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Monday, 14 November 2016

तव वत्सः जननि वसुधे...


धारक पालक पोषक धरती
तुझ पर जन्मे हम तेरे है।
कुछ अभिमानी मूढ पुत्र ने
मूल-मूल माला फेरे हैं ।।

इतना मेरा उतना तेरा
अंग तेरा बाँटे पापी।
वे माँ की पीड़ा क्या जाने?
ममता के अंतर घाती।

भरत नहीं हो पाते हैं वो
कर्महीन अधिकार चाहिए
आरक्षित व्यवहार चाहिए
राम नहीं आदर्श दशानन
ऐसे धर्म चक्र छलते हैं
निजहित की भजिया तलते हैं।

कटे अंग की पीड़ा समझो
जड़ मूढ़ता त्यागो भाई।
अपंगत्व की टीस सुनो
क्यों बिलख रही धरती माई।।

बुद्ध की मोहन-माया विद्या
वक्र कलंकित होगा।
यदि न अब तुम जगे
धर्म का चक्र कलंकित होगा।।

योगेश सुदर्शन मिश्र