिए उसी दरिया की लहरों में उतर गई ।

कुछ देर पहले यह किनारा आबाद था, कोई यहाँ हँसा था, रोया था पर अब सब शान्त......

योगेश सुदर्शन आर्यावर्ती।

Tuesday, 24 April 2018

आरक्षण...

आर्यावर्त के भूखंडों पर हरे भरे वृक्ष वंश की समृद्धि संपूर्ण सम्मान एवं वैभव से सुशोभित था।
मानव वृक्ष को सम्मान करते थे। कहीं कहीं किन्हीं विशेष प्रजातियों को देवी या देवता मानकर पूजते थे। हरे वृक्ष की टहनी तोड़ना पाप था। फल और पुष्प भी तोड़ने से पहले वृक्ष की अनुमति ली जाती थी, उनसे प्रार्थना किया जाता था।

सभी जानते थे कि वृक्ष सजीव है, उनमें चेतना भी है और भावना भी। रात को विश्राम करते वृक्ष को छेड़ना अपराध माना जाता था।

बात लगभग 1750 ई.वी की है। इस दौर से लग-भग 750 वर्ष पूर्व से आतातायी दस्यु समूह हमारी सभ्यता के साथ साथ संस्कृति पर भी आक्रमण कर रहे थे। हम नाम नहीं लेना चाहते उन दस्युओं का, किन्तु उनके कारण हमारे वन्य और ग्राम्य जीवन तथा नागर सभ्यता की तारतम्यता ही टूटती चली गई।

ग्रामीण तो गँवार हो गये, और वनवासी- असभ्य पिछड़े चोर और डकैत कहे जाने लगे। प्रधानता केवल नागरीय सभ्यता को दी जाने लगी। नागरिक ही केवल सभ्य हैं। ज्ञान बुद्धि कला संस्कृति धर्म शिक्षा पर केवल नागरिकों का एकाधिकार है।

मानव अन्यायी स्वार्थी अत्याचारी और नृशंस हो चला है। उसकी अपनी इच्छा सर्वोपरि है। आह! री भोग की लिप्सा।

पृथ्वी कोई मृत और जड़ वस्तु नहीं है, किन्तु अपनी चेतना के महत्वाकांक्षी अभिमान से जड़ीभूत मानव उसे जड़ मान लेने की भूल किये बैठा है। इसमें भी स्पंदन है, प्राण है, श्वासों की सुरीली ध्वनियों का आरोह और अवरोह भी है। हम सभी इन बातों से अनभिज्ञ तथ्य और प्रमाण में उलझकर, सत्य का सत्यानाश करते चले जायेगें।

यही हुआ है, यही हो रहा है, काश! अब भी लोग चेत लें।

पृथ्वी का फुफ्फुस संक्रमणकारी मानवों ने बुरी तरह नष्ट कर दिया है। वन और वृक्ष नष्ट हो रहे हैं। वायु परेशान है। जल दूषित हो रहे हैं, ऋतुओ के धर्म में अधर्म का प्रवेश हो चला है।

जड़वत् चेतना की अश्रव्य आर्त ध्वनियाँ त्राहि-त्राहि कर उठी है।

वृक्ष को उनके अधिकारों की भूमि लौटा दो। वे भी हमारी और आपकी तरह इस पृथ्वी के निवासी हैं। जैसे आपको आपके जीवन का अधिकार है, ठीक ऐसे ही उनका भी अधिकार है। पृथ्वी का अधिकार है। धर्म कहता है- हे श्रेष्ठ, हे आर्य मानव, सबके अधिकारों की रक्षा करो। अग्नि, जल, स्थल, वायु सबकी मर्यादा को अपने संविधान में स्थान दो। आज दलित मानव नहीं, मानवता है, प्रकृति है, इन्हें अत्यंत आरक्षण की आवश्यकता है।

योगेश सुदर्शन आर्यवर्ती