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Saturday, 14 March 2009

दृष्टि और दर्शन: जीवन-मृत्यु


जन्म और मृत्यु 

   जिसे जगत् जन्म समझता है, उसे मैं अस्तित्व का विभाजन मानता हूँ . अखंड अस्तित्व से कट कर छुद्र अहंकार का बोध पा लेना यही जन्म है . अहंकार नर्क के उस काल कोठरी का परिचायक है , जो दुख पीड़ा और कष्ट के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकती .वह एक स्वतन्त्र दिव्य एवं विराट अस्तित्व को कैद कर लेती है . उसे उसकी शक्ति से जुदा करके पीड़ित एवं दंडित करती है . सोचो तो , जन्म पाने वाला प्राणी अपने पहले ही सांस के साथ हँसता मुस्कुराता हुआ क्यों नहीं रहा पाता ? वह रोने क्यों लगता है ? किसी के जन्म पर लोग नाचते गाते हैं , ढोल नगाड़ा बजाते हैं . उत्सव मनाते हैं , यह कैसा प्रमाद है? लोग किसी को कैदी देखकर क्यों खुश हैं ? वह बेचारा तो रो रहा है… अपनी प्रिया की विरह में , अधूरा , अपूर्ण , काल की शृंखला में बंधा हुआ . अहंकार की कोठारी में – अपनी मुक्ति के लिए… सभी माता गंगा की तरह श्रेष्ठ गुरु तो नहीं हो सकती . सभी माता मुक्तीदायिनी नहीं हो सकती . यहाँ यशोदा और देवकी बनाने की होड़ लगी है . गंगा की तरह मोह और अहंकार को मिटाने वाली माताएँ जगत् में कितनी हैं ? बेचारा क़ैदी ! अब उसे काल के आधीन चलना पड़ेगा . वह काल की कृपा पर जीवन जीएगा . अखंड शक्ति के स्वामितवा वाले उस अस्तित्व को उसकी प्रिया मिलने भी आएगी पर बिल्कुल नियंत्रित तरीके से , अल्पकाल के लिए , थोड़ा सा सुख देने …. बस इतने से सुख के लिए अस्तित्व को भीषण परिश्रम करना है . पत्थर तोड़ना है , मृत्तिकामर्दन करना है … तमाम निरर्थक कर्म करने हैं . काल उसे जीवन के निरर्थक कर्म में अधिक उलझाएगा , जिससे कि वह शिथिल हो जाए … सार्थक कर्म की पहचान न कर सके , उसकी बेड़ियों को न काट सके ।

   कुछ लोग मृत्यु को मुक्ति मानने का भ्रम पाले बैठे हैं . सावधान ! इस भ्रम में न रहना . तुमने जीवन में किया ही क्या ? मृत्यु मुक्ति नहीं है , अन्यथा तुम उससे डरते ही क्यों ? मुक्ति से कोई भयभीत नहीं होता . मुक्ति से सभी आनंदित होते हैं . यदि आप अपने जीवन से आनंदित हैं , यदि आप अपने मौन से नहीं डरते , तब मैं समझता हूँ कि आपने अहंकार की कोठरी से मुक्त होने की सुरंग खोद ली है . अन्यथा ….. मृत्यु मात्र अहंकार का स्थानांतरण है . एक अहंकार से विस्थापित होकर दूसरे अहंकार तक पहुँचने की यात्रा है . जीवन और मृत्यु अस्तित्व के पड़ाव नहीं हैं , वे अविद्या एवं अज्ञान के निरंतर प्रवाह हैं . विद्या के प्रकाश में जिए बिना और ज्ञान के आनंद में झूमे बिना काल के प्रवाह से मुक्ति संभव नहीं है ।